स्मृति-लोक / उर्मिला शिरीष

Gadya Kosh से
यहाँ जाएँ: भ्रमण, खोज

उन्होंने सारे दरवाजे और खिड़कियाँ बंद कर लीं। परदे खींच लिए। परदे का कोना उठाकर बाहर झाँककर देखा, आसपास कोई दिखाई नहीं दिया - यानी परदों के पार कोई झाँककर नहीं देख सकता था इस बात का विश्वास उन्हें हो गया। इस मैदान खाली था। न बच्चे क्रिकेट खेल रहे थे, न गाय-भैंस... घास की जगह पत्तियाँ खा रही थीं, न आवारा कुत्तों ने अपनी जमात बना रखी थी। इस समय आसमान भूरे रंग का होता है... बादलों को आँखों पर जोर देकर देखना पड़ता है। तीखी धूप चारों तरफ फैली होती। उससे बचाव के लिए न सूनी दालानें थीं, न छायादार वृक्ष। यह समय उनका अपना होता है। नितांत अपना। बाइयाँ अपना-अपना काम निपटाकर जा चुकी होतीं। पड़ोसिनें भी तीन-चार बजे के बाद घर से निकलती हैं - फोन की घंटी चुप रहती है। इसलिए इस वक्त वे इस घर की, इस घर की चीजों की और स्वयं की भी मालकिन होती हैं।

अपनी इस मालकियत का भरपूर आनंद उठाती हैं। अपनी रुचि का भोजन बनाना, साल भर के लिए अचार, मुरब्बा, बड़ी, पापड़ बनाना। किसी खास चीज की इच्छा होती तो तुरंत बना लेतीं... या फिर टी.वी. देखना - जो कि बच्चों के घर में रहते हुए नहीं देख पातीं - या हाथ-पाँव पसारकर जी-भर सोना या मन किया तो अपने पुराने संगी-साथियों, रिश्तेदारों और सहेलियों से जी-भर बातें करना। उनकी बातों के बीच कोई रोकने वाला नहीं होता। इस समय और इस समय की दुनिया में वे मुक्त परिंदे की तरह उड़ान भरती हैं। मुक्त मन। मुक्त तन। मुक्त आकाश। मुक्त कामनाएँ। मुक्त उड़ान। सभी तरह के तनावों से मुक्त। सभी तरह की शंका-कुशंकाओं से रहित। पर आज उन्हें एक जरूरी काम करना था। इस काम में उन्हें किसी की दखलंदाजी नहीं चाहिए थी। सो उन्होंने दीवार से टिककर लकड़ी से धकियाते हुए पेटी को दीवार के नीचे से निकाला। पेटी जो लगभग पैंतीस साल पुरानी हो चुकी है। पेटी की आयु बढ़ाने के लिए समय-समय पर वे उसका रंग-रोगन करती रहतीं... कुंदा बदलवाती रहीं। तीन-चार बार पेंट करवाया। इस बीच कई खूबसूरत मजबूत अलमारियाँ आयीं, पर पेटी और पेटी की सत्ता अपनी जगह कायम रही। पेटी अपनी ठसक, विश्वसनीयता और हैसियत को बनाए रही। 'ऐसा इस पेटी में क्या है माई, जो उसे छाती से चिपकाए रखती हो। कचरा निकालकर फेंक दो, जो सामान ठीक-ठाक या काम का हो उसे अलमारी में रख लो। कितनी जगह घेरती है यह पेटी।'

तब माई का चेहरा उतर जाता। बच्चों की सहज हँसी भरी बात उनके भीतर कील की तरह गढ़ जाती। उन्हें लगता अपमान पेटी का नहीं, उनका किया जा रहा है। आज पेटी के लिए जगह नहीं है तो क्या कल उनके लिए भी जगह नहीं रहेगी... फिर इस पेटी को कैसे बचाया जाए... कहाँ रखा जाए... सबकी नजरों से छुपाकर... इसी सोच-विचार में उनका समय निकल जाता। उनकी निगाहें घर के हर कोने में ठहर जातीं। छत से लेकर बाहर के बरामदे तक में वे पेटी के लिए जगह तलाशतीं... फिर एकाएक उन्हें यह जगह ठीक लगी थी... दीवान के नीचे। जहाँ से न पेटी दीखती थी और न उसका रंग। न उसे कोई हाथ लगा सकता था और न ही फालतू समझकर फेंक सकता था। हाँ, निकालने और रखने के लिए एक आदमी की मदद जरूर लगती थी, सो उन्होंने इसका भी एक तरीका निकाल लिया था... दीवार से पीठ को लगाकर... लकड़ी से उसे धक्का देकर बाहर खिसका लेना। अपनी इस तरकीब पर उन्हें खुशी भी हुई थी और गर्व भी।

