हेमवती नन्दन बहुगुणाः जनसंवेदनाओं का मसीहा / कविता भट्ट

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' मेरा गाँव वहाँ है, जहाँ गरीबी है, मेरा काम वहाँ है जहाँ जुल्म है, अत्याचार है, मेरी मंजिल वहीं है, जहाँ आजादी की रौशनी अभी पहुँची नहीं है। हमारा फैसला है कि ऐसी गूँगी, अंधी एवं बहरी सरकार को उखाड़ फेंकना ; जहाँ मेहनतकश एवं गरीब को भूख तथा शोषण में जीना पड़े। इसके लिए चाहे कितनी भी बड़ी कुर्बानी देनी पड़े। "

यह उद्घोष था; स्वतन्त्रता, भारतीय सभ्यता-संस्कृति, सामाजिक एवं राजनीतिक उत्थान को समर्पित महान स्वतन्त्रता संग्राम सेनानी शेरे-गढ़वाल हिमालय पुत्र श्री हेमवती नन्दन बहुगुणा का। ऐसे मार्मिक एवं प्रासंगिक आह्वान से अपने जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने वाले स्वतन्त्रता संग्राम के नायक हेमवती नन्दन बहुगुणा भविष्यद्रष्टा एवं मानवीय संवेदनाओं से परिपूरित जनसरोकारों के संवाहक थे। यह और भी अधिक रोचक विषय है कि उनके जन्म को लगभग एक सदी बीत गयी किन्तु भारतवर्ष सभ्यता, संस्कृति एवं लोकतन्त्र के सन्दर्भ में उनकी विचारधारा अभी भी अत्यंत प्रासंगिक है।

वह भारतवर्ष के लिए पराधीनता का दौर था; देश में भय तथा आशंका व्याप्त थी; किन्तु गढ़वाल हिमालय की सुरम्य वादियों का मनोरम वातावरण गुलामी में भी प्राकृतिक रूप से सुखद था। यहाँ के देवतुल्य एवं सादगी भरे लोग अपना जीवन मुश्किल घड़ियों में भी पूरी जीवटता के साथ संघर्ष करते हुए जी रहे थे। गढ़वाल हिमालय में खेती तथा फूलों के स्थानीय पर्व बिखोत (बैशाखी) तथा फूलदेई मनाये जा चुके थे। हिमालय की हरी-भरी पहाड़ियाँ रंग-बिरंगे फूलों से लदी हुई महक रही थी; पहाड़ी पंछी चहाचहाते हुए मानो कोई शुभ सन्देश देना चाह रहे थे; पहाड़ी बुग्यालों से बरफ धीरे-धीरे पूरे देश की प्यास को बुझाने के लिए हिमनदों के रूप में पिघलने लगी थी; चीड़-बांज-बुरांस-अंयार जैसे पहाड़ी पेड़ अपनी पत्तियों की सरसराहट से सुखद जादू जगा रहे थे। बासंती पवन पहाड़ी ढलानों पर गुनगुनाते हुए बह रही थी। मधुरिम बसंत के मौसम में जब प्रकृति पेड़-पौधों को नई-नई कोंपलों की सौगात दे रही थी, ऐसी सतरंगी स्वप्निल बासंती घड़ियों में 25 अप्रैल सन् 1919 को आदर्श गृहणी श्रीमती पुन्ना देवी तथा पेशे से पटवारी श्री रेवतीनन्दन बहुगुणा के घर छः पुत्रियों के बाद एक तेजस्वी बालक का जन्म हुआ। गुड़ की भेली हाथों में लेकर उनके घर बधाई देने वालों का हुजूम उमड़ पड़ा। यह स्थान था तत्कालीन संयुक्त प्रान्त तथा अब उत्तराखण्ड के पौड़ी गढ़वाल जनपद में स्थित सुदूर पहाड़ी पर बसा छोटा-सा गाँव बुघाणी; जो किसी समय में गढ़वाल की राजधानी रहे श्रीनगर (गढ़वाल) से कुछ ही दूरी पर स्थित है।

