हिन्दी हाइकु में प्रेम का चित्रण /रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

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हाइकु के लिए कोई विषय प्रतिबन्धित नहीं है। इस नाज़ुक विधा के लिए इतना तो ज़रूरी है कि इसमें 'काव्य' के 'कोमलतम' भावों की अभिव्यक्ति हो। काव्य होना तो अनिवार्य शर्त है। शॉर्टकट की आपाधापी में काव्य की जगह शब्दजाल लेता जा रहा है, जिसमें संवेदना का नितान्त अभाव है। कोमलतम भावनाओं की जगह सस्ते वाग्जाल को ही हाइकु समझ लिया गया है। हाइकु के पथ को कँटीला और पथरीला बनाने का यह अभियान पुराने और नए दोनों तरह के हाइकुकारों ने चलाया है। ढेर सारे संग्रहों का अवगाहन करने पर भी प्रेम विषयक हाइकु अल्पतम संख्या में नज़र आएँगे। लेकिन नए-पुराने उन अच्छे और समर्थ हाइकुकारों की भी कमी नहीं है, जिनके काव्य में प्रेम के विभिन्न रूप नारी की गरिमा के साथ दृष्टिगोचर होते है। छिछली आशिक़ी से दूर प्रेम की अछूती अभिव्यक्ति इस विधा को और भी अधिक गरिमामयी बनाती है।

डॉ भगवतशरण अग्रवाल हिन्दी के पुरोधा हाइकुकारों में हैं। इनके हाइकु में यादों का माधुर्य है तो सराबोर करने वाली प्रेम की महक भी है-

यादें ही यादें / आँखें बन्द की तो क्या! / चित्र उभरे।
टहुके मोर / याद आ गया कौन / इतनी भोर?

उस भोर के साथ महक भी लिपटी हुई हो तो प्रेम का रूप और निखर जाता है

भोर के साथ / महक किसकी थी / पागल मन!

प्रेम की उदात्तता के साथ उसकी क्षणभंगुरता और अलभ्यता सदा विदित रही है, अत: कवि अपनी विवशता इस प्रकार प्रकट करता है-

रेत पै बस / लिखूँ मिटाऊँ नाम / और क्या करूँ?

डॉ सुधा गुप्ता-हिन्दी हाइकु–जगत् का वह नाम है, जिनका हाइकु–सर्जन विविधता से परिपूर्ण है। नारी जीवन स्वयं में एक बड़ी विडम्बना है, जिसके ऊपर क्रूर समाज के पहरे सदा ही लगे रहे हैं। लगता है पूरा जीवन ही रेहन रख दिया है। कहीं वह प्रेममय जीवन काँटों की खेती बन गया है, जो हर समय किसी न किसी रूप में चुभता और रुलाता रहता है-

साँसों पहरे / 'रेहन' है जीवन / ज़ख़्म गहरे।
काँटों की खेती / जीवन जोत दिया / चुभे तो रोती?

इस विवशता के आगे कवयित्री ने हार नहीं मानी है। बिटिया के रूप में इन्होंने नए युग की नारी की जो कल्पना की है, वह उसे 'रेहन' के जीवन से बाहर निकलने का रास्ता सुझाती नज़र आती है। कहीं वह काँधे पर झूलती और कूजन करती चिड़िया है, तो कहीं वह मशाल है; जिसकी आँखों में चाँद और सूरज की रौशनी क़ैद है-

काँधे झूलती / कूज रही चिड़िया / नन्हीं बिटिया।
आँखों में क़ैद / चाँद और सूरज / बेटी मशाल।

वह किसी के निरंकुश बन्धन में बँधने वाली नहीं है। अब कोई उसके पर कतरने की चेष्टा करे, यह सम्भव नहीं। वह तो अब चुनौती की मुद्रा में कहती है-

लो मैं तो उड़ी, / पर कतरो जानूँ / हाथ न आऊँ।

डॉ रमाकान्त श्रीवास्तव उसी प्रेम पात्र को मेहन्दी की गन्ध रचा–बसा पाते हैं-

रची-बसी हो / मेहंदी की गंध में / याद आती हो।

उर्मिला अग्रवाल ने प्यार को जीवन की ठिठुरन में जाड़े की धूप का खूबसूरत उपमान दिया है-

ठिठुरती मैं / सच तुम्हारा प्यार / जाड़े की धूप।

फिर भी जीवन की निष्ठुरता कहाँ कम हो पाती है! जीवन में जो ठेस मिलती है, जो घाव मिलते हैं, वे कभी नहीं भर पाते–