'तुम लोगों को षरम आती थी न... मेरी पुरानी पेटी को देखकर अब मेरी पेटी न तो जगह घेरेगी न तुम्हें दिखाई देगी।' वे पेटी का बचाव करती हुई बोली थीं।

वे कैसे समझाएँ बच्चों को कि पेटी उन्हें फालतू बदसूरत, भद्दी और पुराने जमाने की चीज लगती है, वह उनके लिए कितनी और किस मायने में महत्व रखती थी। यह पेटी उनके जीवन और पति की स्मृतियों का जीता-जागता संग्रह है। पति के अंतिम समय तक यह पेटी उनके पलंग के नीचे रहती थी। छोटा-सा ताला लटका रहता था...। इसे खोलने की इजाजत किसी को न थी... बल्कि... कई दफे बच्चों को गहरी उत्सुकता ये ही थी कि पेटी को खोलकर देखा जाए... पर पिता का डर... इतना कि उसे छूने के पहले कई बार सोचना पड़ता था। पति की मृत्यु के बाद... उसे उन्होंने अपने संरक्षण में ले लिया था। पेटी उनकी सहचरी बन गई थी। हमराज हो गई थी। जब-जब भी उनके पास कोई चीज आई या... रुपए पैसे बचे... उपहार में मिले चाँदी-सोने के सिक्के... जेवर... सबको कपड़े में लपेटकर वे इसी पेटी में डाल दिया करती थीं। दुनिया भर का सामान... जिसका कोई हिसाब-किताब नहीं था... इसी पेटी में समा गया था। इतना ही नहीं बच्चों के परिवार से, रिश्तेदारों से बचपन से लेकर उनके शादी-ब्याह तक की चीजें... इसी पेटी में स्थान पाती गई थीं। यह पेटी... जीवित और मृत... सुंदर और असुंदर... प्रेम और मोह... वैराग्य और मोक्ष की ऐसी जगह बन गई थी जहाँ... मनुष्य का मन अटक कर रह जाता है या उस परिंदे की तरह बन जाता है जो बार-बार उसी पेड़ पर लौटकर आता है जहाँ कभी उसने घोंसला बनाया था। यह पेटी अतीत से लेकर वर्तमान तक की यात्रा की साक्षी थी। सहभागी थी।

पेटी को पास में खींचकर उन्होंने उसे थपथपाया। महीनों से जमी धूल और जालों को कपड़े से साफ किया। पुरानी धूल की गंध से उन्हें जोर का ठसका लगा... पता नहीं कितनी देर तक वे खाँसती रहीं। बेटे या बेटी को पता चलेगा तो चिल्लाएँगे कि यह सब करने की क्या जरूरत थी। क्या यह काम बाई से नहीं करवाया जा सकता था, पर वे उन दोनों को कैसे समझाएँ कि कुछ चीजें गैरों का हाथ लगने से और मैली हो जाती हैं। गीला कपड़ा करके वे पेटी को करीने से पोंछने लगीं। उनका हाथ यूँ चल रहा था जैसे पेटी न हो... नाजुक बच्चे का कोमल सुंदर और रेशमी शरीर हो... अब पेटी का रंग चमक उठा था। हल्का-सा ग्लानि का भाव उनके मन को उद्विग्न कर गया कि इतने महीनों से क्यों नहीं उन्होंने पेटी की सफाई की। चाभी निकालकर ताला खोला। उन्होंने घड़ी की तरफ बेचैन निगाहों से देखा अभी दो घंटे शेष थे बच्चों के लौटने में।

बहुत ही तल्लीनता से सामने पेटी खोलकर जमीन पर बैठ गईं। पेटी के भीतर से आती गंध उन्हें भीतर तक सिहरा गई... इस गंध को... इस गंध में डूबी चीजों को वे... एक-एक करके निकालती जा रही थीं... सामान को झाड़तीं-झड़ातीं... खोलतीं... फटकारतीं... फैलातीं... ध्यान से देखतीं। वे समय को अपने सामने से गुजरते हुए देख रही थीं। समय जो आगे जाता है... भविष्य की ओर... इस समय पीछे लौट रहा था अतीत में। अतीत के साए में। पुराने एलबम के पन्ने पलटते हुए... वे अतीत में जाकर खड़ी हो गईं। हालाँकि अलबम में पीलापन आ गया था। जगह-जगह चकते पड़ गए थे, ठीक वैसे ही... जैसे इन दिनों आपसी संबंधों में।