'होनहार बीरवान के होत चिकने पात'।

यह कहावत बालक साधारण परिवार में जन्मे हेमवती के बारे में पूर्णतः चरितार्थ होती थी। इनकी प्रारम्भिक शिक्षा तत्कालीन संयुक्त प्रान्त (अब उत्तराखण्ड) स्थित केदारघाटी के गुप्तकाशी, श्रीनगर के समीप देवलगढ़ तथा पौड़ी जनपद मुख्यालय आदि जैसे पहाड़ी क्षेत्रों में हुई. उस समय गढ़वाल में स्कूल कम एवं दूरस्थ होते थे; किन्तु कुशाग्र बुद्धि एवं एकाग्र प्रवृत्ति के बालक हेमवती ने प्रारम्भिक शिक्षा गढ़वाल के विभिन्न विद्यालयों में पढ़ते हुए पूर्ण की।

बचपन से ही निडर, हठीले हेमवती अद्वितीय तार्किक शक्ति तथा नेतृत्व क्षमता से भी युक्त थे। इन गुणों के साथ ही इनमें अपने गरीब सहपाठियों के प्रति संवेदनशीलता, दया, सहानुभूति एवं दान आदि जैसे गुण भी थे। जब भी अपने किसी सहपाठी को शोषित या उपेक्षित देखते थे; तो उनका पक्ष बहुत ही मजबूती के साथ प्रधानाध्यापक के सामने रखते थे। ये सभी गुण इन्हें नेतृत्व क्षमता प्रदान करते थे। ये इतने प्रखर थे कि पौड़ी से आठवीं करते हुए ही इन्होंने अपने विद्यालय में 'हिमालय वाचनालय' नाम से पुस्तकालय प्रारम्भ कर दिया; जिसे विद्यार्थियों की सहभागिता से बिना किसी व्यय के चलाया जाता था। जीवन के प्रारम्भिक दिनों में हेमवती के मन में यह बात घर कर गयी थी कि कमिश्नर एक बड़ा पद होता है; तथा उसे किसी के सामने झुकने की आवश्यकता नहीं पड़ती; इसलिए वे खूब पढ-लिखकर कमिश्नर बनेंगे। अतः आठवीं के बाद हेमवती ने देहरादून के डी ए वी कॉलेज से पढ़ने की इच्छा व्यक्त की; किन्तु साथ ही उन्हें अपनी मातृभूमि पहाड़ से दूर होने का दर्द भी सता रहा था; यह दर्द उन्होंने कागज पर कुछ इस तरह से लिखकर व्यक्त किया-

न जाने किधर मेरी नाव चली रे; चली रे चली रे मेरी नाव चली रे।

तब शायद उन्हें पता नहीं था कि यह उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट सिद्ध होगा। देहरादून आकर उन्होंने पहली बार बिजली के बल्ब की रोशनी में पढाई की; उस समय पहाड़ में बिजली की व्यवस्था नहीं थी। इस प्रकार एक ठेठ पहाड़ी बालक ने रात-दिन परिश्रम करते हुए प्रथम श्रेणी में विशेष योग्यता के साथ देहरादून से हाईस्कूल उत्तीर्ण किया। देहरादून में वे वाद-विवाद एवं लेखन तथा अन्य शिक्षणेत्तर गतिविधियों में शामिल होते रहे और इसी दौरान इन्होंने अमर शहीद भगत सिंह की पुस्तक पढ़ी; ये उनसे इतने प्रेरित तथा भाव विभोर हुए कि इन्होंने कमिश्नर बनने के सपने को तिलांजलि देकर कहा था कि 'मैंने निर्णय लिया है; जब तक जिउंगा भारत की स्वतन्त्रता के लिए लड़ूँगा।'

