हमारे साथी की कहानी / क्यों और किसलिए? / सहजानन्द सरस्वती

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अपने साथी श्री हरिनारायण जी के बारे में यहीं पर कुछ कह देना चाहता हूँ, घर में उनको कोई लड़का न था। सिर्फ लड़कियाँ, स्त्री और फूआ थीं। फूआ बूढ़ी विधवा थीं और वहीं रहती थीं। वे कभी-कभी एकाध पत्र स्त्री को सांत्वना देने के लिए लिख दिया करते थे और यह साफ नहीं लिखते थे कि संन्यासी हो गए। मैं यह चीज पसंद नहीं करता था, पर करता क्या?वे श्रेष्ठ थे और मुझे बहुत कुछ उनने सिखाया था। फिर भी मैंने यहाँ तक ख्याल नहीं किया कि उसका परिणाम बहुत दूर तक जाएगा। लेकिन हुआ वही। जब सन 1908 ई. में हम और वह बदरीनारायण की यात्रा में अलग हो गए तो वह वहाँ से लौट कर घूमते-घूमते काशी आए, घर जा पहँचे और गाँव से दूर कुटी बनवा कर रहने लगे। पीछे तो गेरुआ फेंक कर गृहस्थ भी बन गए! बहाना यह निकाला कि जमीन-जायेदाद की कोई लिखा-पढ़ी न होने के कारण स्त्री को कष्ट होगा और दूसरे संबंधी जायेदाद ले लेंगे। उन्होंने जायेदाद की लिखा-पढ़ी की। शायद एकाध संतति भी पैदा की। फिर दोबारा संन्यासी बने और मुझसे मिले। इस बार मेरे गुरु जी से ही दंडी बने। तब तक मैं भी दंडी हो चुका था। यह बात यथास्थान आगे आएगी।

मैंने काशी में दर्शन काफी पढ़े और व्याकरण भी। फिर दोनों साथ ही भ्रमण के लिए निकले। साथ में बहुत ज्यादा दर्शन ग्रंथों का गट्ठर भी लाद लिया। क्योंकि इस बार उन्हें ये ग्रंथ पढ़ने थे और मुझ पढ़ाने। अंत में गुजरात में वर्ष के कई मास पाटन में रह के वे फिर मुझसे अलग हो गए। मैं तो काशी फिर आ गया और वे भी कुछ दिनों के बाद पुन: घर पहुँचे और वहीं रह के संन्यासी के वेष में ही गृह प्रबंध करने लगे। मुझे खबर लगी तो वहाँ गया और वे मुझसे मिले। मैंने समझाया कि यह पाखंड क्यों करते हैं, गृहस्थ बन कर रहिए और फिर यहाँ से न हटिए। उन्होंने बात मान लीव। लेकिन कुछ दिनों बाद फिर संन्यासी बने और आखिर में पुन: घर आ गए तब से बराबर वहीं रहने लगे।

ईधर जब कभी भेंट हुई मैंने उन्हें साहस बँधाया। मैं जानता था कि उनमें यह कमजोरी है। इससे वे लज्जित भी बहुत रहते थे। अच्छे विद्वान और धर्म-कर्म के ज्ञाता हो कर भी उनकी यह दशा हुई। इससे हमें शिक्षा मिलती है। उनकी पहली बार जो यह हरकत हुई और घर चले गए उससे मेरे संबंधियों को भी साहस हुआ कि मुझ पर भी दबाव डाल कर घर ला बैठाएँ। मगर मैं इसमें कब पड़नेवाला था?पीछे तो उन लोगों ने सदा के लिए यह विचार छोड़ ही दिया। वह उनका अंतिम प्रयत्न था। तब से मुझे कितनी ही बार उधर जाने का अवसर मिला है। मगर गाँव घर के लोगों के भाव अब दूसरे ही पाए गए हैं।