कितना बड़ा परिवार था सत्रह लोगों का। वे सबसे छोटी थीं। उनका विवाह भी सबसे बाद में हुआ था और वो विवाह भी क्या था...? वे अपनी माँ के साथ रहती थीं। माँ दाई थी। वहीं पर थे बाबूलाल कंपाउंडर। उनकी पत्नी गुजर गई थी। ...जाति अलग। कुल-गोत्र अलग। परिवार पक्के संस्कारों और रूढ़ियों वाला। लेकिन बाबूलाल स्वभाव से विद्रोही थे... जाति-पाँति... ऊँच-नीच... धर्म-कर्म को मानते नहीं थे... आर्य समाज में जाकर शादी कर ली... हालाँकि... दोनों में उम्र का खासा फासला था... वे... युवा... बाबूलाल की उम्र ढलान पर... पर माँ की मजबूरी ऐसी कि जवान लड़की को कैसे सँभाले... कैसे जिम्मेदारी उठाये। रिश्तेदारों ने पुरजोर विरोध किया। परिवार क्या जाति से ही बहिष्कृत कर दिया... बाबूलाल ने अपना तबादला आदिवासी इलाके में करवा लिया और उनके साथ एक नए जीवन की शुरुआत की। परिवार का एक-एक सदस्य कैसे दूर होता गया था, उनके जाते ही रिश्ते भी खत्म हो गए थे। भागती-दौड़ती दुनिया में भाई-बहिनों के बच्चों को भी कोई सरोकार न रह गया था। टप, टप... आँसू टपक रहे थे... कितनी देर तक वे यूँ ही... फोटोग्राफों को देखते हुए आँस बहाती रहीं... फिर उन्हें लगा... यह कोई रोने-बिसूरने का समय नहीं है... वे पहले आए थे इसलिए पहले चले भी गए... जाने वालों की यात्रा... कौन टाल सकता है... जीवन-यात्रा तो यूँ ही चलती आयी है। जाने वालों के साथ तमाम अच्छी बुरी चीजें और यादें भी चली जाती हैं। दुखी बातों को पकड़कर बैठे रहने से जीवन का सौंदर्य भी नष्ट हो जाता है। स्मृतियाँ प्रायः आँसू ही देती हैं। एक बार चार-पाँच साल पहले पेटी खोली थी तब सारा सामान यूँ ही बाँट दिया था। जिसको जो कीमती सामान पसंद आया था, उसने किसी न किसी बहाने हथिया लिया था।

'माई, वो छोटी-छोटी चाँदी की प्लेंटें मोनू को बहुत पसंद हैं। तुम क्या करोगी रखकर।' उन्होंने प्लेंटें खुशी-खुशी दे दी थीं।

छोटी बेटी को बाघ प्रिंट की चादरें पसंद आ गई थीं - 'ए माई, तेरी पेटी में पड़ी-पड़ी ये चादरें दीमक खा जाएँगी। इतनी सुंदर चादरें बिछेंगी तो देखने वालों का मन भी खुश हो जाएगा।' दोनों चादरें उन्होंने बेटी को थमा दी थीं। जितना सामान था, उसका बँटवारा बच्चों के बीच तो हो गया था, उनके हाथ में रह गई थी कुछ चाँदी की चीजों के साथ वह पशमीना की शॉल, जिसे उन्होंने पहली बार खरीदा था। उन्होंने वह शॉल छुपाकर रख ली थी। उन्हें लगा था कुछ सुंदर चीजें बनाकर सहेजकर रखनी चाहिए।