इस प्रकार इनके मन में अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई लड़ने का अंकुर यहीं अंकुरित हुआ; जो आगे चलकर एक क्रान्तिकारी विचारधारा के रूप में परिपोषित हुआ। उनकी कर्मठता एवं परिश्रम के परिणामस्वरूप सन् 1938 में उन्हें राजकीय इण्टर कॉलेज, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश में कॉलेज में दाखिला मिल गया; जहाँ उस दौरान प्रतिष्ठित एवं सम्पन्न परिवारों के बालक ही पढ़ते थे। पिछडे़ हुए पहाड़ी क्षेत्र के साधारण परिवार से होने के बावजूद भी हेमवती ने अपनी विशेषताओं के कारण कम समय में ही वहाँ अपना एक विशेष स्थान बना लिया। वे अपने सहपाठियों में अद्भुत नेतृत्व क्षमता वाले प्रखर के रूप में प्रतिष्ठित हो गये। वहाँ जाकर प्रथम श्रेणी में इण्टरमीडिएट करने के साथ ही उनके शिक्षणेत्तर क्रिया-कलापों को भी पंख लग गये। बारहवीं करते-करते वे एक कुशल वक्ता एवं संगठनकर्ता के रूप में प्रतिष्ठित हो गये थे।

वह गुलामी का विकट समय था; एक ओर अंग्रेजों का अत्याचार चरम पर था तो दूसरी ओर अनेक आबालवृद्ध महिला-पुरुष अपना सर्वस्व न्योछावर करके आजादी के आन्दोलन को निर्णायक स्थितियों में पहुँचाने के लिए संघर्षरत थे। इलाहाबाद उस समय इन सब गतिविधियों का केन्द्र बना हुआ था; हेमवती ने विषम परिस्थितियों में भी अपनी प्रतिभा के द्वारा छात्र-संसद का गठन कर लिया। धीरे-धीरे वकील, लेखक, पत्रकार एवं शिक्षक भी इसमें सहभागी होने लगे। उन दिनों महात्मा गांधी, राजर्षि टण्डन, लाल बहादुर शास्त्री एवं जवाहरलाल नेहरू आदि से हेमवती बहुत प्रभावित थे। आजादी के आन्दोलन में शामिल होकर वे दिनों-दिन कक्षाओं का बहिष्कार, जुलूस, धरना-प्रदर्शन विदेशी वस्त्रों की होली जलाना आदि जैसी गतिविधियों द्वारा आन्दोलन के एक मुख्य ध्वजवाहक बन गये।

1940 में एक ओर हेमवती देश की आजादी के लिए अपना सर्वस्व निछावर करने को आमादा थे किन्तु, दूसरी ओर उसी समय उनके माता-पिता ने उन्हें मातृभूमि गढ़वाल बुलाया। माता-पिता को अंदाजा हो गया था कि बेटा परिवार से विमुख हो रहा है; इसलिए उनको पारिवारिक जिम्मेदारी में बांधने के लिए उनकी राय पूछे बिना ही उनका विवाह सुदूर पहाड़ी गांव में तय कर दिया गया था। हेमवती को स्वीकार्य नहीं था कि देश परतन्त्र रहे और वे विवाह जैसे व्यक्तिगत हित में उलझे रहें; किन्तु संस्कारवश उनमें माता-पिता के आदेश की अवहेलना करने का साहस भी न था। अतः इनका विवाह लगभग पांच सौ बारातियों वाली भव्य बारात, आभूषण, साज-सज्जा एवं समस्त गढ़वाली रीति-रिवाज के साथ सम्पन्न हो गया। इनकी पत्नी एक संस्कारवती उत्कृष्ट गुणों वाली स्त्री रहीं; किन्तु हेमवती जी को देश हित के समक्ष यह सब व्यक्तिगत हित सम्मोहित न कर सके. विवाह के चार-पांच दिन बाद ही वे पुनः प्रयागराज / इलाहाबाद लौट गए और स्वतन्त्रता की गतिविधियों में दिन-रात जुट गए।

