सम्मान की चलित दुकान / ललित शर्मा

Gadya Kosh से
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दो दिन से इंटरनेट सता रहा था, थक हार कर शिकायत करने मुझे बी एस एन एल (bsnl) के दफ़्तर में जाना पड़ा, वहाँ एक बैनर लगा था। जिसमें लिखा हुआ था "हिन्दी पखवाड़ा"। बैनर देख कर मुझे लगा कि अब सरकारी तौर हिन्दी को याद करने का मौसम आ गया। इसके लिए विभागों ने अलग से बजट जारी किया होगा और हिन्दी दिवस पर कोई कार्यक्रम करके हाई टी या महाभोज द्वारा खर्च किया जाएगा। दो-चार विभागीय तुक्कड़ों को सम्मान-पत्र एवं शाल श्रीफ़ल देकर सम्मानित किया जाएगा। फ़िर हिन्दी पखवाड़े की इति श्री हो जाएगी। कमोबेश सभी सरकारी आयोजन इसी तरह होगें। पान चबा कर पीक से मुंह और कुरते को रंगने वाले कुछ घिसे-पिटे झोला छाप तथाकथित साहित्यकारों की जै-जै हो जाएगी। अगले दिन से सरकारी काम काज फ़िर राज महिषी अंग्रेजी की छत्र छाया में प्रारंभ हो जाएगा। अरे! कोई हमारी जै जै करे तो बात बने। बरसों हो गए कीबोर्ड तोड़ते हुए।

दफ़्तर से बाहर आते समय एक जबरिया साहित्यकार जी से मुलाकात हो गयी, उन्होने अपने झोले से एक निमंत्रण पत्र निकाला और लिफ़ाफ़े पर बिना नाम लिखे ही मुझे सादर समर्पित किया। साथ करबद्ध कुटिल मुस्कान के साथ सरकारी सहयोग से उनके द्वारा आयोजित कार्यक्रम का निमंत्रण दिया। मैने उन्हे धन्यवाद दिया और कहा कि-" समय मिलने पर आपके कार्यक्रम में अवश्य ही पहुंचने का प्रयास करुंगा। क्योंकि हिंदी दिवस ही वर्ष में एक दिन ऐसा आता है जिस दिन कहीं से जुगाड़ कर दो चार सम्मान पत्र कबाड़ लिए जाते हैं। कम से कम साहित्य जगत के मित्रों पर रौब जमाने के काम आते हैं। ऐसे महत्वपूर्ण दिन किसी फ़ोकटिया कार्यक्रम में जाकर समय खराब करना बुद्धिमानी नहीं है। अगर आपकी संस्था द्वारा सम्मान करवाएं तो मैं अवश्य आ सकता हूँ।" उन्होने कुटिल मुस्कान के साथ पान की पीक के साथ थूक छलकाते हुए कहा- "भैया इस साल के तो सब सम्मान बुक हो गए हैं, कहें तो अगले वर्ष की बुकिंग अभी से कर देता हूँ।"

मैने हामी भर ली- "अरे भाई हजार-दू हजार की जरुरत पड़े तो वह भी बता दीजिएगा, संकोच न कीजिएगा, समझे कि नहीं।"

उन्होने कहा - "हाँ भैया, बगैर मुद्रा के मुख मुद्रा ही नहीं बनती। देखिए न कितने सारे मुद्रा राक्षस फ़िर रहे हैं, मुद्रा की थैली धर के कहीं सम्मान हो जाए तो बात बने। पर आप किंचित भी संशय न रखें। आगामी वर्ष के लिए आपका सम्मान तय समझिए। सम्मान पत्र के साथ में साथ शाल और श्रीफ़ल भी बुक रहा।" मैने प्रसन्न मुद्रा में उनकी जय-जय कार की और आगे बढ लिया।

रास्ते में सम्मान के थोक व्यापारी चचा मिल गए, गालिबन वे भी पान चबाते हुए सायकिल ओंटते चले जा रहे थे। मुझे देखते ही रोक ली सायकिल और सामने के जंग खाकर टूटे हुए दांतो के बीच से एक लम्बी पीक मारी। थोड़ी ही दूरी बच गयी वरना हमारा एक्शन का चकाचक जूता शर्म से लाल हो जाता। "कहाँ से आ रहे हो मियां?"- पीक मारते ही सवाल की तोप दाग दी।

"राम राम चचा, हम तनि ई ऑफ़िस से आ रहे हैं।"

"अच्छा अच्छा, हिन्दी दिवस का कौनो कार्यक्रम का निमंत्रण है का हिंया का?"

