एक थी तरु / भाग 19 / प्रतिभा सक्सेना

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आज बड़ियाँ डाली हैं तरु ने।

सुबह महरी से दाल पिसवा कर देर तक बड़ियाँ तोड़ती रही। इत्मीनान से नहायेगी, छुट्टी है न! असित को बड़ी की तरकारी बहुत अच्छी लगती है। आज शाम को भोजन में परोस कर, चौंका देगी।

शाम को उठाने गई तो देखा पूरी तरह सूखी नहीं हैं। ऊँह, इतनी तो भूनते-भूनते सूख जाएँगी।

खूब रुचि से मसाला भून कर बनाईं, रंग भी खूब उतरा है।

दोंनों खाने बैठे।

'काहे की तरकारी है?’

'खा कर देखो।’

तरु की आँखों में चमक है। उत्सुकता से असित का चेहरा देख रही है।

असित खा रहे हैँ, मुँह कुछ बिगड़ गया है।

'क्या बात है अच्छी नहीं है?’

'कड़ी है, गली नहीं। और कुछ है खाने को?’

तरु का उत्साह ठंडा पड़ गया।

उस दिन होटल में भी तो कितनी कड़ी थीं तब तो कह रहे थे रसा बड़ा ज़ायकेदार है इससे खा लूँगा।

उसनं कौर बनाया मुँह में रखीं, होटल से तो फिर भी मुलायम हैं।

'अभी बना देती हूँ कुछ और।’

'नहीं अब रहने दो, इसी से खा लूँगा। कितनी दाल की बना डालीं?’

इन्हें इसी की चिन्ता है !

'पड़ोस से ही पूछ लेतीं कैसे बनती हैं।’

'अब बस करो! कहे चले जाओगे। तुम मत खाओ। कुछ और बना देती हूँ।’

'अरे, मैंने क्या कहा? बस तारीफ़ करता रहूँ, किसा चीज़ की कमी न बताऊँ।’

'नहीं कमी ज़रूर बताओ, नहीं तो पता कैसे लगेगा? इतना मैं भी समझती हूँ। तुम्हें लग रहा है कितनी दाल बर्बाद हो गई।’

' मैं कुछ कहूँगा ही नहीं अब से।’

'नहीं कहे जाओ। कहने में क्या लगता है?’

लोग सोचते हैं मायके से पूरी तरह परफ़ेक्ट हो कर आये। खुद चाहे जितने नौसिखिये हों। तरु को लग रहा था पहले का उदार व्यक्ति पति बन कर कितना छिद्रान्वेशी बन जाता है। दूसरे की भावना का ज़रा ख़याल नहीं रखता।

अगली सुबह तरु खाना परस कर रोटियाँ सेंक रही थी।

'कल की बड़ियाँ तो काफ़ी थीं। लाओ दे दो।’

' कितनी भी हों, तुम्हें अच्छी नहीं लगीं रहने दो।’

'तो क्या फिंकेगी?शोरबा तो अच्छा था।’

'फिंकें या कुछ भी हो, तुम चिन्ता मत करो।’

'क्यों, मैं कुछ न बोलूँ?’

'घर की हर बात में दखल दो, हर बात की टोह रखो तो चल चुका?’

'चले या न चले। मैंने क्या गलत कहा?’

'अब जो परसा है, वही खा लो।’

असित चुप बैछा है।

तरु को गुस्सा आ रहा है। कितना कुछ भी करो, आदमी अपनी ही अपनी सोचता है।

असित ने कुछ कहा, उसने जवाब दिया।

दोनों में झाँय-झाँय हो रही है। वह उठकर खड़ा हो गया।

'तो खाने ने क्या बिगाड़ा है, गुस्सा तो मुझ पर है?’