गाँव से लौटकर हेमवती ने सन् 1941 में इलाहाबाद विश्वविद्यालय में दाखिला लिया। हेमवती उस समय भी 'प्रॉब्लम ऑफ वर्ल्ड पीस' एवं 'प्रॉब्लम ऑफ वर्ल्ड प्रोग्रैस' जैसे विषयों पर लेखन करते थे। उसी दौरान वे इलाहाबाद विश्वविद्यालय में छात्र संघ के महासचिव भी निर्वाचित हुए. उन्हीं दिनों की बात है; 1942 में भारत छोड़ो आन्दोलन अपने चरम पर था। इलाहाबाद में सुशील वर्मा के हाथ में आंदोलन की कमान थी; अपनी सक्रियता के कारण हेमवती अतिशीघ्र ही उनके घनिष्ठ व्यक्तियों में शामिल हो गए। महात्मा गांधी ने 9 अगस्त, 1942 को मुंबई कांग्रेस अधिवेशन में पहली बार 'करो या मरो' तथा 'अंग्रेजों भारत छोड़ो' के नारे के साथ समस्त विद्यार्थियों का आंदोलन के लिए आवाह्न किया। कांग्रेस के सभी शीर्ष नेता इसी दौरान गिरफ्तार कर लिए गये। बहुगुणा उस समय तक अंग्रेजों की वांटेड सूची में आ गये थे। फिर भी विकट परिस्थिति में भी देश की आजादी के लिए वे संघर्ष कर रहे थे। उनके लिए उस समय यह पंक्तियाँ उपयुक्त थी-

मुश्किलें दिल के इरादे आजमाती हैं; स्वप्न के परदे आँखों से हटाती हैं।

हौसला मत हार गिर कर ऐ मुसाफिर, ठोकरें इन्सान को चलना सिखाती हैं।

लाल बहादुर शास्त्री बहुगुणा को कागज या पानी पर खिंची लकीर नहीं बल्कि पत्थर की लकीर मानते थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय आजादी का एक प्रमुख केन्द्र एवं बहुगुणा उस केन्द्र के सूत्रधार थे। ओजस्वी भाषण, निडर शैली, जोश एवं अति उत्साह के कारण वे वहाँ के आन्दोलन का केन्द्र बिन्दु बन गये थे। 1942 में ही बहुगुणा इलाहाबाद छात्रसंघ अध्यक्ष भी निर्वाचित हुए. एक साधारण पहाड़ी परिवार एवं सुदूर पिछड़े पहाड़ तथा विकट भौगोलिक परिस्थितियों से निकलकर इलाहाबाद की राजनीति का कर्णधार बनना उन दिनों कोई साधारण घटना नहीं थी।

