एक था उमेश डोभाल / अशोक कुमार शुक्ला

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उत्तराखण्ड में शराब बंदी का सपना.........
स्मरण और श्रद्धांजलि ...!!:अशोक कुमार शुक्ला
उमेश डोभाल का चित्र

दैनिक अमर उजाला के एक ऐसे पत्रकार के रूप में स्वर्गीय उमेश डोभाल को वह सब लोग जानते हैं जिन्होंने कभी न कभी उत्तराखण्ड में शराब बंदी का सपना देखा है। यह जुझारू पत्रकार सन 1988 में 25 मार्च यानी आज ही के दिन शराब माफिया का शिकार हुआ था।

मेरे अंतःस्थल में आदरणीय उमेश डोभाल की जो छवि है वह बहुत पुरानी है और उस जमाने की है जब मैंने बचपन से बाहर निकलना प्रारंभ ही किया था। वह दौर प्रिन्ट मीडिया के माध्यम से सामाजिक सरोकारो की लडाई लडने का था संभवतः 1979-80 का दौर था। पौडी गढवाल में समाचार पत्र के नाम पर नई दिल्ली से छपने वाला दैनिक नवभारत टाइम्स और दैनिक हिन्दुस्तान एक दिन बाद जनपद में आता था। जनपदीय संवाददाता क्या होता है ? कौन है इन सबका कोई ज्ञान नहीं था । हां उस दौर में स्थानीय साप्ताहिक समाचार पत्रों की महती उपयोगिता थी । पौडी से श्री वाचस्पति गैरोला जी का साप्ताहिक गढवाल मंडल प्रकाशित होता था और एक नया समाचार पत्र पौडी टाइम्स साप्ताहिक प्रारंभ हुआ था। यह सब मुझे इसलिये मालूम हो सका क्योंकि जिला परिषद की लाइब्रेरी जाने का दैनिक उपक्रम उसी काल में आरंभ किया था । इस पुस्तकालय में अनेक क्षेत्रीय समाचार पत्र कर्मभूमि, युगवाणी (पत्रिका) आदि आते थे। उसे जमाने में समाचार पत्र में छपा एक एक शब्द महत्वपूर्ण होता था और उसका असर होता था।

पुस्तकालय जाते और छपे शब्दों को पढते हुये अचेतन मन पर कुछ ऐसा असर हुआ कि मुद्रित शब्दों के प्रति मन में एक अनूठा सम्मान का भाव बस गया और बालमन स्वयं यह प्रयास करने लगा कि कुछ ऐसा मैं भी लिखूं जो मुद्रित होकर दिख सके। इसी दौर में डी ए वी कालेज की कक्षा नौ में हिन्दी संस्कृत पढाने वाले अध्यापक श्री सेमवाल जी (जो रामलीला मैदान के पास रहते थे) ने मानवीकरण अलंकार के बारे में पढाया। बस मैने सोच लिया कि इस बार नये वर्ष को मानवीकृत करते हुये एक रचना लिखूंगा और सच में मेरा प्रयास रंग लाया और मैने ....नये वर्ष कुछ ऐसा वर दो ! नाम से एक कविता लिख डाली । अब इसे मुद्रित स्वरूप में देखने की ऐसी ललक थी सीधे जा पहुंचा पौडी टाइम्स के कार्यालय जौ पौडी में पुलिस लाइन के अगले मोड पर स्थित एक घर में स्थित था संपादक जी का नाम याद नहीं बस हुलिया याद है एक अधेड उम्र के सज्जन जिनकी दाढी बढी हुयी थी और वे किसी बाबा जैसे लगे थे . ..... हां उस समय इस साप्ताहिक पत्र पौडी टाइम्स के उप संपादक थे श्री उमेश डोभाल जी । उनसे मैं कभी नहीं मिला था। ....बहरहाल नये वर्ष पर लिखी मानवीकरण अलंकार पर आधारित मेरी कविता को पौडी टाइम्स ने अपनी संपादकीय टिप्पणी के साथ छापा। (यह कविता कुछ वर्ष बाद पुनः दैनिक अमर उजाला में छपी जिसे ढूंढकर अंतरजाल पर पुनः फिर कभी अवश्य लगाउंगा)

कुछ दिन बीते होंगे मैं टयूशन पढने जा रहा था तो पौडी बस स्टेशन के पास वही बढी दाढी वाले सज्जन मिले जो पौडी टाइम्स के सम्पादक थे । आज उनके साथ एक और सज्जन थे ।

संपादक जी ने देखते ही पुकार कर बुलाया और पूछा कहां जा रहे हो?'

मैने बताया कि ट्यूशन पढने जा रहा हूं तो उन्होंने साथ वाले सज्जन से पूछा -उमेश तूने पहचाना इसे ?

उमेश जी के अनविज्ञता व्यक्त करने पर उन्होंने बताया -अरे उमेश! यह वही कामरेड है जिसकी कविता नये वर्ष पर हमने छापी थी।

ओह हो ....! वह उत्साही नवयुवक आश्चर्य से बोला और उसने लपककर मुझे गोद में उठा लिया।

दोनो हाथों से मुझे उपर उठाये वह उत्साही नवयुवक चिल्लाया

अरे वाह...! यह है हमारा छोटा कामरेड ....!!
वह उत्साही नवयुवक उमेश डोभाल था जो संयोग से उस समय बस स्टेशन पर उपलब्ध थे। आस पास के लोगों का ध्यान उस ओर गया और सब उनकी ओर देखने लगे ।
आदरणीय उमेश डोभाल जी की हाथों ने मुझे भीड से ऊंचा उठा दिया था । मेरा नन्हा मन गौरव की अनुभूति कर रहा था।

तो यह था उमेश डोभाल जी से मेरा पहला और आखिरी परिचय। मुझे आज भी उस उत्साही नवयुवक का जोश और बालमन ने जो गौरव अनुभव किया वह बखूबी याद है जो अपनी लिखी कविता के पारिश्रमिक के रूप में मुझे प्राप्त हुआ था।