सत्ता-संवाद / सुधा अरोड़ा

Gadya Kosh से
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आ गए? यह लो, खाली हाथ झुलाते चले आए। मैंने कुछ लाने को कहा था? याद नहीं रहा। कोई नई बात है? याद रहता कब है? अब मैं बाहर भी करूँ और घर का सारा जंजाल भी सँभालूँ। मरने दो, मुझे क्या पड़ी है। मैं भी नहीं जाती। चलने दो घर जैसे चलता है।'

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'चप्पलें कहाँ लिए जा रहे हो? सारी दुनिया की धूल-मिट्टी कमरे में फैला दी। चप्पलें दरवाजे पर उतारी नहीं जातीं? पैरों में मिट्टी लिथड़ती रहे, तुम्हें क्या... आज कामवाली भी नहीं आई हैं पर तुम्हें क्या फर्क पड़ता है। घर गंदा रहे, साफ रहे - तुम्हारी बला से। हर काम के लिए मैं ही मरती-खपती रहूँ।'

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'इन उखड़ी हुई चप्पलों को पहनना बहुत अच्छा लगता है क्या? दस दिन से देख रहा हूँ, पैर घसीट-घसीट कर चल रहे हो। दो मिनट मोची के पास खड़े होकर गँठवा भी नहीं सकते? सारा दिन कॉफी हाउस में पड़े सिगरेटें फूँक-फूँक कर दर्शन बघारते रहते हो। कॉफी हाउस के बाहर ही तो मोची बैठा रहता है, पर नहीं, क्यों गँठवाओ चप्पल। फटी-टूटी चप्पल पहनने में जो शान है, वह दुरुस्त चप्पल पहनने में कहाँ।'

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'बेटा भी वही रंग-ढग सीख रहा है। कपड़े धुलाई में डालता ही नहीं। महीने भर से एक ही जीन्स और हवाई चप्पल चटखाता घूम रहा हैं। शेव भी नहीं करता। मैले कपड़े लादे रहने में ही शान समझता है। पिता पर पूत... आखिर बेटा किसका है। ...एक मैं ही हूँ जिसे लोक-लाज निभानी पड़ती है। वही दो-चार सूती साड़ियाँ धो-सुखाकर कलफ लगाकर पहनती हूँ, उस पर भी दोनों बाप-बेटे आँखें फाड़ते रहते हो... जैसे बड़ा सज-सँवर कर निकल रही हूँ। ...मैं भी तुम दोनों की तरह हाथ पर हाथ धरे फटेहाल पड़ी रहूँ तो जो चार पैसे घर में आते हैं, उसके भी लाले पड़ जाएँ। ...पर तुम्हें क्या ...तुम्हें तो बैठे-ठाले रोटियाँ...'

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'वाह। थाली सरका कर उठ गए? इस उम्र में भी नखरे दिखाने बाकी रह गए हैं। पकाऊँ भी मैं और उगाऊँ भी मैं। तुमसे तो रास्ते से एक सब्जी उठाकर नहीं लाई जाती। थैला हाथ में लेते हुए शर्म आती है। जब खाना खाने में किसी को शर्म नहीं आती तो लाने में कैसी शर्म। दो-एक बार खुद खरीदकर लाओ तो पता भी चले कि सब्जी-भाजी के भाव कहाँ जा रहे हैं। ...अब खाली मेरी कमाई से तो घर में छत्तीस पकवान बनने से रहे। भगवान का शुक्र है कि दो वक्त की रोटी जुट जाती है, किसी के आगे हाथ पसारने नहीं पड़ते वर्ना तुमने तो उसके लिए भी कोई कसर बाकी नहीं छोड़ी थी...'

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'अच्छा, यह बताओ, मेरी साड़ी कामवाली को किसने दी? मैं हफ्ता भर बाहर क्या गई, तुमने बड़ी दरियादिली से घर का सामान जिसे-तिसे लुटा डाला? पानी भरने वाला घाटी तुम्हारी टी शर्ट पहन रहा है, बाहर डोलता पगला बाबा तुम्हारा कुरता-पायजामा लटकाए घूम रहा है। अपने तो अपने, मेरे कपड़े भी बाँट दिए? खुद फटे चिथड़े पहनो और कपड़े दीन-दुखियारों में बाँटते फिरो। पूरे मुहल्ले में एक तुम ही दाता-दानी रह गए हो...।'

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'बस, घुस गए अपने दड़बे में। एक तुम और एक तुम्हारी बाबा आदम के जमाने की यह मेज, जिस पर कहने को दो दर्जन पेन रखे हैं पर कभी हिसाब करने को हाथ में लो तो एक भी चलता नहीं। सब की स्याही सूखी पड़ी है। इस घर का सूखा हर जगह व्याप गया है...।'