इस प्रकार बहुगुणा आजादी के आन्दोलन के लिए और भी महत्त्वपूर्ण हो गये। 12 अगस्त, 1942 को इलाहाबाद छात्रसंघ के द्वारा एक निर्णायक जुलूस निकाला गया जिसका नेतृत्व बहुगुणा ही कर रहे थे। कलेक्टर डिक्सन ने जुलूस पर गोलियाँ चलवा दी और जुलूस तितर-बितर हो गया; लेकिन जुलूस का एक हिस्सा आनन्द भवन होता हुआ मुहम्मद अली पार्क पहुंच गया; जिसके अगुआ भी बहुगुणा ही थे। इस घटना के बाद विश्वविद्यालय बंद करवा दिया गया तथा छात्रावास खाली करवा दिया गया। बहुगुणा भी छात्रावास में ही रहते थे; किन्तु आजादी के आन्दोलन के लिए वे कुछ दिन भूमिगत हो गये। 1942 में ही अंग्रेज़ी हुकूमत ने बहुगुणा को जिंदा या मुर्दा पकड़वाने के लिए दो हजार रुपये का इनाम रखा। फरवरी, 1943 में दिल्ली की जामा मस्जिद के पास से बहुगुणा को गिरफ्तार कर लिया गया और नैनी सेंट्रल जेल लाया गया। इसी जेल में लालबहादुर शास्त्री तथा कमलापति त्रिपाठी आदि को भी रखा गया। बहुगुणा जेल में सख्त बीमार हो गये; उनके दाहिने फेफड़े का निचला भाग पूरी तरह खराब हो गया था। इस प्रकार गम्भीर बीमारी के चलते 1945 के मध्य में उन्हें कैद से मुक्त कर दिया गया। कुछ दिन इलाहाबाद में रहकर वे अपने गांव बुघाणी चले गए। इसी के कुछ समय बाद इलाबाद लौटने पर 1946 में उनका दूसरा विवाह स्वतन्त्रता संग्राम में उनके ही साथ सक्रिय कमला त्रिपाठी के साथ हो गया। उनकी आर्थिक स्थिति खराब ही रही; लेकिन जेल से बाहर रहते हुए भी वे आजादी के लिए संघर्ष करते रहे।

इसी बीच एक वर्ष बाद 15 अगस्त, 1947 को वह दिन आया जो बहुगुणा जैसे अनेक आन्दोलनरत नवयुवकों का सपना था; भारतवर्ष स्वतन्त्र हो गया। स्वावलम्बी तथा मेहनती बहुगुणा उन दिनों घर-खर्च भी रिक्शे का टायर लगाकर चला रहे थे। इसी वर्ष स्वतन्त्रता संग्राम सेनानियों को कुछ सुविधाएँ प्रदान करने का निर्णय लिया गया; किन्तु बहुगुणा ने सरकारी नौकरी की पेशकश ठुकरा दी और सक्रिय राजनीति में रहकर देश के गरीब एवं उपेक्षित वर्ग की सेवा का संकल्प लिया। अभाव एवं संघर्ष भी उनको तोड़ न सका और उन पर प्रत्येक बार यही चरितार्थ होता था कि-

रेत को मुठ्ठी में भरकर हम फिसलने नहीं देते,

वक्त कितना भी मुश्किल हो खुद को बदलने नहीं देते।

डराएँगे क्या अंधेरे हमें अपनी बुरी निगाहों से,

फ़क़्र तारों पर है जो उजालों को ढलने नहीं देते। (डॉ.कविता भट्ट)

1946 में इलाहाबाद युवा काँग्रेस की डोर अपने हाथ में लेते हुए बहुगुणा ने महसूस किया सैद्धान्तिक राजनीति का मूलमंत्र गरीबों, किसानों, मजदूरों एवं आम जनता के बीच काम करना है। उन्होंने 1948 में 10-12 मजदूरों एवं अनेक ट्रेड-यूनियनों को मिलाकर मजदूर सभा बनाई. इसका अध्यक्ष रहते हुए; उन्होंने गरीब मजदूर एवं कर्मचारियों की लड़ाई सदैव निष्ठा एवं ईमानदारी से लड़ी। कानून की औपचारिक डिग्री न होने पर भी अपनी संघर्षशीलता, ज्ञान एवं तर्कशक्ति के द्वारा उन्होंने मजदूर संघ के अनेक केस खुद लड़े। उस समय लेबर ट्रिब्यूनल में केस लड़ने के लिए डिग्री की ज़रूरत नहीं होती थी। मजदूर यूनियनों के मुकदमे वे जीतते चले गये और एक मजदूरों के मसीहा एवं एक प्रखर वकील के रूप में प्रसिद्ध हो गये। 1952 के आम चुनाव में मजदूरों ने ही बहुगुणा के टिकट के लिए दिल्ली जाकर तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू से लड़ाई लड़ी। बहुगुणा पहली बार विधायक चुने गये तथा मजदूरों की लड़ाई लड़ते रहे; उनके लेटर हेड पर अंकित था-यूनिटी, पीस, प्रोग्रेस।

