संसर्ग / खलील जिब्रान / सुकेश साहनी

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(अनुवाद :सुकेश साहनी)

पेड़ की डाल ने अपने पड़ोस की टहनी से कहा, "आज का दिन कितना नीरस और खाली-खाली है!"

टहनी ने उत्तर दिया, "मुझे भी ऐसा ही महसूस हो रहा है।"

उसी समय उस टहनी पर एक चिड़ा आ बैठा और फिर उसके पास ही एक और चिड़ा।

उनमें से एक बोला, "मेरी प्रेयसी मुझे छोड़ कर चली गई."

दूसरा चिड़ा बोला, "मेरी घरवाली भी चली गई है, अब वह कभी वापस नहीं आएगी। यहाँ भी किसको परवाह है।"

दोनों चीं-चीं करते हुए एक दूसरे को कोसने लगे, फिर देखते ही देखते शोर मचाते हुए आपस में लड़ पड़े। तभी दो और चिड़ियाँ उड़ती हुई आईं और उन दोनों लड़ते हुए चिरौटों के पास बैठ गई. वे दोनों एकदम शान्त हो गए और वहाँ शान्ति छा गई.

अगले ही क्षण वे चारों अपने जोड़े बनाकर उड़ गए.

डाल ने टहनी से कहा, "कितना जबरदस्त शोर था।"

टहनी बोली, "कुछ भी कहो, अब तो सब कुछ शान्त है और खुला-खुला भी। यदि ऊपरी वायुमंडल शान्त हो तो नीचे रहने वाले भी शान्ति बनाए रख सकते हैे। क्या तुम हवा से झूमते हुए मेरे करीब नहीं आओगे?"

तब डाल ने तेज हवा के साथ झूलकर टहनी को अपने आलिंगन में बाँध लिया।