'भूख नहीं है, ’बिना और कुछ बोले वह घर से निकल गया।

परसी थाली छोड़़ कर चले गये अब चाय पी-पी कर रहेंगे। उसने भी खाना उठा कर रख दिया।

ऑफ़िस का समय हो रहा है, तैयार होने लगी,

बाहर का ताला बंद किया -अरे पैसे लेना तो भूल गई।

ताला खोला, पैसे निकाल कर पर्स में डाले। घड़े से उँडेल कर पानी पिया।

काम पर जाने का मन नहीं हो रहा। पर क्या करेगी घर पर?

एक क्षण असित की छोड़़ी ढँकी हुई थाली को देखा फिर बाहर निकल गई।

ऑफ़िस में फाइल खोले पेन पकड़े बैठी है। मन उमड़-घुमड़ रहा है-

असित, थाली छोड़़ कर भूखे चले गये। बचपन से उपेक्षित रहा एक व्यक्ति अपने घर से बिना खाये निकल गया!

बचपन?

किसने पाला असित को ?

असित की कही बातें रह-रह कर मन में उमड़ने लगीं।

उसने कहा था -

कैसे पले हम?

अपने आप बड़े होते गए। कैसे बिताई थी वह नादान उम्र, जब हर बात कच्चे मन पर हथौड़े सी चोट करती थी।

सुधा जिज्जी की याद आती है, उनके पिटने की दोनों गालों पर एक साथ चाँटे पड़ने की, मुँह हटाने पर दीवार से टकरा देने की, रो-रो कर सूजी हुई लाल आँखों की। दो -दो दिन भूखी रह काम करने की। एक बार भूख सहन हुई न होगी। कुछ चुपके से खाते पकड़ लिया विमाता ने। क्या लानत-मलामत हुई थी।

कैसी-कैसी दुर्दशा की जाती थी।

फटे-पुराने कपड़े, मार के नीले निशान हाथ-पाँवों पर। जाड़ों में ठिठुरती, बर्तन माँजती, कपड़े धोती और खाने के लिये तरसती।

वह सब याद करते नहीं बनता। बाबू जी भी शिकायतें सुन उसी पर गुस्सा निकालते -कैसे झपटते थे।’आज तुझे मार कर ही दम लूँगा’।

। रात में असित छू-छू कर देखता था -सुधा जिज्जी मर तो नहीं गईं।

ऊपर से माँ जी के ताने -'तीन-तीन साँड़ों की नौकरी के सिवा तुमने मुझे दिया क्या? पराया नरक भुगत रही हूँ। कौन जनम के पापों का फल है’।

अनजानी भयावनी परछाइयाँ घेरे हों जैसे, नींद उड़ जाती थी।

और एक दिन घर में मुर्दनी छा गई। सुधा जिज्जी कुयें में गिर गईं। ऐसी ज़िन्दगी जीना उनके बस में नहीं रहा होगा। सहन-शक्ति ने जवाब दे दिया होगा।

एकदम स्तब्ध रह गए थे श्यामा और असित। न आँखों में आँसू न मुँह पर बोल।

समय जम कर बैठ जाता था बीतता ही नहीं था-कितने दिन, कितनी रातें! तरु, मैं अब भी सोच नहीं पाता उन दिनों की दहशत!’

और स्तब्ध सी सुनती है तरु।

कैसा लगता रहता है, एक भारी पत्थर सा जम कर बैठ जाता है हृदय पर। अंतर से आवाज़ उठती है असित, इन दुखों की थाह नहीं ले पाती मैं -बस डूबी हुई निष्चेष्ट रह जाती हूँ।

और फिर तरु का उदास चेहरा देख असित उबारने की कोशिश करता है।

'चलो, तरु। कुछ मत सोचो। बीत गया जो, जाने दो।’

और तब उसकी आँखों की दृष्टि किसी तरह झेल नहीं पाती वह।

स्थितियाँ बदलती गईं धीरे-धीरे

पर असित का मन अब भी कभी-कभी वहीं भटक जाता है।

तरु जानती है।

जब माँजी रश्मि -राहुल से लाड़ लड़ातीं वह लालसा भरी आँखों से देखा करता। अपने बच्चों के खाने के समय किसी बहाने वे उन दोनों को वहाँ से हटा देतीं थीं।

बगल के कमरे में श्यामा पूछती, ’भइया, भूख लगी है?'

