सुरक्षित हैं हास्य फिल्में / जयप्रकाश चौकसे

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सुरक्षित हैं हास्य फिल्में
प्रकाशन तिथि :04 जुलाई 2016


राजनीति और मनोरंजन क्षेत्र के भाग्य विधाता अवाम की पसंद का आकलन करते रहते हैं और ये जद्‌दोजहद पांच अंधों द्वारा हाथी के आकार के वर्णन की तरह भ्रामक होती है। अवाम को समझना मेंढक तौलने की तरह मुश्किल काम है। तराजू उठाते ही मेंढक छलांग लगा देते हैं। रोजमर्रा के जीवन की कठिनाइयां इतनी अधिक हो गई हैं कि दर्शक हल्का मनोरंजन चाहते हैं। इस विचार के विरुद्ध कई उदाहरण हैं, जब सामाजिक संकट के काल में सामाजिक प्रतिबद्धता की गंभीर फिल्मों ने सफलता पाई है। अमेरिका में वियतनाम युद्ध में अमेरिका के कूद पड़ने की आलोचना करने वाली अनेक फिल्में बनीं, जिन्हें सफलता मिली है। सारांश यह है कि अवाम की पसंद का ऊंट किस करवट बैठेगा यह बताना कठिन है। हाल ही में मुंबई में अजय देवगन और उनके प्रिय निर्देशक रोहित शेट्‌टी ने विचार विमर्श के बाद तय किया कि हास्य फिल्में बॉक्स ऑफिस पर अधिक सुरक्षित हैं, अत: सफल 'गोलमाल' शृंखला की अगली कड़ी बनाएं, जिसकी शूटिंग दिसंबर में शुरू होगी और अगले वर्ष की दीवाली पर प्रदर्शन होगा।

ज्ञातव्य है कि ऋषिकेश मुखर्जी ने अमोल पालेकर के साथ 'गोलमाल' बनाई थी। उत्पल दत्त ने केंद्रीय भूमिका की थी। उत्पल दत्त रंगमंच और सिनेमा से जुड़े थे। उन्होंने फिल्मों का निर्माण भी किया है। ऋषिकेश मुखर्जी और एनएन सिप्पी भागीदार थे। उनके बीच काम का विभाजन बहुत स्पष्ट था कि एनएन सिप्पी कारोबार करते थे और मुखर्जी मोशाय सृजन पक्ष संभालते थे। उनकी अधिकांश फिल्में बाद में दूसरों ने बनाई है परंतु फ्रेंचाइजी के अधिकार से उन्हें बहुत मुनाफा हुआ है। यह अजीब बात है कि मूल फिल्मों से मिले मुनाफे से कई गुना अधिक मुनाफा उनके 'रीमेक' या टाइटल के इस्तेमाल से मिला है। मुखर्जी ब्रैंड का मूल्य है। फिल्मों की कड़ियां अर्थात ब्रैंड की कमाई भी हॉलीवुड ने प्रारंभ की है। उनकी 'टारजन' शृंखला की नई कड़ी अभी प्रदर्शित हुई है और किंगकॉन्ग सीरिज भी खूब सफल रही है। अंतर केवल यह आया है कि 'टारजन' व 'किंगकॉन्ग' की प्रारंभिक फिल्मों में गज़ब की मासूमियत थी परंतु बाद की फिल्मों में बहुत हिंसा है और मासूमियत पर अब कोई प्रीमियम नहीं है। यह तथ्य अनेक क्षेत्रों में उभरकर आया है। आज के बच्चे भी पहले की तरह मासूम नहीं हैं। अगर पहले की सभ्यताएं अज्ञान के कारण नष्ट हुईं तो मौजूदा दौर जानकारियों की अधिकता से पीड़ित है। आज जानकारियों के लिए महज़ चंद बटन दबाने पड़ते हैं, पहले ग्रंथों के अध्ययन में उम्र खप जाया करती थी। धन्य है वह व्यक्ति जिसने कॉमिक्स का विकास किया।

'गोलमाल' अब ऐसा ब्रैंड है कि अजय देवगन के साथ करीना की तरह अधिक मेहनताना पाने वाली सितारा कलाकार की जगह किसी अन्य नायिका को भी लिया जा सकता है। अमिताभ बच्चन के शिखर दौर में भी नायिका पर अधिक खर्च नहीं किया जाता था और किमी काटकर जैसी कम मेहनताना पाने वाली अभिनेत्री को भी अवसर मिल जाता है। ज्ञातव्य है कि किमी काटकर कम बजट की 'टारजन' की भी नायिका रही हैं। उन्होंने अमिताभ की 'हम' में भी काम किया है। फिल्म उद्योग में इस तरह की बचत पर खूब ध्यान दिया जाता है परंतु लोकप्रिय सितारों की व्यक्तिगत खर्चीली टीम पर कोई कुछ नहीं बोलता। सितारे के बॉडीगार्ड, उसके मित्र, व्यक्तिगत मालिश करने वाला और चमचों की बारात भी उसके साथ चलती है और निर्माता को अतिरिक्त खर्च सहन करना पड़ता है। यह बचत का मुद्‌दा घरेलू जीवन में अत्यंत महत्वपूर्ण है परंतु इस क्षेत्र में भी सार्थक बातों से अधिक खर्च दिखाने पर करना होता है। अबोध उम्र का छात्र भी मोबाइल के लिए जिद करता है। पाठशालाओं में यूनिफॉर्म आवश्यक कर दिया गया है और उसकी विशेष दुकानों की भी सिफारिश होती है। पहले शिक्षा संस्थान में यूनिफॉर्म इसलिए लाया गया कि अमीर घर के छात्र महंगे कपड़े पहनते थे और गर्व भी करते थे। दरअसल, शिक्षा संस्थाओं से यूनिफॉर्म का खेल समाप्त किया जाना चाहिए, क्योंकि सब छात्र एक से कपड़े पहनें इसकी अगली कड़ी है कि सब एक-सा खाएं, एक-सा बोलें और एक-सा सोचें भी। परम्परा के बहाने वैचारिक 'रेजीमेंटेशन' भी किया जा रहा है। सब तितलियों के पंख समान रंग के नहीं हते, फिर बच्चों को क्यों यूनिफॉर्म पहनना आवश्यक कर दिया गया है। गुलदस्ते की शोभा उसमें लगे विविध प्रकार के फूल हैं। ये बातें अत्यंत साधारण दिखती हैं परंतु इसमें गहरी साजिश छुपी है। अवाम की व्यक्तिगत पसंद के ऊपर एक समान पसंद लादी जा रही है। सब गोलमाल है भाई!