हिन्दी कविता में हाइकु का स्वरूप , स्थान एवं सम्भावना/ रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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जब हम कविता की बात करते हैं तो उसका तात्पर्य केवल छन्द या मुक्त छन्द नहीं, वरन् सफल अभिव्यक्ति में अनुस्यूत वह अनुभूति है जो रसज्ञ को प्रभावित करती हो। छन्द या मुक्त छन्द सभी में ऐसा काव्य रचा गया है, जो पाठकों और श्रोताओं को प्रभावित करता रहा है। कुछ का सोचना और कहना है कि छन्द में बँधकर हृदय की बात को अखण्डित रूप से व्यक्त नहीं किया जा सकता है। मेरा ही नहीं सभी का कहना है कि भावोद्रेक के बिना मुक्त छन्द में भी कुछ नहीं कहा जा सकता है। इसी सन्दर्भ में मैं कहना चाहूँगा कि जैसे दोहा-चौपाई सिर्फ़ छ्न्द नहीं, उसी प्रकार हाइकु भी सिर्फ़ छन्द नहीं वरन् हाइकु वह है, जिसमें कुछ कहा गया हो। निष्प्राणता को काव्य नहीं कहा जा सकता। दूसरी बात-जापानी हाइकु का सीधे या अंग्रेज़ी के माध्यम से जो हिन्दी अनुवाद अब तक सामने आए हैं, वे केवल अनुवाद है; हाइकु नहीं। टैगोर अज्ञेय, सत्यभूषण वर्मा और अंजली देवधर के अनुवाद केवल अनुवाद हैं, हाइकु नहीं। अज्ञेय जी के हाइकु में भी हाइकु के नियम का पालन नज़र नहीं आता।

ज्ञानपीठ से प्रकाशित पुस्तक-'रचनात्मक लेखन'-सम्पादक: प्रो रमेश गौतम, ग्रन्थमाला सम्पादक-रवीन्द्र कालिया जी. प्रकाशक: भारतीय ज्ञानपीठ, तो और भ्रमित करने वाली है। पृष्ठ 128 देखिएगा-'

' विदेशों से हमारे यहाँ सॉनेट ही नहीं आया जापानी हाइकू भी आया। हाइकू तीन पंक्तियों का एक जापानी छन्द है। हम इसका एक उदाहरण यहाँ दे रहे हैं:

नहीं, मेरे घर नहीं /

वह टपटपाता छाता

पड़ोसी के यहाँ चला गया।

हिन्दी में दसियों कवियों ने हाइकू संकलन छपवा डाले हैं। "

मेरा विनम्र निवेदन है कि इस पुस्तक में दिया गया यह उदाहरण हाइकु का है ही नहीं। यह पुस्तक 2007 में छपी तब तक सैंकड़ों स्तरीय संकलन छप चुके थे। यदि डॉ भगवत शरण अग्रवाल का या जापानी भाषा के विद्वान् डॉ सत्यभूष्ण वर्मा का 'हाइकु' पर लिखा कुछ पढ़ लिया होता तो ज्ञानपीठ से छपने वाली पुस्तक में इस तरह की लचर जानकारी नहीं दी जा सकती थी। हिन्दी-जगत का साधारण रचनाकार भी हाइकु के नाम पर इस तरह भ्रमित नहीं है। जहाँ तक विषयवस्तु की बात है जापान में यह स्वीकार कर लिया गया कि हाइकु-सर्जन किसी भी विषय पर हो सकता है। मूल जापानी के अंग्रेज़ी अनुवाद के साथ बोस्टन और लन्दन से छपा जापान के सैंकड़ों साल पुराने कवियों का संग्रह 'लव हाइकु' इसका प्रबल प्रमाण है।

हाइकु के क्षेत्र में ' हिन्दी का प्रथम हाइकु कवि बाल कृष्ण बालदुआ माने जाते है, जिन्होंने 1947 में अनेक हाइकु लिखे। उदाहरण स्वरूप एक हाइकु देखा जा सकता है-

बादल देख / खिल उठे सपने / खुश किसान। " [परिषद्-पत्रिका अंक अप्रैल 2010-मार्च 2011, पृष्ठ-182]

