श्रीदेवी का जापानी सायोनारा / जयप्रकाश चौकसे

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श्रीदेवी का जापानी सायोनारा
प्रकाशन तिथि : 29 मई 2014


शुक्रवार को जापान के 50 सिनेमाघरों में गौरी शिन्दे की श्रीदेवी अभिनीत 'इंग्लिश-विंग्लिश' का जापानी डब संस्करण प्रदर्शित होने जा रहा है और प्रीमियर पर प्रमुख अतिथि जापान के प्रधानमंत्री की पत्नी रहने वाली हैं। रजनीकांत के अतिरिक्त किसी और गैर-जापानी सितारे की फिल्म इस व्यापक स्तर पर प्रदर्शित नहीं हुई है। यह सचमुच आश्चर्य की बात है कि अकिरा कुरोसावा जैसे महान फिल्मकार के देश में रजनीकांत की मसाला फिल्में अत्यंत सफल रही हैं। मनोरंजन उद्योग में इसे अजूबा ही कहा जाएगा और ऐसा भी नहीं है कि जापान में बसे तमिल भाषी लोग ही इन्हें देखते हैं, जापान में जन्मे लोगों को भी ये मसाला फिल्में पसंद हैं। अमेरिका और इंग्लैंड में भारतीय सितारा जडि़त फिल्मों का सारा श्रेय वहां बसे एशियावासी दर्शकों को जाता है।

संभवत: रजनीकांत की फंतासीनुमा फिल्मों में कुछ बालसुलभ तत्व हैं जो जापानी दर्शकों के अवचेतन में बच्चों को संबोधित करते हैं। सभी जगह यह भीतर दुबका बच्चा ही मनोरंजन का चक्र चलाता है। विदेश में भारतीय फिल्म को वहां के निवासी किसी कारण ही देखते हैं। एक बार ख्वाजा अहमद अब्बास ने निकिता खु्रश्चेव से प्रश्न पूछा कि 'आवारा' की रूस में विस्मयकारी सफलता का क्या कारण हो सकता है? निकिता का जवाब था कि रूस ने दूसरे विश्वयुद्ध में सबसे अधिक मनुष्य खोए और उस भीषण त्रासदी के बाद रूसी फिल्मकारों ने युद्ध की घटनाओं से प्रेरित अनेक फिल्में भी बनाईं गोया कि युद्ध के कड़वे अनुभवों की याद कुरेदती फिल्में एक तरह से उस त्रासदी की जुगाली करने की तरह थीं। और युद्ध तथा युद्ध पर बनी फिल्मों के ओव्हर डोज के कारण आहत रूसी लोगों ने आवारा के हंसते-गाते नायक को गुनगुनाते सुना, 'जख्मों से भरा सीना है मेरा, पर हंसती है मेरी यह मस्त नजर' तो उनका हुआ उसके साथ गुनगुनाने को। मनोरंजन में लोकप्रियता के कारण भी उनकी कथाओं की तरह अजीबो-गरीब होते हैं।

बहरहाल गौरी शिंदे ने अपने और अपनी मां, जिन्हें अंग्रेजी नहीं आती थी, के अनुभव से प्रेरित 'इंग्लिश-विंग्लिश' बनाई। इसकी नायिका को इंग्लिश नहीं आती और न्यूयॉर्क में रहने वाली अपनी बहन के घर में विवाह के कार्य में हाथ बंटाने वहां जाती है। उसकी अपनी कोखजायी बेटी उसके दर्द को नहीं समझती और सात समंदर पार रहने वाली उसकी भानजी एक निगाह में उसके दर्द को पहचान लेती है। संवेदना के सेतु अपरिचय के विंध्याचल में जाने कैसे हृदयों को जोड़ देते हैं। इस फिल्म में अनेक मर्मस्पर्शी दृश्य हैं और श्रीदेवी ने कमाल का अभिनय किया है। गौरी शिंदे की यह पहली फिल्म हैं पर वे अपने काम में प्रवीण हैं और उन्होंने अपने पति को 'चीनी कम' और 'पा' को बनाते हुए देखा है। संभवत: कुछ योगदान भी दिया हो। उनके पति बाल्की विज्ञापन की दुनिया में पहले ही नाम काम चुके थे।

एक औरत का अपने को पहचानने की प्रक्रिया ही बहुत दिल को छू लेने वाली बात है। यह एक विषय है जो सभी देशों के दर्शकों को पसंद आ सकता है क्योंकि सभी तो अपने-अपने ढंग से स्वयं को खोजना चाहते हैं। यह राह कठिन है, भटकना है मुमकिन, बहकने का डर है। बहरहाल, इसका जापान में व्यापक प्रदर्शन श्रीदेवी की कीर्तिगाथा का नया चरण है। मुखर्जी की रणवीर कपूर अभिनीत 'वेक अप सिड' को कमिंग ऑफ एज फिल्म कहते हैं अर्थात किशोर अवस्था से जवानी में प्रवेश करना परन्तु श्रीदेवी अभिनीत 'इंग्लिश-विंग्लिश' भी अलग किस्म की 'कमिंग ऑफ एज' फिल्म है। इस मायने में कि एक चालीस पार विवाहित, दो बच्चों की मां इस फिल्म में वयस्क होती है, जागती है गोया कि स्वयं से रू-ब-रू होना, अपने को जानने की प्रक्रिया में उम्र का कोई बंधन नहीं होता। आप कभी भी जाग सकते हैं, मृत्यु के एक क्षण पूर्व भी जाग सकते हैं। मृत्यु यात्रा का पड़ाव है, मंजिल नहीं, वह सतत जारी रहती है।

श्रीदेवी की सफलता का राज उसके शिखर नायिका दिनों में भी यह था कि चेहरे पर बच्चों की मासूमियत और जिस्म में मादकता का मिश्रण था। सिनेमा की सफलता के भी यही दो आधारभूत सिद्धांत हैं-मासूमियत और मादकता। शेखर कपूर ने 'मिस्टर इंडिया' में इसका दोहन किया और गौरी शिंदे ने श्रीदेवी के अवचेतन को ही परदे पर प्रस्तुत कर दिया।