अभी तक सब सामान्य चल रहा था। उनके और पेटी के बीच जो कुछ था, वह किसी को मालूम नहीं था। एक अज्ञात-सा साया खड़ा था बीच में। वे अपने खर्चों के लिए बच्चों से पैसे माँग लेती थीं, क्योंकि उनके पास अपना कोई बैंक बैलेन्स नहीं था... सोना... रुपया भी नहीं रहा। सब कुछ पति सँभालते थे। अपनी छोटी-सी दुनिया में वे मस्त रहती थीं। साधारण-सा जीवन जीती आ रही थीं। खाना-पीना, सीरियल देखना, हल्के-फुल्के उपन्यास पढ़ना, योग जाना, किटी पार्टी करना... गमलों में फूल लगाना... छोटे से बगीचे को सँवारना... पूजा-पाठ और कोई एक महाकाव्य उठाकर उसका पाठ करना। बेटी के साथ रहती थीं, उनको लगता था कि तलाक के बाद बेटी और उसके बच्चों को उनकी जरूरत है। प्राण-पन से उन्होंने अपना जीवन बेटी के लिए लगा दिया था, पर पिछले कुछ महीनों से उनका सुख-चैन जाता रहा था। उन्हें हर रोज एक नई बात सुननी पड़ती। एक नई समस्या का सामना करना पड़ता। यकायक ही जैसे चारों ओर समस्याओं और मुसीबतों ने अपना जाल फैला दिया था और मजे की बात यह भी कि जो बच्चे कभी उनसे अपनी कमाई और खर्चों के बारे में बात नहीं करते थे, वही अब अपनी और अपने बच्चों की परेशानियाँ सुनाने बैठ जाते। कारण था उनके पास पैसों का आना। पुश्तैनी मकान बिके थे। वो मकान जो पति ने उनके नाम कर दिए थे, मकानों का जो भी पैसा उन्हें मिला था, उनका हिस्सा उन्होंने सबको दे दिया था। अपने हिस्से में आए पैसों की उन्होंने एफ.डी. करवा ली थी और थोड़ा-बहुत पैसा बैंक में जमा करवा लिया था। यही पैसा केंद्र में था। तनाव का कारण था रोज-रोज होने वाली बातें... हालाँकि इस पैसे ने उनकी हैसियत बढ़ा दी थी।

'मेरा सारा पैसा शेयर बाजार में डूब गया है, अब मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? मेरे बच्चों का क्या होगा?' छोटा बेटा फोन पर रोता हुआ उन्हें अपनी विफल कहानी सुना रहा था।

'सोच रहा हूँ बाहर जाकर कुछ काम करूँ, वरना बच्चों का स्कूल जाना बंद करना पड़ेगा।'

'क्या काम करोगे बाहर जाकर?'

'कोई भी बिजनेस'।

'इतने सालों में सबके कहने-सुनने पर भी बिजनेस नहीं किया तो अब क्या करोगे? जब मालूम था कि शेयर बाजार में पैसा डूब जाता है तो लगाया क्यों था? क्या तुम्हारी ऐसी स्थिति थी?'

'माई, मेरा तो मेरा राधा का भी पैसा डूब गया। उसने पचास हजार रुपए जी.पी.एफ. से निकालकर दिए थे... सोचा था उबर जाऊँगा पर... मन करता है...

'ऐसे हिम्मत हारते हैं क्या?'

वह चुप रहा। बेटे की चुप्पी ने उन्हें भीतर तक हिला दिया। बच्चों और बहू से बात की तो पता चला कि रोजमर्रा की चीजों की कटौती की जा रही है। सारी जमापूँजी खत्म हो चुकी थी।

सच और झूठ के बीच वे निर्णय नहीं ले पा रही थीं कि यह पैसा खींचने का नाटक था या वाकई असफलता का दर्द। हताशा। भविष्य के अँधेरे। यह बता रहा था कि कुल मिलाकर साढ़े आठ लाख रुपए डूब गए। 'अब जो उनके हाथ में पैसा था वह भी दे दिया... और खुदा ना खास्ता वह भी गया तो तुम्हारा और मेरे बुढ़ापे का एकमात्र सहारा फिर क्या बचा?' कह तो दिया उन्होंने पर मन भारी हो उठता, मन धिक्कारने लगता - बेटा मुसीबत में है... बच्चों की पढ़ाई का... भविष्य का सवाल है... नहीं दिया तो... सारा दोष मेरे मत्थे आ जाएगा।

'दादी मेरे साथ की सारी लड़कियाँ बाहर पढ़ने जा रही हैं। यहाँ इस छोटे से शहर में कोई स्कोप नहीं है। कोई ढंग का पढ़ाने वाला नहीं है... मैं पीछे रह जाऊँगी।' लड़की रोते-रोते कह रही थी।

'तो जाओ, किसने रोका?'