कभी न भरे / घाव जो तूने दिए / आज भी हरे।

डॉ भावना कुँअर के हाइकु काव्य में प्रेम के विभिन्न रूप नज़र आते हैं। कही अनुरागमय विविधवर्णी चित्र हैं। कहीं प्यार की हल्की-सी फुहार है, जो मुरझाए मन को अभिसिंचित करती है, तो कहीं सौन्दर्य से आपूरित वह गुलाबी रूप है, जिसके होंठों पर चाँदी-सी उज्ज्वल धूप बिखरी है-

वो कुछ रंग / जो दिए थे तुमने / लिये हूँ संग।
प्यार-फुहार / मुरझाए मन में / लाई बहार।
गुलाबी रूप / होठों पर लिपटी / चाँदी-सी धूप।

प्रेम में मिलन के क्षणों का बहुत ही मर्मस्पर्शी रूप है, बंजर भूमि में फूलों के खिलने की तरह। ठीक दूसरी ओर वियोग के क्षणों की व्याकुलता और प्रिय से न मिल पाने की विवशता इनके हाइकु में रस का मधुरिम संचार करके उनको काव्यात्मक ऊँचाई प्रदान करती है-

तेरा मिलना / ज्यों बंजर भूमि में / फूल खिलना।
सात सागर / कर ना पाऊँ पार / जीना दुश्वार।

डॉ हरदीप कौर सन्धु के हाइकु में प्रेम का हर उदात्त रूप नवीनता के साथ मुखरित हुआ है। प्रिय का जुड़ाव हर साँस से ऐसा हुआ कि उसकी सुधियाँ अनायास चली आईं-

भूल न पाया / जब-जब साँस ली / तू याद आया।

हिन्दी हाइकु में बिटिया से जुड़े हाइकु का अभाव रहा है। डॉ हरदीप कौर सन्धुने इस विषय पर उत्कृष्ट हाइकु रचे हैं। इन के ये हाइकु देखिए, जिनमें बेटी की बिदाई का साम्य डार से बिछुड़ी कुंज से किया गया है। कहीं बिटिया को फूल की पँखुरी पर ओस का मोती बताया है, तो कहीं आँचल में खिली चाँदनी बताया है-

गोद में नन्ही / माँ के आँचल में ज्यों / खिली चाँदनी
विदा की घड़ी / कूंज बिछुड़ गई / आज डार से
बिटिया होती / फूल-पंखरियों पर / ओस के मोती

इस नई उद्भावना ने नारी के इस पावन स्वरूप को नई ऊँचाई दी है। इसका पूर्ववर्ती हाइकुकारों में नितान्त अभाव रहा है–

रचना श्रीवास्तव के हाइकु नारी की व्यथा की जीती-जागती इबारत बन गए हैं। यहाँ नारी की चिट्ठी केवल आँसुओं से लिखी गई है, जिसको खोलने से हथेलियाँ भी नम हो जाती हैं। यह अकेला हाइकु 'अबला जीवन—-आँखों में पानी' की अभिव्यक्ति से बहुत ऊपर निकल जाता है-

आँसू से लिखी / वो चिट्ठी जब खोली / भीगी हथेली।

प्रेम का स्पर्श इतना मादक होता है कि शान्त झील भी उससे अछूती नहीं रह सकती। झील में डूबते चाँद और बाहों में समाए प्रिय का साम्य अद्भुत ही नहीं, अनुराग की छटा से भी आर्द्र हो गया है-

तुमने छुआ / शांत झील में उठी / तीव्र लहर।
झील में चाँद / मेरी बाहों में तुम / दोनों लजाएँ।

रचना का यही प्रेम अन्य रूप में भी प्रकट होता है और वह है भाई के प्रति अत्यन्त गहन और सात्विक प्रेम। प्रेम का वह चाँद सदा बहन के अम्बर में छाया रहे। विपदा आने पर भी वह चाँद कभी न डूबे। रचना श्रीवास्तव ने 17 वर्णों में भाई के प्रति सारी शुभकामनाएँ मोतियों की तरह पिरो दी हैं

भाई है चाँद / बहन के अम्बर का / कभी न डूबे।

डॉ जेन्नी शबनम ने प्रेम के सफल और असफल दोनों रूपों को वाणी दी है। एक ओर प्यार को लुटाने वाली माँ है, जो प्यार लुटाने पर भी प्यार से वंचित है। उसे प्यार के स्थान पर केवल पीर मिली है-