अंग्रेजी हुकूमत को ललकारने वाले तथा आजादी के अन्तिम चरण के सिपाही बहुगुणा 1957 में जब श्रम एवं उद्योग मंत्री बने तो प्रत्येक मजदूर को लगता था; जैसे वह स्वयं ही सत्ता में हो; क्योंकि अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने मजदूरों एवं गरीबों के पक्ष में अनेक ऐतिहासिक फैसले लिये। इस प्रकार पं0 जवाहर लाल नेहरू, लाल बहादुर शास्त्री, पं0 गोविन्द बल्लभ पंत तथा डॉ0 सम्पूर्णानन्द जैसे राजनेताओं के सान्निध्य में राजनीति करते हुए संघर्ष में भी हार न मानने वाले बहुगुणा का भारत तत्कालीन राजनीति में प्रतिष्ठित छवि बन गयी। पं0नेहरू के उपरान्त 1964 से 1966 तक लगभग 18 माह लालबहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री रहे तथा उनके आकस्मिक निधन के उपरांत 1966 में श्रीमती इंदिरा गांधी देश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनी। इसी दौरान राष्ट्रपति चुनाव को लेकर हुए मतभेद के कारण कांग्रेस के लगभग सभी बड़े नेता इंदिरा के विरोध में खड़े थे; केवल हेमवती नंदन बहुगुणा ही उनका खुलकर समर्थन कर रहे थे। बहुगुणा इंदिरा गांधी का समर्थन प्रोग्रैसिव होने के आधार पर कर रहे थे। 1969 में इंदिरा गांधी ने उन्हें उत्तर प्रदेश कांग्रेस कमीटी का महामंत्री नियुक्त किया; इसी समय विधानसभा का मध्यावधि चुनाव हुआ। धीरे-धीरे 1971 तक वे पूरे देश ऐसे नेता के रूप में विख्यात हो गये; जो हारते हुए को भी चुनाव जिता सके. कांग्रेस दो तिहाई मतों से जीती; जिसमें बहुगुणा की बहुत बड़ी भूमिका थी; इसलिए ये संचार मंत्री बनाए गए। 1972 में कांग्रेस पार्टी पूर्णतः इंदिरा के हाथ में आ गयी और वे स्वयं ही अनेक बार बहुगुणा की प्रशंसा करती थी। 1973 में उनकी अद्वितीय क्षमताओं को देखते हुए अनेक अंतर्विरोधों से घिरे उत्तर प्रदेश का मुख्यमंत्री बहुगुणा को बना दिया गया। उल्लेखनीय है कि 1969 में कुछ हद तक तथा 1978 के बाद माहौल कुछ ऐसा बना कि जो भी इंदिरा के सामने सच्चाई बताता या कुछ विरोध करता वह कांग्रेस से बाहर कर दिया जाता। कांग्रेस के बार-बार टूटने का सिलसिला चल पड़ा। गांधी-नेहरू की प्रतिनिधि होने के कारण इंदिरा कांग्रेस को ही असली माना जाता था। इंदिरा गांधी के सर्वाधिक विश्वासपात्र होते हुए भी राजनीतिक उठापटक, स्पष्टवादिता तथा वैचारिक भिन्नता के चलते; 40 वर्षों से कांग्रेस के लिए निष्ठावान, कर्मनिष्ठ, परिश्रमी एवं ईमानदार बहुगुणा को अपने पद तथा कांग्रेस से त्यागपत्र देना पड़ा।