'पर दादी, चालीस हजार रुपए अभी जमा करने हैं। मम्मी-पापा ने तो सब बंद कर दिया है... फ्रिज, टी.वी., दूध। रात-दिन पापा लड़ते रहते हैं। उनको ब्लडप्रेशर हो गया है। मम्मी अकेली क्या-क्या करें... पापा पागल न हो जाएँ...।'

वे गहरी सोच और चिंता में डूब गईं। एक मन करता पैसे दे दें, दूसरा मन करता अगर पैसे दे दिए और फिर से शेयर बाजार में लगा दिए तो... और लाख-डेढ़ लाख रुपए में आजकल कौन-सा बिजनेस होता है...। इधर नीना (लड़के की बेटी) पैसे माँग रही है। उसके भविष्य का सवाल है। लड़के-बहू से कितना भी विरोध क्यों न हो, बच्चों के सवाल पर मन पिघल ही जाता है। उन्हें तो कुछ समझता नहीं है कि कोचिंग कितने की होती है... और कितनी की ट्यूशनें। इतनी महँगी पढ़ाई, इतने में तो उनके चारों बच्चों ने पूरी पढ़ाई कर ली थी। रात-दिन... मन छटपटाता रहता...। बेटा क्या सोचेगा कि माँ के पास पैसे हैं और वह दर-दर की ठोकरें खा रहा है। पोती के बालमन पर क्या असर पड़ेगा कि दादी ने पढ़ाई के लिए पैसे नहीं दिए थे? इससे अच्छा तो तब था जब वे खाली हाथ रहती थीं। न कोई अपनी समस्या बतलाना न उन्हें इस तरह की मारक आत्म-तकलीफ से गुजरना पड़ता था। पैसा आते ही वे सलाह देने वाली बन गई थीं।

दो दिन की ऊहापोह के बाद उन्होंने नीना को बुलाकर पैसे दे दिए थे... अब उनका मन हल्का था। शांत था! अपरोध बोध के भार से मुक्त। कोई चट्टान... हट गई हो जैसे। मन और आत्मा दोनों ही जानलेवा युद्ध से मुक्त हो गए थे।

'चलो पैसा उसकी पढ़ाई के काम तो आया।'

'अब आगे तो जरूरत नहीं पड़ेगी?'

'नहीं!'

'अब मेरे पास बचा भी क्या है?'

बाद में पता चला कि पहले दिए रुपयों में से बेटे ने पचास हजार रुपए लड़की के नाम जमा करवा दिए थे - एफ.डी. के रूप में। उनके मन को, विश्वास को, निष्छल चिंता को गहरा आघात लगा था। आघात इसलिए भी लगा था कि उसने पैसों के लिए अपनी अबोध लड़की को भी साजिश में षामिल कर लिया था।

'एक-एक पैसा वसूल कर रहा है। ब्लैकमेल कर रहा है। अब भूलकर भी पैसे मत दे देना।' सुनकर बड़े बेटे ने नसीहत दी - 'मुझे को शक है कि वह पैसा भी शेयर बाजार में डूबा होगा। मैं कह रहा हूँ कि वह फिर कोई कहानी सुनाएगा और तू पिघल जाएगी... तू बचाकर पैसा...।'

उन्होंने हिसाब लगाया, सचमुच उनका अपना तो कोई खास खर्च था नहीं... न घूमना-फिरना, न सामान खरीदना... न कोई और शौक... जबकि हमउम्र महिलाएँ देश-भ्रमण या तीर्थ-यात्रा पर निकलती हैं। बुढ़िया सोने-चाँदी के गहने पहनती हैं... और वे...

'सोच रही हूँ पुरानी सोने की चूड़ियाँ बदलकर नई चूड़ियाँ ले लूँ।' एक दिन उन्होंने डरते-डरते कहा।

'बाकी पैसा कहाँ से आएगा?'

'इतना पैसा सबको दे दिया... मैंने पूछा तुम लोगों ने कहाँ खर्च किया... थोड़ा-बहुत पैसा अपने पर खर्च कर लूँ...।' उन्होंने हँसते हुए कहा।

सबने उनकी कलाइयों की तरफ ऐसे देखा मानों उन्होंने कोई अनहोनी बात कह दी हो।

'देखो... माई को इस उम्र में जेवर पहनने का शौक हो रहा है...।' छोटी बहू ने ताना मारा था।

पर पहली बार उन्होंने ऐसा कदम उठाया था... जब अपनी इच्छा के अनुसार अपने लिए कोई नई चीज खरीदी थी, अन्यथा पूरा जीवन पति की इच्छा के अनुसार चला, तब उनका दौर था और अब बच्चों की टोका-टाकी...।