प्यार लुटाती / प्यार को तरसती / पीर लिये माँ।

प्रेम का बन्धन इतना अजीब और दुर्निवार है कि वह रस्सी या साँकल के रूप में कहीं नज़र नहीं आता पर फिर भी अटूट है, प्रिय भी है-

प्रेम बंधन / न रस्सी न साँकल / पर अटूट।

बहुत सारे बन्धन होने पर भी प्रेम किसी पिंजरे में बन्द नहीं होता। प्रेम की राह में सिर्फ़ काँटे हैं। यह प्रीत मन को जीभर रुलाती–भरमाती है, पर भी अटूट है-

परों को काटा / पिंजड़े में जकड़ा / मन न रुका!
प्रीत रुलाए / मन को भरमाए / पर टूटे न।
प्रीत की राह / बस काँटे ही काँटे / पर चुभें न।

कमला निखुर्पा ने प्रेम की कोमलता को हाइकु की कोमलकान्त पदावली में बाँधा है। कहीं वह प्रेम यादों की गगरिया बनकर छलक पड़ता है, जो सारे जीवन को सराबोर कर देता है। समर्पण का यह आत्मिक और एकाग्र भाव प्रेम में सचमुच अलभ्य है, वन्दनीय है-

जाऊँगी कहाँ / कौन मेरा अपना / तुम्हारे सिवा
छलक गई / यादों की गगरिया / भीगा जीवन।

दूसरी ओर नारी की कोमलता को चुनौतियों की आँच जलाने का प्रयास करती रही। आज की नारी अडिग रहकर मुकाबला करती रही और इन चुनौतियों की अग्निपरीक्षा में तपकर कुन्दन-सी खरी सिद्ध हुई. नेह–भरे मन में प्रीत की डोर पूरी दृढ़ता से बँधी रही।

जलाती रही / चुनौतियों की आँच / कुंदन हुई
बँधी रहेगी / नेह-भरे मन में / प्रीत की डोर।

भाई के प्रति कवयित्री का अनुराग अद्भुत है। वह भाई के प्यार को किसी भी जन्म में भुलाने को तैयार नहीं है। उसे भाई की दी हर भेंट हृदय से स्वीकार है-

भाई भेजे जो / नेह भरी भेंट तो / माथे लगाऊँ।
इस जनम / ना अगले जनम / मैं भुला पाऊँ।

डॉ ज्योत्स्ना शर्मा के हाइकु में प्रेम की सादगी और पावनता के साथ तादात्म्य के अनूठे दर्शन होते हैं-

बहुत प्यारा / वह थाम लेना वहाँ / हाथ तुम्हारा!
निहारूँ तुम्हें / विलग ही कहाँ जो / पुकारूँ तुम्हें।
न आँसू तुम / कजरा भी नहीं हो / नैनों में बसे।

केवल नाम लेने भर से ही मन–प्राण को प्रेम का अव्यक्त सौरभ भिगो देता है-

जैसे गुलाब, / महकती रही मैं / तेरे नाम से।
ज़रा सँभाल! / जीना मुश्किल करे / तेरा ख़याल।

भैया का प्यार तो स्नेह–सरोवर की तरह है, जिसे भुला पाना अत्यन्त कठिन है। जब वह भैया राखी पर दूर बैठा हो तो बहन की आँखों से लरजते आँसू मोती बनकर पलकों पर आ विराजते हैं-

भुला न सकी / स्नेह-सर अपार / भैया का प्यार।
राखी पर दूर / एक मोती पिरोया / आँसू भिगोया।

बचपन की सहेलियों की प्रेमानुभूति भी भुलाए नहीं भूलती-

थोड़ा झगड़ा / ढेर सारा प्यार था / कैसे मैं भूलूँ!

" 'ज्योत्स्ना' प्रदीप" "-बहुत पहले से हाइकु रच रही हैं। इनके हाइकु नवीनबोध के परिचायक हैं। इंसान को जो भी मिलता है, वह सबको बाँटकर खुश हो लेता है, लेकिन ज्योत्स्ना प्रदीप ऐसा नहीं करती। वह उन्हें अपने पास ही सहेजकर रख लेती है। काँटे तो किसी को नहीं बाँटे जाते। प्रेम का यह सात्विक भाव इस हाइकु को ऊँचाई प्रदान करता है-