"नहीं चचा, हमारा इंटरनेट खराब हो गया है, वह उसका बी पी उपर नीचे होते रहता है। कहीं रात को हृदयाघात न हो जाए यही सोच कर चले आए थे। फ़िर कल हिन्दी दिवस है। अगर एक लेख हिन्दी पर नहीं लिखेगें तो लोग बाग सोचेगें कि साल भर हिन्दी को घोरते रहते है और जब मौका आए तो लिखना ही भूल गए। बस यही सोच कर साहब से मिलने चले आए थे।"

चचा कहने लगे कि - "का बताएं भतीजे, बड़ा खराब जमाना आ गया है। हमने प्रतिवर्षानुसार हिन्दी दिवस पर सम्मान समारोह आयोजित किया है इस बार कोई दिख ही नहीं रहा किसका सम्मान किया जाए। जिसके पास जाते हैं वही बुक मिलता है। कहता है कि चचा विलंब से आए हम तो फ़लां-फ़लां के कार्यक्रम में बुक हो गए हैं। अब बताओ भतीजे हम इतने बरसों से सम्मान बांट रहे हैं अगर इस दिन सम्मान नहीं बांट पाए तो हमारी अंतर्रात्मा हमें धिक्कारेगी कि हिन्दी के लिए कुछ किए नहीं। सोचो जरा हिन्दी लेखन करने वाले साहित्यकार का हिन्दी दिवस के दिन शाल श्रीफ़ल से कहीं सम्मान न हो तो कितनी अपमान की बात है। वो दिन भी क्या दिन थे जब लोग सम्मान करवाने के लिए बरसों पहले सम्पर्क करके बुकिंग करवाते थे। तब कहीं जाकर उनका नम्बर आता था। हमें मालूम नहीं था कि इतने बुरे दिन भी आएगें। संकट के समय अपना ही काम आता है तो तुम्हें रोक लिए।"

"निराश न होईए चचा, आदेश कीजिए मैं आपका क्या प्रिय कर सकता हूँ" चचा की आँखों में झांकते हुए मैने कहा।

"मुझे तुमसे यही आशा थी, मुझे मालूम था कि तुम मुझे निराश नहीं करोगे। कुछ खर्चा वर्चा दो तो कोई पुराना सभागृह बुक करवा लेता हूँ एक दो अतिथि और मुख्यातिथि तय करने पड़ने पड़ेगें। बहुत काम है, अब जल्दी से कुछ नगदऊ दर्शन कराए दो"- चचा जीभ से लार ट्पकाते हुए बोले।

मैने कहा - "का बताएं चचा, इतने बुरे दिन आ गए हैं कि गाहे-बगाहे लोग हिन्दी को गरियाते रहते हैं कि हिन्दी रोजगार देने वाली भाषा नहीं है। क्या करेगें हिन्दी सीख कर, हिन्दी बोल कर। जब रोजगार ही नहीं मिलेगा तो पेट कहाँ से भरेगा। बड़े-बड़े नामवर लोगों का हिन्दी लिख बोल कर पेट नहीं भरा, वे दिन भर पानी पीकर डकारते रहते हैं झेंप मिटाने के लिए, ताकि लोगों को अहसास हो, भर पेट खाकर आए हैं। आप कौन सा तीर मार लोगे हिन्दी की हिमायत करके?"

