सनकी क्रिकेट पिच, सनकी समाज / जयप्रकाश चौकसे

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सनकी क्रिकेट पिच, सनकी समाज
प्रकाशन तिथि :29 जनवरी 2018


दक्षिण अफ्रीका में खेले जा रहे क्रिकेट टेस्ट में पिच का व्यवहार इतना अजीब है कि घरेलू टीम ने ही मैच को अधूरा छोड़ने की गुजारिश की, जिसे लड़ाकू प्रवृत्ति के भारतीय कप्तान कोहली ने खारिज कर दिया। इसी समय कुछ लोग भारतीय संविधान को भी इसी क्रिकेट पिच की तरह प्रस्तुत करने का प्रयास कर रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट के आदेश की सरेआम धज्जियां उड़ाने के प्रयास हो रहे हैं और तमाम आदर्श संस्थाएं नष्ट की जा रही हैं। इन्हीं दिनों 'वोदका डायरीज' नामक फिल्म का प्रदर्शन हो रहा है, जिसमें दिखाया गया है कि हत्याएं हो रही हैं और हत्यारे का कोई व्यक्तिगत लाभ कहीं नज़र नहीं आ रहा है। दशकों पूर्व हॉलीवुड में फिल्म बनी थी 'बोनी एंड क्लॉइड' जिसका नायक और नायिका बैंक लूटते हैं, दुकानें लूटते हैं। उन्हें धन की आवश्यकता नहीं है और न ही वे रॉबिनहुड की तरह अमीरों को लूटकर गरीबों में धन बांटते हैं। वे दोनों जुर्म करते हैं, क्योंकि उन्हें जुर्म करने में थ्रिल का अनुभव होता है, क्योंकि वे अपने जीवन से ऊबे हुए दो युवा हैं जो महज सनसनी के लिए अपराध करते हैं।

इसी 'बोनी एंड क्लाॅइड' से प्रेरित 'बंटी और बबली' एक लचर फिल्म थी। मौजूदा दौर में सरकार व संस्थाएं अपनी ऊब को मिटाने के लिए गैर-संवैधानिक कार्य करते हैं या उसकी इजाजत देते हैं। मीडिया खूब चटखारे लेकर इसे प्रचारित भी कर रहा है। रोजमर्रा के जीवन में सनसनी की तलाश हमारे व्यक्तित्व के खोखलेपन को उजागर कर रही है। भौतिक सुखों के बीच अध्यात्म के रास्ते को भी परम सत्य खोजने के लिए नहीं अपनाया जा रहा है, वैसे ऊब से बचने के लिए किया जा रहा है, क्योंकि हम साधनों की विपुलता में डूबते हुए उससे ऊब रहे हैं। दिशाहीनता की पराकाष्ठा का दौर है।

महान डॉ. भीमराव अॉम्बेडकर की अध्यक्षता में विद्वानों के दल ने संविधान की रचना की है। इसकी प्रेरणा उन्हें ब्रिटिश संविधान से मिली है परंतु ब्रिटेन में लिखित संविधान से भी आवश्यक रहा है अलिखित परम्पराओं का निर्वाह। आज प्रशासन की विफलता एवं नेताओं की विचारहीनता के कारण सामान्य जीवन ठप हो चुका है और संविधान पर प्रश्न उठाए जा रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट की हिदायतों की मुख्यमंत्रियों ने अवहेलना की है। अराजकता अपने पैर पसार रही है और दु:ख की बात है कि यह कार्य अवाम ने नहीं, वरन नेताओं ने किया है। पूरा समाज ही दक्षिण अफ्रीका के सनकी पिच की तरह हो रहा है। इससे भी अधिक सनकी पिच अन्य देशों में भी नज़र आ रहे हैं। अमेरिका के ट्रम्प महाेदय प्रतिदिन ग्यारह बजे अपने सरकारी निवास से दफ्तर जाते हैं जो 39 कदम दूर स्थित है। उनके भरोसे के अधिकारी दस्तावेज लाते हैं, जिन्हें वे बिना पढ़े ही दस्तखत कर देते हैं। प्रतिदिन शाम 6 बजे वे अपने निवास लौट जाते हैं। अमेरिका के इतिहास में पहली बार एक ऐसा व्यक्ति राष्ट्र प्रमुख है, जिसे कोई चिंता नहीं है, वह विचारहीनता के टीले पर सम्राट नीरो की तरह बांसुरी बजा रहा है। उस समय रोम जल रहा था।

यह पूरी मानवता के लिए चिंता की बात है कि इस दौर में अधिकतर सत्ताधारी विवेकहीन व्यक्ति हैं और सारा दोष अवाम का है, जिसने इन लोगों को अपना मत दिया है, क्योंकि इस बार अनाम घुड़सवार तानाशाह को निमंत्रण अवाम भेज रहा है कि सारी व्यवस्थाएं ठप हो रही है, महाराज आप पधारें, हम पर कोड़े बरसाइए।

गौरतलब है हमारी फिल्मों ने भी अराजकता रची है। ऐसे पात्रों को सराहा है जो मनमानी करते हैं, अत्याचार करते हैं। फिल्मों में आदर्श चरित्र-चित्रण हाशिये में चला गया है। सनकी पात्रों की बेहूदा हरकतों पर तालियां बजाई जा रही हैं।

क्या फिल्मों से समाज का तापमान मालूम किया जा सकता है। या फिल्में तापमान को प्रभावित कर रही हैं? संभवत: दोनों एक-दूसरे के पूरक बन गए हैं। कुछ वैचारिक बौने हमारे महान संविधान को भी अफ्रीका के सनकी पिच की तरह मान रहे हैं। यह दौर भी गुजर जाएगा जैसे गुजर गए अनेक दौर।