सहेजे मैने / तेरे दिये वह काँटे / कभी ना बाँटे।

क्योंकि मन की उर्वरा भूमि में जो प्रेम–बीज बोया था, वह आज भी हरा है।

मन उर्वरा / बोया बीज प्रेम का / आज है हरा।

नारी का जीवन चाहे संघर्ष का हो चाहे प्रेम का वह मन को हर स्थिति में मथता है, पीड़ा हर कदम पर उसके साथ रहती है। उसे चैन नहीं मिलता। वह चाहे सीता बन जाए चाहे राधा। इन दो प्रतीकों में ज्योत्स्ना 'प्रदीप' ने पूरा जीवन समाहित कर दिया है-

जीवन बीता / वह कभी बनी राधा / तो कभी सीता।

प्रियंका गुप्ता ने प्रेम को नदी माना है। यह नदी जलाप्लावित है तब भी प्यास नहीं मिटा पाती; क्योंकि जब अवगाहन किया जाता है, तो पता चलता है कि यह नदी आग से भरी थी। हाइकु जैसे अल्पतम शब्दों में प्रेम की ऐसी विशद व्याख्या दुर्लभ है तो साथ ही हाइकु की सामर्थ्य का बोध कराती है-

प्रेम की नदी / सामने ही थी बही / प्यासी ही रही।
प्रेम की नदी / पार किया तो जाना / आग से भरी।

प्रियतम का न होना, जीवन के अधूरेपन को बढ़ाता है। प्रियंका सहज भाव से कह उठती है-

अधूरा लगे / मन का हर हिस्सा / जो तू न रहे।

" 'हरकीरत' हीर" " के हाइकु में प्रेम मीठे शब्दों से दिलों में बहता दरिया है तो कभी गीली-सी रेत पर दर्द की करवटें है, तो कभी गर्म तवे पर छनछना रही बूँदें हैं। कभी जीवन जीना ही कठिन हो जाता है, क्योंकि पेड़ से मुहब्बत के पत्ते झड़ जाएँ तो क्या बचता है-

मीठे शब्दों से / है बहता दिलों में / प्रेम-दरिया।
गीली-सी रेत / दर्द की कराहटें / कैसी ये प्रीत? /
गर्म तवे—सी / छनछना रही थी / बूँदें प्रेम की।
झड़े तरु से / मुहब्बतों के पत्ते / जीऊँ मैं कैसे?

शशि पुरवार के लिए प्रेम जीवन का शृंगार है, कभी मन की पीर का शब्दों की अँगीठी पर जन्मा गीत है, तो कभी प्रेमाग्नि के कारण पतझर में झरते पत्तों की तरह झरते आँसू हैं-

दिल के तार / जीवन का शृंगार / तुम्हारा प्यार।
मन की पीर / शब्दों की अंगीठी से / जन्मे है गीत।
पतझर से / झरते है नयन / प्रेम-अगन

हाइकु में बहुत से रचनाकारों ने माँ के महत्त्व को प्रतिपादित किया है। कहीं वह बाती–सी जलने वाली है तो, कहीं माँ के आँगन में फूल बनकर खिलने की आकांक्षा है-

बाती-सी जली / हर दिन-रात को / हमारी माँ थी।

-डॉ सतीशराज पुष्करणा

शूल नहीं माँ / बन फूल खिलूँगी / तेरे अँगना।

-सुनीता अग्रवाल

वहीं सुशीला श्योराण खिलौने से बढ़कर माँ के सीने से लगने की मासूम-सी अभिलाषा को अधिक महत्त्व देती हैं

खिलौने नहीं / सीने से लगा लो माँ / खिल उठूँगा।

अनिता ललित यादों को महत्त्वपूर्ण मानती हैं। यादें कभी किसी को अकेले नहीं होने देती। इसमें वे पराए भी शामिल हैं, जिन्होंने प्रेम की राह को सदा निष्कंटक बनाने का प्रयास किया है-

अकेले कहाँ? / तेरी यादों के मेले / घेरे हैं सदा!
कैसे भूलेंगे / परायों ने प्रेम से / राह बुहारी!

प्रेम में चन्दा को आमन्त्रित किया गया है ताकि वह अपनी शीतल चाँदनी मन–आँगन में फैला सके-

आओ न चन्दा! / शीतल चाँदनी से / करो उजाला

प्रेमपूर्ण रिश्तों को ज़माने की हवा का डर सदा बना रहता है। शुष्क हवा सदा रिश्तों को ख़त्म करने का प्रयास करती है, जिसकी चिन्ता कवयित्री के मन में एक कसक पैदा करती है-

कैसी ये हवा / जो उड़ा दे, सुखाए / रिश्तों की नमी

नारी जीवन की पीड़ा, उसका संघर्ष, उसके सपनों की उड़ान और आँखों की नमी के महत्त्व पर अच्छे हाइकु लिखे गए हैं-

अथाह पीड़ा / बस मौन ही रहूँ / किससे कहूँ?