कुछ ही शांति के बीते होंगे कि बड़े बेटे का फोन आ गया - 'सुन माई, मैं तुझसे कहना तो नहीं चाहता था... लेकिन क्या करूँ...? मेरी सैलरी रुकी हुई है। हाउसिंग लोन की किश्तें भरनी होती हैं, वह भी रुकी हुई हैं। बच्चों को पैसे भेजने हैं। तू एक काम कर मुझे कुछ महीनों के लिए ब्याज पर पैसे दे दे। जितना ब्याज बैंक में जाता है उतना मैं तुझे दे दूँगा।'

'मेरे पास क्या बचा है। बस वही एक एफ.डी. पड़ी है।'

'एफ.डी... उस पर तू लोन ले सकती है।' बेटे ने प्रस्ताव दिया।

'जरूरी कितना पैसा चाहिए?'

'कम से कम पच्चीस हजार।'

उनका बचत का पैसा... जो यहाँ-वहाँ से बचाकर चुपचाप पेटी में डाल दिया जाता था... उन्होंने चुपचाप निकाला... पूरे सत्ताइस हजार थे।

बेटा सोचेगा... पहले देने से मना कर दिया था... या सोचेगा मैं ब्याज पर पैसे दे रही हूँ। घर में ही साहूकारी कर रही हूँ... पर... इन लोगों के चक्कर में सारा पैसा चला जाएगा। मुझे कौन-सा छाती पर रखकर ले जाना है। बचाकर रखूँगी तो इन्हीं के काम आएगा...। बहुत सोच-विचार करने के बाद उन्होंने एक तरकीब निकाली और बेटे से बोलीं - 'सुनो, मैंने वर्मा जी से बात की थी - तुम समय पर उनके पैसे लौटा देना... और महीने के महीने ब्याज दे देना...।' कहते हुए मन में खराब भी लगा... लेकिन इस समय... यही सही था।

'मैं सैलरी मिलते ही पैसे लौटा दूँगा।' बेटे ने आश्वस्त करते हुए कहा।

कुछ महीने तो समय पर ब्याज का पैसा मिलता रहा, पर बाद में बेटे की स्थिति और खराब होती गई। वे कई बार याद दिलातीं तब बेटा कह देता - 'तू दे दे... मैं तेरा पूरा हिसाब-किताब कर दूँगा...।' बेटा लापरवाही के साथ कहता। कई महीनों का ब्याज चढ़ गया था। वे हर महीने याद दिलातीं। पैसा मिले तो पेटी में डाल दें या कोई सामान खरीद लें, पर बेटा था कि पैसे लौटाने का नाम नहीं ले रहा था!

'माई, मैं बाहर जा रहा हूँ...। पचास हजार रुपए जमा करने हैं...। काम अच्छा है...। मैं कब तक छोटे-मोटे काम करता रहूँगा।' एक महीने के बाद छोटा बेटा अपनी समस्या को रख रहा था।

'देखो नरेश, साफ-साफ सुन लो। मेरे पास बिल्कुल पैसे नहीं हैं। मैं जितना दे सकती थी, दे चुकी हूँ।'

'एफ.डी. तो है, उस पर लोन लेकर दे दे। मैं सारी किश्तें चुका दूँगा और तेरी एफ.डी. भी बची रहेगी।'

'नहीं, यह सब नहीं होगा। अपनी व्यवस्था खुद करो।'

गुस्से में आकर उन्होंने फोन रख दिया। क्या सचमुच बच्चे इतने ही परेशान रहते थे और उन्हें बताते नहीं थे... या उनसे पैसे लेने के लिए ये तमाम परेशानियाँ बताई जा रही हैं...। रात-रात भर वे करवटें बदलती रहतीं। मन करता क्या रखा है इन पैसों में... दे दो... सब दे दो। खाली कर लो अपने आपको। हो सकता है इन पैसों से उसका काम चल निकले। रोज-रोज माँगने की नौबत ही न आए...

'माई, तुझे किसी चीज की कमी है क्या... मैं सारा पैसा वापस कर दूँगा।' बेटा मिन्नत कर रहा था, अपने लिए सहारा तलाश रहा था।

'क्यों रे, जिस उम्र में तुम सबको मेरी देखभाल करनी चाहिए, उस उम्र में मैं तुम लोगों की चिंता कर रही हूँ। रात-दिन चिंता में घुलती रहती हूँ। ऐसा भी क्या करते हो तुम लोग कि हमेशा पैसों की तंगी बनी रहती है?'