अब बहुगुणा ने सत्तासीन कांग्रेस के विरुद्ध गढ़वाल से चुनाव लड़ने का फैसला लिया; कांग्रेस द्वारा सारे पैंतरे अपनाने पर भी जमीन से जुड़े होने के कारण बहुगुणा चुनाव जीत गये और उन्हें 'शेरे-गढ़वाल' कहा जाने लगा। यह चुनाव राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सुर्खियों में छाया रहा। राजनीतिक घटनाक्रम बदला और पुनः कांग्रेस में शामिल होने पर; 1980 में कांग्रेस के टिकट पर गढ़वाल से सांसद चुने गये; किन्तु फिर से छः माह में ही उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया था। 1982 में वे पुनः लोकतान्त्रिक समाजवादी पार्टी की टिकट पर गढ़वाल से सांसद चुने गये। 1984 में फिर से हुए चुनावों में इलाहाबाद सीट पर वे अमिताभ बच्चन से चुनाव हार गये। 1988 में अनेक दिग्गज नेताओं ने मिलकर कांग्रेस के खिलाफ जनता दल का निर्माण किया; लेकिन वे उसमें शामिल नहीं हुए. 1945 तथा 1984 में गम्भीर रूप से बीमार होने के बावजूद भी बहुगुणा अपने स्वास्थ्य पर ध्यान न देते हुए सामाजिक उन्नति के कार्यों को ही समर्पित रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि 1989 में वे पुनः गम्भीर हृद्यरोग से ग्रस्त हो गये। उन्हें ऑपरेशन के लिए अमेरिका ले जाया गया; किन्तु अमेरिकन समय के अनुसार 16 मार्च, 1989 को रात्रि 1 बजे इनकी मृत्यु हो गयी; भारत में होली मनायी जा रही थी; किन्तु इस शोक समाचार और अपूरणीय क्षति से गढ़वाल सहित पूरा देश शोक में डूब गया। ।

बहुगुणा एक ऐसे व्यक्ति थे; जो सत्ता के केन्द्र, सत्ता की परिधि में रहे भी और से सत्ता से टकराए भी। देश की शक्ति, समस्याओं एवं सीमा की उन्हें गहरी समझ थी। देश की गुलामी एवं उसके उपरान्त की राजनीतिक गतिविधियों के एक युग के प्रतिनिधि भी थे। पंजाब, कश्मीर एवं असम की समस्याएँ हों या केन्द्र-राज्य सम्बन्ध या फिर भारतवर्ष की विदेश नीति सभी के सम्बन्ध में उनकी समाधान क्षमता ऐतिहासिक थी। वे पहाड़ के विकास के साथ ही आर्थिक नियोजन के प्रबल पक्षधर थे। इलाहाबाद में रहते हुए भी अपनी मातृभूमि पहाड़ (उत्तराखण्ड) की जनसमस्याओं शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाएँ, सड़क, बिजली, पानी, रोजगार तथा बैंक आदि के सम्बन्ध में उन्होंने दूरगामी योजनाओं पर कार्य किया। उनके मुख्यमंत्रित्व काल में पहाड़प्रेम के चलते उनके द्वारा यहाँ पर कुमायूं एवं गढ़वाल में दो अलग-अलग विश्वविद्यालयों के साथ ही बड़ी संख्या में स्कूल खोले गये, सड़के बनवायी गयी तथा अनेक कारखाने खोले गये। उच्चशिक्षा एवं वैज्ञानिक शोध संस्थानों के सम्बन्ध में भी उनके प्रयास बाद में मील का पत्थर साबित हुए. राजनीति, समाज एवं देशसेवा के आकाश के वे ऐसे नक्षत्र हैं; जिनके कृत्यों की चमक कभी भी फीकी नहीं होगी एवं आगामी पीढियाँ उनसे सदैव प्रेरणा लेती रहेंगी।

गुंजित मंगलगान तेरे, अमर गाथाओं का अभिनन्दन। तू जीवट तू कर्मठ, गौरव भाल हेमवती नन्दन॥

(डॉ. कविता भट्ट)