अनुपमा त्रिपाठी

आँखों की नमी / बंजर ना होने दे / रिश्तों की ज़मीं।

-कृष्णा वर्मा

खोजती पंख / छू लेती आसमान / मेरी उड़ान।

सीमा स्मृति

मुमताज़ टी एच खान फ़ुर्सत के पल और-और उन पलों में खुशियों की तलाश करती है-

ढूँढ रहे हैं / फ़ुर्सत के वे पल / थे पास कल।
मन के पंछी / कर बसेरा वहाँ / खुशियाँ जहाँ।

वहीं जया नर्गिस सच कहने की शक्ति और सच कहकर स्वयं के अस्तित्वबोध को बचाए रखती है। आज की नारी के लिए यह कोई कम उपलब्धि नहीं है-

सच कहके / दु: ख सहके हम / ज़िन्दा क्या कम

यह शक्ति तभी बरकरार रहती है जब जीवन में ये महकाने वाले पल भी हों-

तूने छूकर / मुझको महकाया / दिल खिलाया

शैल सक्सेना ने प्रेम की महक को इस प्रकार अभिव्यक्त किया-

गूँथीं थी माला / महकी हथेलियाँ / अनायास ही

रेखा रोहतगी ने प्रेमी के सामीप्य को बहुत बड़ा माना है

तू मेरे पास / रौशनी में नहाई / ये काइनात।

वहीं तुहिना रंजन प्रेम को अविरल धारा तो मानती ही है वह उसे ऐसी अग्नि भी मानती है, जो सब भेदों को भस्मसात् करने का सामर्थ्य भी रखती है। साथ ही वह इस तथ्य को भी जानती है कि टूटी नौका से कभी नदी नहीं पार की जा सकती है। जीवन का अधूरापन ही टूटी नौका है-

प्रेम धारा तो / अविरल चञ्चल / आदि न अन्त।
प्रेम-अगन / सब भेद जलाती / राह दिखाती।
जीवन-नदी / कैसे करूँगी पार / टूटी है नौका।

डॉ कुँवर दिनेश सिंह हाइकु–क्षेत्र का एक विशिष्ट नाम है। प्रेम के विप्रलम्भ रूप को मेघों के नाद ने और अधिक बढ़ाया है। कहीं मन की अधीरता को भटकती समीर से रूपायित किया है-

मेघों का नाद / हृदय को बींधती / प्रिय की याद।
मन अधीर / दर-दर भटके मौन समीर।

प्रेम की इसी अधीरता को चाँद के स्पर्श के व्याज से डॉ मधु चतुर्वेदी ने भी बखूबी चित्रित किया है-

चाँद ने छुआ / सागर-सा धीर भी / अधीर हुआ।

कृष्णा वर्मा और भावना सक्सैना ने नारी की बेबसी को अत्यन्त घरेलू आत्मीयता से अभिव्यक्ति किया है, साथ ही नारी को चिरकाल से स्नेह का अवलम्ब और नए आयाम माना है-

बेबसी पीती / दुखों को धोए, गूँधे / आटे में दर्द।

-कृष्णा वर्मा

चिरकाल से / जीवन अवलंब / नारी का स्नेह।

-भावना सक्सैना

नए आयाम / जीवन महकता / संग तुम्हारे।

-भावना सक्सेना

डॉ सुधा ओम ढींगरा माँ की सुधियों को किसी त्यौहार से कम नहीं मानती। साथ ही वैधव्य की कारुणिक पीड़ा को सांकेतिक शब्दावली (कोरा आँचल, धूल, दाग़ी) से व्यक्त करती हैं। नारी का यह रूप समाज की सदैव प्रताड़ना झेलता रहा है। हाइकु की आँख से यह भी अछूता नहीं रहा।

आँखें छलकें / सुधियों में आए माँ / दिन-त्योहार।
आँचल कोरा / धूल कहीं से उड़ी, / दाग़ी विधवा।