"मेरे पास भी इतनी रकम नहीं है कि आपको देकर सम्मानित हो जाऊं, यहाँ फ़ोकट में सम्मानित करने वालों के लगातार चलभाष पर फ़ोन आ रहे हैं अब बताओ घाटे का सौदा मैं कैसे करुं? यदि आप चाहें तो मै आपकी एक सहायता कर सकता हूँ। जिससे आपका नाम भी कायम रहेगा और सम्मान भी कायम रहेगा।"

चचा ने अचरज भरी निगाहों से देखते हुए कहा - "बताओ, क्या करना होगा?"

मैने कोरा सम्मान पत्र उनके थैले में देख लिया था - "आपके थैले में जो सम्मान पत्र है उसमें मेरा नाम भर दीजिए और सामने जो हिन्दी पखवाड़ा का बैनर लगा है उसके सामने मुझे दे दीजिए। वहाँ उपस्थित गार्ड और चपरासी को भी बुला लेगें, चार छ: लोग साथ में दिखेगें भी और फ़ोटो भी हो जाएगी सम्मान करते हुए, आपकी इज्जत भी कायम रहेगी और बिना खर्चे के हम भी सम्मानित हो जाएगें। अखबार में भी आपकी संस्था के द्वारा किए गए सम्मान चित्र भी छप जाएगा।"

चचा बोले - "मान गए भतीजे, तुम्हारी खोपड़ी को, गाल पर चुम्मा लेने का दिल कर रहा है। हम ही भकवाए हुए थे कि कैसे होगा सम्मान समारोह का आयोजन। सम्मान करके भले ही हम तीर-तलवार नहीं मार लेगें पर साल भर यह बात कचोटते रहती कि किसी साहित्यकार का सम्मान नहीं कर पाए। अगर सम्मान नहीं होगा तो न जाने कितने उदयीमान कवि साहित्यकारों की भ्रूण हत्या हो जाएगी। तुमने मुझे इस कलंक से बचा लिया। अगर हिन्दी लेखन बंद कर देगें तो हिन्दी के सम्मान का दम भरने वाली इतनी सारी संस्थाओं का क्या होगा? उन्हे आयोजन करके हिन्दी के प्रति शहीद होने का भाव प्रकट करने का अवसर कैसे मिलेगा? चलो जल्दी से तुम्हारा सम्मान कर दें, फ़िर किसी और को तलाशें, जो सम्मान के तलबगार हैं।"

हिन्दी पखवाड़ा के बैनर के नीचे चचा ने हमें सम्मान-पत्र देकर सम्मानित किया। गार्ड ने मेरे मोबाईल फ़ोन से यादगार चित्र लिया और हम निहाल हो गए और चचा भी।

चचा बोले -वह साहित्यकार ही क्या जिसका सम्मान नहीं। अगर कभी किताब भी छपानी पड़ी घर दुआर बेचकर, अपने खर्चे से, बिना सम्मान के क्या लिखोगे अपनी उपलब्धि के तौर पर। वर्तमान में काव्य संग्रह, कहानी संग्रह, व्यंग्य संग्रह आदि में आवरण के अंतिम पृष्ठ पर साहित्यकार को मिले हुए सम्मानों की सूची प्रकाशित करना परम्परा हो गयी है। जिसकी सम्मान सुची जितनी बड़ी वह उतना बड़ा लेखक-साहित्यकार कहलाता है। पद्म श्री इत्यादि के लिए भी अर्जी लगाते समय उसमें भी सम्मानों की सुची मय सम्मान के प्रमाण के संलग्न करनी पड़ती है, समझे की नहीं?"

सम्मान पाकर मैं मुदित होकर चचा को धन्यवाद दे रहा था कि यदि इसी तरह बिना खर्चे के सम्मान करते रहें तो एक दिन हिन्दी अवश्य अपने उच्च स्थान को प्राप्त करेगी। अगर यही सम्मान करने का जज्बा चचा जैसे लोगों में रहा तो हिन्दी को सम्मानित होने और हमें पद्म श्री पाने से से कौन रोक सकता है। चलते चलते मेरे होंठों से नगमा फ़ूट पड़ा, हम होगें कामयाब, हम होगें कामयाब एक दिन, मन में है विश्वास………।