सरहद पर हास्य वार छोड़ ना यार / जयप्रकाश चौकसे

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सरहद पर हास्य वार छोड़ ना यार
प्रकाशन तिथि : 10 अक्तूबर 2013


फराज हैदर की पहली फिल्म 'वार छोड़ ना यार' का प्रदर्शन होने जा रहा है, जिसमें शरमन जोशी भारतीय फौजी की भूमिका में हैं और जावेद जाफरी पाकिस्तानी फौजी की तथा सोहा अली खान एक पत्रकार की भूमिका में हैं। युद्ध जैसे गंभीर विषय पर यह पहली हास्य फिल्म है। इस तरह की फिल्में और किताबें विदेशों में प्रचलित हैं। पश्चिम में तो युद्ध पर संगीतमय ऑपेरानुमा फिल्में भी बनी हैं। हर देश में हास्य का मुद्दा और माद्दा अलग-अलग होता है। भारत में हास्य को कभी गंभीरता से नहीं लिया गया और वुडी एलेन की तरह 'विट' भी यहां लोकप्रिय नहीं है। कुछ क्षेत्रीय भाषाओं में हास्य के लहजे में अनेक किताबें लिखी गई हैं। श्रीलाल शुक्ल की 'राग दरबारी' एक व्यंग्य रचना है और हरिशंकर परसाई तथा शरद जोशी ने साहित्य को अपनी व्यंग्य एवं हास्य रचनाओं से समृद्ध किया है।

भारत-पाकिस्तान की सरहद हमेशा सुलगती रही है और दोनों ही देशों के कुछ निहित स्वार्थों की रुचि है कि सरहदें सुलगती रहींं, आग उगलती रहीं अन्यथा उनका आधार ही समाप्त हो जाएगा। दोस्ती कभी व्यापार नहीं होती, परंतु नफरत तिजारत हमेशा रही है। इस नफरत को बनाए रखने में अनेक लोगों ने सरहद के दोनों ओर खूब धन कमाया है। दरअसल, आतंकवाद भी अपने भीतरी स्वरूप में एक व्यवसाय ही है और उसका धर्म, कला और मनुष्यता से कोई संबंध नहीं। आतंकवाद के आवरण में नशीले पदार्थों और टेक्नोलॉजी को सरहदों के पार ले जाकर बेचा जाता है, गोया कि यह तस्करी का ही आजमाया हुआ आवरण है। अगर नफरत का व्यवसाय व सुलगती सरहदें नहीं होतीं तो यह तस्करी भी नहीं होती और आणविक कीमिया के इतने बड़े दाम भी नहीं मिलते।

सरहदों पर तैनात फौजियों के विषय में कृष्णचंद्र ने कई कहानियां लिखी हैं तथा कृष्णचंद्र की 'जर्रा-जर्रा' पर गुलजार साहब ने पटकथा भी लिखी है। इस तरह की कहानियां भी लिखी गई हैं कि सरहद के दोनों ओर हमेशा संवाद बना रहता है और आपसी समझदारी के तहत पहले से सूचना देकर भड़ास निकालने के लिए अकारण ही गोलियां चलाई जाती हैं और कभी-कभी यह भी तय पाया जाता है कि आज का द्वंद्व इन अकारण चलाई गई गोलियों के बदले गालियों की जंग खेली जाएगी और कभी-कभी भोजन भी सरहद के आर-पार भेजा जाता है। जो सैनिक लंबे समय तक सरहद पर अपने परिवार से दूर रहते हैं, उनके मन बहलाने के अपने तरीके हैं, परंतु इसका यह अर्थ नहीं कि वे अपने आकाओं के आदेश का उल्लंघन करते हैं। जब युद्ध किया जाता है तो पूरी संजीदगी से किया जाता है और वे अपने देशभक्ति के धर्म से कभी विचलित नहीं होते। शांतिकाल में अवश्य उनके बीच हंसी-ठट्ठे के लिए गोलियों और गालियों का आदान-प्रदान होता है तथा तीज-त्योहार पर भोजन की देगें भी भेजी जाती हैं। यह बताना कठिन है कि फराज हैदर ने किस दृष्टिकोण से क्या बनाया है, परंतु सरहदों पर ठहाकों का गूंजना हमेशा तोपों के गरजने से बेहतर ही माना जाएगा।

शरमन जोशी, सोहा अली खान एवं जावेद जाफरी अच्छे कलाकार हैं। विगत कुछ वर्षों से मनोरंजन जगत में यह मिथ सत्य का रूप ग्रहण कर चुकी है कि वर्तमान समय का दर्शक हास्य को प्राथमिकता देता है और इस तरह का हास्य प्रस्तुत किया जा रहा है तथा हास्य के नाम पर फूहड़ता भी अच्छे दामों में बेची जा रही है। बर्नार्ड शॉ ने 'आम्र्स एंड द मैन' नामक नाटक भी लिखा है जिसे विभिन्न देशों में अनेक बार मंचित किया गया है। दशकों पूर्व शशि कपूर तथा उनकी पत्नी जेनिफर ने भी इस नाटक में अभिनय किया था। एक व्यवसायी फौजी यह समझ लेता है कि युद्ध के व्यवसाय में बने रहने के लिए युद्ध के समय कैसे स्वयं को बचाए रखना दुश्मन के क्षेत्र में घुसने से बेहतर होता है अर्थात व्यावसायिक फौजी असली युद्ध के समय भी 'युद्ध युद्ध' खेलकर बचा रहता है।