ऋता शेखर मधु ने प्रेम के फूलों को चुना तो काँटे भी स्वत: भेंट में मिल गए और आँचल भर गया। व्यथा के पीछे ही जीवन की कथा चलती रहती है। प्रेम के प्रतीक के लिए धरा और गगन का चयन बहुत सार्थक है। दर्द की गंगोत्री का उपमान भी बहुत सार्थक है। इस बाढ़ को रोकने के लिए पलकें बाँध बन जाती हैं-

फूलों को चुना / काँटे खुद ही मिले / भरा आँचल।
व्यथा के पीछे / तैयार हो रही है / जीवन कथा।
कैसे मिलेंगे / धरा और गगन / मौन क्षितिज।
अश्रु की बाढ़ / पलकें बनी बाँध / दर्द गंगोत्री।

शशि पाधा के हाइकु में सागर पार बसी बहन याद के सहारे जुड़ी है तो मन की पर्तों को भी उद्घाटित किया गया है। कहीं काँटों में हँसता गुलाब मन है तो कहीं मन का ताप बदली बनकर उड़ता है और अपनी उदात्तता से ऊर्ध्वगामी हो जाता है, कभी बदली बनकर बरस जाता है-

सागर पार / बसी मेरी बहना / यादें आधार।
गुलाब-मन / काँटों में भी हँसना / यही जीवन।
मन का ताप / बदली बन उड़ा / छुआ आकाश।
सिहरी काँपी / बदली—सी वेदना / आज बरसी।

डॉ अनीता कपूर के हाइकु में प्रेम सन्नाटे की स्याही से लिखा दर्द का गीत बनता है, तो कभी वह कच्चे धागे की तरह उलझता है-

चुप्पी ने लिखे / सन्नाटे की स्याही से / दर्द के गीत।
कच्चे धागे-सा / उलझता ही गया / निगोड़ा प्रेम।

कमलेश भट्ट' कमल प्रेम की इस सादगी को सहज रूप में इस प्रकार व्यक्त करते हैं-

आप से मिले / तो लगा क्या मिलना / किसी और से!

कहना न होगा कि हाइकु के क्षेत्र में बहुत से रचनाकारों ने प्रेम के महत्त्व को बहुत शिद्दत से रूपायित किया है। इसमें मिलन के मधुरिम पलों से लेकर बिछोह की व्याकुलता तो है ही साथ ही प्रेम के विभिन्न रूपों की बानगी भी मन को मोह लेती है। निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि प्रेम के क्षेत्र की मासूमियता और पावनता में हिन्दी हाइकु ने इन्द्रधनुषी रंग भरे हैं।

नारी के विभिन्न रूप, प्रेम की आकण्ठ व्याकुलता, टूटते सपनों और हाथ छूटने की विडम्बना एवं तड़प के लिए मेरे हाइकु भी देखे जा सकते हैं-

तन चन्दन / मन हरसिंगार / झरता प्यार।
आँसुओं–भरी / कोठरियाँ तड़पें / जाएँ भी कहाँ?
पाखी न पाती / मिलेंगे कैसे अब / याद रुलाती।
सपना टूटा / ज्यों छूने से पहले / कोई हो रूठा।
बची निशानी / तुम्हारे आँसुओं से / भीगा रूमाल।

सपना टूटा / तेरा हाथ जो गहा / हमसे छूटा।

रामेश्वर काम्बोज ‘हिमांशु’

प्रेम का यह विस्तार और वैविध्य यहीं नहीं रुकता और भी बहुत से रचनाकार हैं, जिन्होंने अपनी कलम से मार्मिक हाइकु सृजित किए हैं। डॉ. कविता भट्ट ने हाइकु बहुत कम लिखे हैं; लेकिन जितने भी लिखे हैं, उनमें प्रेमानुभूति की गहनता एवं रसात्मकता सहृदय को स्पर्श करने वाली है-

जब भी रोया / विकल मन मेरा / तुमको पाया।
निर्मल बहे / पहाड़ी झरने-सा / प्रेम तुम्हारा।
गूँज रही है / मन-नीरव घाटी / प्रेम-बाँसुरी।
प्रेम-अगन / अनोखे आलिंगन / बर्फीली सर्दी।

लेख की परिधि में सभी का समावेश सम्भव नहीं है। फिर भी इतना ज़रूर कहूँगा कि सदी के प्रथम दशक के अन्तिम वर्ष से अब तक ऐसे कई हाइकुकार सामने आए हैं, जिनका सौन्दर्य बोध और अनुभूति पूर्ववर्ती रचनाकारों की अपेक्षा बहुत आशान्वित करती है।