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'लो, पड़ गए किताबों में सिर डाल के। सच को बर्दाश्त करना बहुत मुश्किल होता है पर जिस पर बीतती है, सच उसी के मुँह से निकलता है। तुममें तो सच सुनने का माद्दा ही नहीं रहा कभी। वैसे बड़ा सच लिखने का दंभ भरते हो। बड़ी तीखी सच्चाइयाँ उड़ेलते हो अपनी कलम से। हिपोक्रेट हो तुम सब। जितने झूठे तुम सब लिखनेवाले हो, शायद ही दुनिया का कोई आदमी इतना झूठ बोलता हो। और तुर्रा यह कि सच्चाई का सेहरा भी अपने ही सिर सजाए फिरते हो।'

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'दरवाजा बंद कर लेने से मेरी आवाज बंद नहीं हो जाएगी, यह याद रखना। कमरा बंद करके लिखो फूल और पत्तियों की कविताएँ। करो आसमान, सूरज, चाँद, सितारे और समंदर की बातें। लताड़ो राजनेताओं और भ्रष्टाचारियों को। और लूटो वाहवाही। घर तो अपना सँभाला नहीं जाता, दुनिया-जहान की हाँकते हो। अरे बेटे को ही बैठकर कुछ पढ़ाया होता तो आज वह भी तुम्हारी तरह नकारा न डोलता। अपनी ही दुनिया में कैद रहे जिंदगी भर। और दो-दो जिंदगियाँ बरबाद कीं। मैंने तो तुम्हारे साथ जैसे-तैसे निबाह लिया पर इसकी बीवी दो दिन में इसे छोड़ न गई तो कहना। ...पर तुम्हें क्या। अपने दड़बे में बंद होकर कागज काले करते रहना।'

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'कभी-कभी अफसोस होता है - घर में हम तीन प्राणी और चार कोने - सब एक-दूसरे से कटे हुए और अलग-थलग। बाप बेटे के स्वभाव में राई-रत्ती फर्क नहीं पर रिश्ते में छत्तीस का नाता है। मुझे तो याद नहीं आता कि कभी तुम दोनों ने बैठकर आपस में कोई सलाह-मशविरा किया हो। कोई बात करने बैठे नहीं कि बहस शुरू हो जाती है। ...बेटा बड़ा हो जाए तो दोस्त से बढ़कर होता है। कितनी चाहती थी मैं कि तुम दोनों दोस्तों की तरह रहो। यह बात कहो तो आग लग जाती है तुम्हें। कहते हो, मैंने ही उसे तुम्हारे खिलाफ भड़काया है। और सुनो, मैं क्यों भड़काऊँगी भला। मुझे क्या पड़ी है। उसके क्या आँख-कान नहीं है? देखता-समझता नहीं कि घर में कैसे मेहमानों की तरह रहते हो? घर न हुआ, होटल हो गया तुम्हारे लिए। बल्कि मैं तो कहूँ, जैसे वह मेरे साथ पेश आता है, सब तुमसे ही सीखा है उसने, और क्या। न तुमने मुझसे कभी प्यार के दो बोल बोले न उससे। वह जमाना गया, जब हथेलियों में उसका सिर लेकर उसे लोरियाँ सुनाया करते थे। हा-य... उस बच्चे को वही दो-चार महीने गोद में उठाया तुमने। होश सँभालने के बाद तो तुम्हारी नफरत ही झेली उसने। बीस साल का होने वाला है पर कभी जो उसके हाथ में बीस रुपए भी थमाए हों तुमने कि ले बेटा, पाव-भाजी खा लेना।'

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'पता नहीं जो भी थोड़ा बहुत कमाते हो, जाता कहाँ है। मुझे तो पता भी नहीं कितना पैसा मिलता है तुम्हें। जेब तो हमेशा खाली ही रहती है...।'

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'यह लो, एक और प्रेमपत्र। इस उम्र में भी तुम्हारी जेब से प्रेमपत्र ही निकलते हैं। भूखे भजन हो न हो, इश्कबाजी तो हो ही सकती है। बेटा शादी की उम्र पर आ रहा है और इश्क बाप को चढ़ा है। पता नहीं, ये तुमसे आधी उम्र की लड़कियाँ क्या देखती हैं तुममें। सब अव्वल दर्जे की बेवकूफ होती हैं। मरती हैं तुम्हारी हवाई कविताओं पर। उन्हें क्या मालूम कि इन कविताओं को गूँधकर दो वक्त की रोटी नहीं पकाई जा सकती। तुम्हारे झोले और दाढ़ी पर मरती हैं। तुम्हारे साथ रहकर देखें। दो दिन में आटे-दाल का भाव न पता चल गया तो कहना। बड़ी हवा में उड़ती फिरती हैं...'