कहने को तो कह दिया, पर मन ही मन घबरा भी रही थीं। लग रहा था चारों तरफ से घिर गई हैं... कहीं निकलकर अपना मन हल्का करना चाहती थीं... सो कुछ दिन बाद उन्होंने घोषणा कर दी कि वे चारों धाम की यात्रा पर जा रही हैं।

'अकेले! इस उम्र में! तबियत खराब हो गई या कुछ और हो गया तो?'

'कुछ नहीं होगा...। मेरा भी मन करता है कि मैं बाहर निकलूँ... घूमूँ... तुम लोग तो कहीं ले जाते नहीं... तुम्हारे पिता ने कभी घर से बाहर नहीं निकलने दिया।'

'देखो माई, कितनी स्वार्थी हो गई है, अकेले घूमने जा रही हैं। हम लोगों को भी नहीं ले जा रही हैं।' बच्चे उन्हें चिढ़ा रहे थे।

'कितना पैसा लगेगा?'

'कितना भी लग जाए। तुम लोगों को तुम्हारा पैसा मिल गया न। मैंने अपना हिस्सा भी दे दिया।'

'हमको क्या करना है। वे चाहें जो करें, हमें कोई हक नहीं बनता कि उन्हें रोकें-टोकें, उनसे हिसाब-किताब पूछें... पूरा जीवन उसने हिसाब दिया है... कभी काम का कभी अपने अच्छे होने का... अपने समर्पण का, कभी अपने ममत्व का, कभी अपने त्याग का... हम हमेशा... जन्म से उससे हिसाब माँगते आ रहे हैं कि कितना किया... कितना दिया... और... हम... हमने दिया कभी हिसाब या उसने माँगा हिसाब...' बड़ा बेटा उनके पक्ष में बोल रहा था। उन्होंने पैसे दिए यही क्या कम है। कुछ दिन सब शांत रहे। किसी ने किसी से कोई सवाल-जवाब नहीं किया। अपने-अपने कामों में व्यस्त। अपनी-अपनी दुनिया में मस्त, पर सारी बातें उनके दिल दिमाग में घूम रही थीं, उन्हें बेचैन किए हुए थीं।

उन्हें लगने लगा था कि यह जमाना इतने सीधेपन का नहीं है। रिश्तों... यहाँ तक कि खून के रिश्तों में भी दृष्य-अदृष्य दरारें होती हैं - विश्वास-अविश्वास की दरारें...। लेन-देन की। सत्ता-शक्ति की। अधिकार और हैसियत की। थोड़ा नाटक... थोड़ी बातें... थोड़ी बहानेबाजी तो आनी ही चाहिए। पेटी में पड़ा खाली बैग थोड़ा-थोड़ा भरने लगा था। अपनी बूढ़ी होती देह को सँभालना भी उन्हें जरूरी लगने लगा था। दर्द वो भी बुढ़ापे का दद। यह दर्द फुर्र से उड़ता-बहता, शरीर के किसी भी हिस्से में अपना घोंसला बना लेता था। अब छोटी-छोटी बातें उन्हें आहत करने लगी थीं कि बेटों के घरों में उनके लिए मजबूरीवश या अन्य किसी कारणवश जगह नहीं थी या कभी उन्हें लगता कि अब बेटी के पास भी उनके लिए समय नहीं है। दफ्तर से लौटते ही वह ऊपर अपनी बेटी के पास चली जाती है, जबकि वह दिनभर से उसका इंतजार कर रही होती है या उसका बेटा उन पर चिल्ला पड़ता है, उसे उनकी टोका-टोकी पसंद नहीं आती है... या उनके अपने बेटे उनको उतना महत्व नहीं देते हैं... बहुओं के मन में अपनी-अपनी गाँठें हैं।

फिर उन्हें लगा... नहीं उन्हें रोती-धोती दयनीय बुढ़िया नहीं बनना है। वे किसी की दया पर नहीं जीना चाहती हैं। अपने होने की प्रतीति करवानी पड़ती है, अपना अधिकार माँगना पड़ता है। उन्होंने पाँसा पलटा...। अपने भीतर का ग्लानिभाव उन्होंने धो डाला...। जितना करना था कर दिया...। अब वे बच्चों को रेस्टोरेंट ले जातीं। मोहल्ले में होने वाले समारोहों में भाग लेतीं। किटी पार्टी में जातीं। सारे त्योहार पर सबको आमंत्रित करतीं...। खुद भी सलीके से रहतीं। बालों को रँगतीं। आइसक्रीम, कोल्ड ड्रिंक्स बुलाकर पीतीं। हर रोज नई चीजें बनाना-खिलाना उनकी दिनचर्या में शुमार हो गया था। मन को ठेस पहुँचाने वाली बातों को उन्होंने छुपाना या दरकिनार करना सीख लिया था...

