हर फ्रेम शेक्सपीयराना है / जयप्रकाश चौकसे

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हर फ्रेम शेक्सपीयराना है
प्रकाशन तिथि : 04 अक्टूबर 2014


विशाल भारद्वाज की "हैदर' शेक्सपीयर के सबसे महान और सबसे लंबे नाटक से प्रेरित फिल्म है। चार हजार पंक्तियों के इस नाटक पर सबसे अधिक शोध हुए हैं और अनगिनत व्याख्याएं उपलब्ध हैं। इस कृति की महानता का यह आलम है कि हैमलेट शेक्सपीयर को कभी मरने नहीं देगा, जन्मदाता शिशु के नाम से भी जाना जाए, यह एक विलक्षण बात है। विशाल भारद्वाज ने भी इसी तर्ज पर अपना नाम दर्ज कर दिया है और वे ताउम्र "हैदर' के नाम से जाने जाएंगे। एक सौ इकसठ मिनट की फिल्म की हर फ्रेम, हर क्षण पूरी तरह शेक्सपीयराना है।

यूटीवी भी बधाई की पात्र है जिसने चालीस करोड़ का जोखम लिया है। इसमें पैसे की हानि तो अवश्य होगी परंतु कई काम लाभ-हानि के परे किए जाते हैं। लक्ष्मी पूजन का एक मात्र सत्य भी धन की पूजा नहीं है, यहां तक कि बहीखाते में भी लाभ शुभ और शुभ लाभ के दो हिस्से हैं। विगत साठ वर्षों में कश्मीर में अनगिनत फिल्मों की शूटिंग हुई है परंतु विशाल भारद्वाज कश्मीर की अंतड़ियों में पहुंचे हैं और वर्षों से हो रहे अन्याय का मवाद वे दिखाते हैं तथा यह काम जुगुप्सा नहीं वरन सहानुभूति के साथ करते हैं। कश्मीर में तैनात भारतीय फौज द्वारा किए गए कथित अन्याय और उनके द्वारा स्थापित गुप्त यातना शिविरों का विशद विवरण उन्होंने प्रस्तुत किया है। कुछ साल पहले बनी "शौर्य' में भी यह मुद्दा उठाया गया था। तमाम राजनीतिक नारेबाजी और पूर्वग्रह को त्याग दें तो भी यह बात चिंतनीय है कि भारतीय फौज के व्यवहार के कारण उत्तर-पूर्व के सातों प्रांतों के लोगों के मन में भारत के प्रति संशय की भावना पैदा हुई है और इस कार्य में वहां के नेताओं ने भी संदिग्ध भूमिका निभाई है। इसीलिए विशाल की फिल्म में खलनायक नेता भी हैं, फौजी अफसर भी हैं।

क्या इस विवादास्पद विषय पर खुलकर बहस हुई है? क्या प्रशासन और फौज धर्मनिरपेक्ष रहे हैं? जरा विचार करें कि फौज कोई ऐसा द्वीप नहीं होता जिस पर पूरे समाज की लहरों का प्रभाव नहीं पड़ता। बहरहाल विशाल भारद्वाज ने साहस दिखाया है परंतु उन्होंने यह बात आधी ही कही है कि सन् 48 में जनमत की बात उठाई थी। पाकिस्तानपरस्त नेताओं ने जनमत नहीं होने दिया क्योंकि उन्हें भय था। विशाल ने कश्मीर को अपने हैदर का डेनमार्क बनाया परंतु हैदर के पिता को राजा नहीं वरन् एक धर्मनिरपेक्ष डॉक्टर बनाया है जो आतंकवादी का भी इलाज करता है जैसे अपने अन्य मरीजों का करता है। यही डॉक्टर का धर्म है, फांसी पर चढ़ाए जाने वाले कातिल को भी चिकित्सा का अधिकार है। यह संभव है कि विशाल ने इस पात्र को राजा नहीं डॉक्टर बनाया है क्योंकि वह एक रोग को प्रस्तुत कर रहा है। धरती के स्वर्ग कश्मीर को रोग में किसने बदल दिया? विशाल का सबसे बड़ा कमाल यह है कि शेक्सपीयर ने हत्या किए गए राजा के भूत के द्वारा हैमलेट को अपने कत्ल की जानकारी दिलाई तो विशाल ने भूत के बदले एक पात्र गढ़ा जिसका नाम रूह है और उसने हैदर के पिता के साथ यातना शिविर में पीड़ा भोगी है और उसी समय वह कहता भी है कि डॉक्टर तुम मरोगे क्योंकि तुम शरीर हो, मैं जीवित रहूंगा क्योंकि मैं रूह हूं।

यह सृजनात्मकता का मास्टर स्ट्रोक है। इसी तरह हैमलेट का ग्रेव डिगर दृश्य भी "हैदर' में गीत सहित जस का तस प्रस्तुत है। कब्र खोदने वाले मजदूर थक जाने पर कब्र में विश्राम करते हैं गाेयाकि मृत्यु पूर्व उस अनुभव को महसूस करते हैं। मूल में नायिका राजा के वफादार मंत्री की बेटी है परंतु विशाल ने उसे भ्रष्ट फौजी अफसर की बेटी बनाया है- शैतान की गोद में भी मासूम परी पल सकती है। विशाल ने एक परिवर्तन यह भी किया है शेक्सपीयर की बेवफा रानी मरती है परंतु विशाल पश्चाताप में जलती हैदर की मां को मानव-बम बनाकर दुष्टोें के साथ नष्ट कराते हैं। शेक्सपीयर ने भी मां-बेटे के आपसी अनुराग को सीमा पार जाकर प्रेम में बदलने के संकेत दिए थे और विशाल ने भी वैसा ही किया है। क्लाइमैक्स के दृश्य में मां बेटे के होठों को चूमती है। जो स्त्री मानव बम बन रही है वह मृत्यु का आलिंगन ही कर रही है।

मनुष्य मन का अवचेतन रहस्यमयी गुफा की तरह है जिसके अंधेरे कोनों में जाने कितने ब्रह्मांड छुपे हैं और शेक्सपीयर बार-बार उसे समझने का प्रयास करते हैं, वे आलोचक की तरह नहीं वरन् जिज्ञासु की तरह करते हैंं। विशाल भी उनके चरणचिन्हों पर चलने की कोशिश हैदर में करता है।