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'मैं भी कितनी पागल हूँ। यह सब मैं कह रही हूँ। मैं - जो खुद इतनी पागल थी। आज से पच्चीस साल पहले... याद करूँ तो दिल दहल जाता है। तुम्हारे प्यार में मरने-मिटने पर उतारू थी। लगता था, दुनिया का हर रास्ता सिर्फ तुम तक जाता है। तुम्हारे खतों की एक-एक लाइन मुझे जबानी याद थी। तुम्हारे एक खत को पच्चीस बार पढ़ती थी मैं। तुम्हारी खूबसूरत हैंडराइटिंग की घंटों नकल किया करती थी। तुम्हारी दाढ़ी में मुझे ईसा मसीह नजर आता था। कंधे पर झोला टांगे हुए तुम मुझे दुनिया के सबसे सुंदर इनसान दिखाई देते थे। ...कितनी पागल थी मैं। सोचती थी, तुम मिल जाओ मुझे तो बस फिर और कुछ नहीं चाहिए। शादी हुई नहीं कि सारे टेक्नीकलर सपने काले-सफेद हो गए। साल भर की नून-तेल-लकड़ी में सब हवा हो गया। घर के खटराग में मेरे तो बाल सफेद हो गए पर तुम नहीं बदले। रहे मजनूँ के मजनूँ ही...।'

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'कमाल है, एक हफ्ते से ट्यूबलाइट खराब पड़ी हैं, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। अढ़ाई तो कमरे हैं, उसमें से एक में रोशनी नहीं। वैसे ट्यूबलाइट ठीक हो भी जाए तो कौन सा अँधेरा दूर होने वाला है। भला है, बैठे रहो अँधेरे में ही...।'

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'उफ, बिजली का बिल भी नहीं भरा तुमने। टेलीफोन तो कट ही गया है, बिजली भी कट जाएगी। पर तुम्हें क्या। कहोगे, इस औरत का दिमाग चल गया है, सारा दिन बड़बड़ाती रहती है। तुम्हारे साथ बाईस साल जैसे मैंने काटे हैं, कोई भी औरत पागल हो जाएगी। तुम तो घर में बैरागी से रहते हो। अब में स्कूल से आधी छुट्टी लेकर जाऊँ बिजली का बिल भरने। हमेशा यही होता है। मैं भी कितनी बेवकूफ हूँ कि अब भी तुमसे कुछ उम्मीद रखती हूँ। मुझे अब तक समझ लेना चाहिए था कि तुम...। छोड़ो, तुम्हें कोस-कोस कर अपनी जबान क्यों खराब करूँ...'

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'अब फिर झोला उठाकर कहाँ चल दिए? यह खाना जो थाली में छोड़कर उठ गए हो, कौन खाएगा? मत समझना कि मैं इतनी पतिव्रता हूँ कि तुम्हारी जूठी थाली में खाकर अपना जनम सकारथ समझूँगी। तुम्हें खाने की क्या कद्र होगी। खुद कमाते-धमाते तो पता चलता कि झोला लेकर बड़ी-बड़ी फिलॉसाफी हाँकने से घर का चूल्हा नहीं जलता। उसके लिए सुबह से शाम तक हड्डियाँ गलानी पड़ती हैं, तब जाके... लेकिन तुम पर किसी बात का कोई असर नहीं होता... पता नहीं कौन सी मिट्टी के बने हो...'

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'अब जा ही रहे हो तो अपना यह प्रेमपत्र लेते जाओ। याद रखना, मुझसे कुछ छिपा नहीं हैं। इसे कह दो, आने को तैयार हैं तो मेरी ओर से कोई रुकावट नहीं। आए! सँभाले तुम दोनों को! मेरी जान छूटे! बाईस सालों में यूँ भी कितनी जान बाकी रह गई है.."

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'इसलिए नहीं खाने बैठी तुम्हारी थाली में कि पति-परमेश्वर की जूठन का भोग लगाऊँ। अपनी कमाई का दर्द मुझे नहीं होगा तो क्या तुम्हें होगा! भरी थाली छोड़ी, झोला उठाया और चल दिए...!'

'लेकिन जाओगे कहाँ? देर-सवेर यहीं आओगे... खाली हाथ झुलाते...!'