पर... यह सब उनकी तरफ से किया गया प्रयास था। बड़ा बेटा फिर उनके सामने खड़ा था। उदास, बुझा चेहरा। कई दिनों से गोया सोया न हो, इस तरह की सूरत बनी हुई थी।

'क्या हो गया?'

'क्या बताऊँ माई?'

'हो क्या गया... कुछ पता तो चले।'

'मुझे एकाएक पैसों की जरूरत आन पड़ी है।'

'मेरे पास तो हैं नहीं। तुमने वर्मा जी के पैसे लौटाए होते तो दुबारा माँग सकती थी। एफ.डी. के पैसे नरेश ने ले लिए हैं।'

'तूने दे दिए।' उसको झटका-सा लगा।

'तो क्या करती। आत्महत्या करने की धमकी दे रहा था।'

'मुझसे एक बार पूछा तो होता।'

'क्या पूछती, क्या बताती?'

'हरामखोर बहाने बनाता है। तू उसकी बातों में आ जाती है। क्या जरूरत थी उसको पैसे देने की। कितने रुपए ले चुका है। वो चाहता है कि तेरे पास पैसे न रहें। अगर तेरे पास पैसे रहे तो मैं ले लूँगा।'

'जाने भी दो...। पैसे पड़े ही तो थे। उसके काम आ जाएँगे। मैं तो चाहती हूँ वह काम धंधे में लग जाए बस!'

वे बात को आगे नहीं बढ़ाना चाहती थीं, इसलिए उन्होंने बात को वहीं खत्म कर दिया।

अजीब तमाशा था। जब भी पैसों की बात आती, दोनों भाई एक-दूसरे को पैसे न देने की नसीहत देने लगते अपने-अपने तर्कों के साथ। उन्हें डाँटने-समझाने लगते, लेकिन जब खुद की बारी आती तो उतनी ही बेदर्दी और बेशर्मी से उनसे पैसे ले जाते।

'सुन माई, तू ये चैक रख ले!'

'किसलिए? मैं चैक का क्या करूँगी?'

'ब्याज का पैसा देना था न और दूसरा यह चैक... तू अपनी चूड़ियाँ दे सकती है... क्या... एक हफ्ते बाद उठाकर दे दूँगा!'

वे उसका चेहरा देखती रह गईं। अंदर जैसे आँधी उठी हो... अपनी तमाम शिकायतों... गुस्से... क्षोभ और नसीहतों को जप्त किए रहीं...। समझ में नहीं आ रहा था कि क्या कहें या नहीं। उनकी इकलौती स्त्रीधन 'चूड़ियाँ' भी जा रही थीं।

उन्हें लगा एक भाई दूसरे भाई का नाटक कितनी होशियारी से फ्लाप करता है। पता नहीं एफ.डी. के पैसे वापस भी होंगे या नहीं। चूड़ियाँ उठेंगी भी या नहीं। सामने पड़े दो चैक भुनेंगे भी या वापस खाली रह जाएँगे...। जो सामने था वह सब लिया-दिया जा चुका था। बस जो था वह इस पेटी में था।

उन्होंने एक-एक सामान करीने से जमाया। जब सारा सामान जम गया तो ताला लगा दिया। एकटक वे पेटी को देखती रहीं। यह पेटी उनके लिए संपूर्ण ब्रह्मांड थी...। पेटी को देखकर उसे छूकर उन्हें खुशी महसूस हो रही थी। उन्हें लगा, क्योंकि पति की पेटी ही उनकी सच्ची हमदर्द थी... हमराज थी... उनकी जिजीविषा थी। जब भी उन्हें विरक्ति होने लगती, असुरक्षा का भाव घेरने लगता... वे उसके सामने बैठ जातीं... और ऐसे संवाद करतीं जैसे किसी अपने... खास बेहद प्रिय... से बात कर रही हों... यह पेटी ही तो है जो तमाम रहस्यों को अपने भीतर समेटे हुए उनके जीवन की शेष-यात्रा का संबल बनी हुई थी।