डॉ भगवत शरण अग्रवाल (शाश्वत क्षितिज-1985) और डॉ सुधा गुप्ता (ख़ुशबू का सफ़र-1986) के एकल संग्रहों से शुरू हुई हिन्दी हाइकु काव्य की यह यात्रा 2012 तक आ पहुँची है। हिन्दी-जगत के कई सौ समर्थ कवियों ने इस लघुकाय छन्द को अनुप्राणित किया है। कुशल सम्पादन और एकल संग्रहों के माध्यम से हिन्दी काव्य की गहनता सामने आई है। स्वयं असमर्थ रचनाकार होने के कारण हाइकु के नाम पर नाक-भौं सिकोड़ने वाले दुराग्रही लोगों की कमी नहीं है। हिन्दी हाइकु काव्य की सबसे बड़ी विशेषता रही है छन्द के अनुरूप रचनाकर्म करके अपनी शक्ति का परिचय देना। केवल पिछले तीन साल के ही कतिपय संग्रहों का जिक्र करें तो 2010, में डॉ मिथिलेश दीक्षित के हाइकु संग्रह (तराशे पत्थरों की आँख-, सदा रहे जो-2010) , डॉ कुँअर बेचैन (पर्स पर तितली, 2011 में रामेश्वर काम्बोज 'हिमांशु' (मेरे सात जनम) , डॉ मिथिलेश दीक्षित (लहरों पर धूप, एक पल के लिए, अमरबेल, आशा के बीज) , रेखा रोहतगी (अथ से इति-हाइकु और ताँका संग्रह) , 2012 में सुदर्शन रत्नाकर (तिरते बादल-हाइकु और माहिया) , डॉ भावना कुँअर (धूप के खरगोश) , डॉ अनीता कपूर (दर्पण के सवाल-हाइकु-ताँका संग्रह) , हरे राम समीप (बूढ़ा सूरज) , मिथिलेश दीक्षित (बोलती यादें) कतिपय ऐसे संग्रह हैं जो हिन्दी हाइकु की परिपक्वता की पुष्टि करते हैं।

'हिन्दी हाइकु डॉट नेट' सम्पादक-डॉ हरदीप सन्धु, रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’ के माध्यम से आज तक 24000से अधिक हाइकु और कई सौ रचनाकार मौज़ूद हैं। यह अन्तर्जाल पत्रिका 110 देशों तक अपनी पहचान बना चुकी है। यही नहीं वरिष्ठ हाइकुकारों के अतिरिक्त हिन्दी के नए ऊर्जावान् हाइकुकार भी विश्व के हर कोने से अपनी रचनाधर्मिता का अहसास करा रहे हैं और इस विश्वास को पुख़्ता कर रहे हैं कि हिन्दी के इन हाइकुकारों की शक्ति हाइकु साहित्य को उर्वर करेगी। इनमें प्रमुख हैं-डॉ हरदीप कौर सन्धु, कमला निखुर्पा, डॉ जेन्नी शबनम, सुभाष नीरव, प्रियका गुप्ता, रचना श्रीवास्तव, मंजु निश्रा, मुमताज टी एच खान, उमेश महादोषी, डॉ अमिता कौण्डल, नवीन चतुर्वेदी, डॉ अनीता कपूर, शशि पाधा, सीमा स्मृति, डॉ ज्योत्स्ना शर्मा, कृष्णा वर्मा, सुशीला शिवराण, तुहिना रंजन, जया नर्गिस, ज्योतिमयी पन्त, भावना सक्सेना, डॉ नूतन गैरोला, अनुपमा त्रिपाठी, डॉ क्रान्ति कुमार, डॉ सारिका मुकेश, मंजु गुप्ता, रेनू चन्द्रा माथुर, डॉ सरस्वती माथुर, वरिन्द्रजीत सिंह बराड़, प्रो दविन्दर कौर सिद्धू, शशि पुरवार, स्वाति भालोटिया, चन्द्रबली शर्मा, डॉ आरती स्मित, निर्मल सिद्धू, डॉ कविता भट्ट , अनिता ललितआदि सैकड़ों रचनाकार सक्रिय रूप से हाइकु को समृद्ध कर रहे हैं।

मुझे पूरी आशा है नए-पुराने सभी रचनाकार अपने जीवन-अनुभवों को समाहित करके हिन्दी हाइकु को और अधिक गरिमामय स्वरूप प्रदान करेंगे। नेट पत्रिकाओं में अनुभूति, लेखनी डॉटनेट, गर्भनाल ही नहीं प्रिण्ट में भी उदन्ती, हिन्दी चेतना (दोनों नेट पर भी) , वीणा, नवीन भाषा सेतु, लोकगंगा, वस्त्र-परिधान, हिन्दी चेतना, सादर इण्डिया, जगमग दीप ज्योति आदि पत्रिकाएँ भी हाइकु छाप रही हैं। यह कार्य हिन्दी हाइकु के उज्ज्वल भविष्य की ओर निर्णायक कदम है।