बहन के चेहरे की ओर देखता वह अपनी समझदारी दिखाता। कहता, ’अभी नहीं।’फिर पूछता, ’दीदी ये माँजी हमसे ऐसे प्यार से क्यों नहीं बोलतीं?’

श्यामा की आँखों में आँसू भर आते, ; भइया, वो उनकी माँ हैं, अपनी नहीं, ’

'अपनीवाली कहाँ है?'

'मर गईँ’, श्यामा आँसू पोंछती जाती।

असित का बाल मन हताश हो जाता। इतनी समझ थी कि मर कर कोई वापस नहीं लौटता।

'अब क्या होगा, दीदी?’

उसकी आँखों से आँसुओं की धार बह निकलती, ’कुछ नहीं। कभी मेरा अपना घर होगा तू नौकरी कर लेगा। फिर खूब अच्छी तरह रहेंगे। भैया, तू मन लगा कर पढ़, जिसमें खूब पैसे कमा सके। फिर कोई कुछ नहीं कर सकेगा।’

सौतेली माँ की निगाहें बड़ी तीखी थीं। हमेशा डरे-डरे रहते। रश्मि-राहुल उसकी किताबे फाड़ देते तो न शिकायत करने की हिम्मत न दूसरी खरीदने की बात।

'क्या हुआ तरलजी, नींद आ रही है?’

शिखा की आवाज़ सुन कर चौंक कर सिर उठाया तरु ने -

'नहीं सिर में दर्द है।’

बैठी है अनमनी -सी।

हाथ सिर पर रख आँखें बंद करते ही दिखता है पिताजी भूखे चले जा रहे हैं। रास्ते में चक्कर खाकर गिर पड़े हैं।

घबरा कर आँखें खोल देती है। असित भूखे चले गए। उन्हें कुछ हो तो नहीं जायेगा!। मैं बेकार बोली, चुप ही रह जाती। क्या अम्माँ की तरह करने लगी हूँ?

जी करता है सिसक-सिसक कर रोये। यह किसका दुख है-असित का या अपना?

पता नहीं किसका, पर मन को इस तरह छा लेता है कि उबरने का कोई रास्ता नहीं मिलता!

शाम को लौटी घर खुला मिला।

असित बाहरवाले कमरे में बैठे हैं उदास से।

वह चुपचाप अंदर चली गई।

खाने को आवाज़ दूँ?

फिर अकड़ेंगे तो नहीं!

पर वे भूखे हैं। मेरे होते हुए भूखे हैं। लेकिन कहूँ कैसे? मेरी हेठी होगी!

हुँह, हेठी क्या होती है -यह मेरा काम है।

उसने खाना गरम किया थाली परस कर सामने रख आई। भीतर आकर खड़ी हो गई चुपचाप, खिड़की की ओर ताक रही है।

असित उठ कर आया -'खाना किसके लिये है?’।

'तुम्हारे।’

'और तुम?’

वह चुप है।

'तुम भी आओ।’

हाथ धोकर असित ने उसका हाथ पकड़ लिया,’ चलो तुम भी।’

उसे ले जा कर बैठा लिया असित ने।

तरु की आँखों से आँसू टपकने लगे हैं।

'एक तो वैसे ही बड़ी तंदुरुस्त हो। ऊपर से खाओगी नहीं औऱ घर-काम करोगी तो।’

रुका हुआ बाँध फूट पड़ा है।

असित ने अपने पास खींच लिया, ’तरु, मेरा मिजाज़ अजीब है। मुझे कभी-कभी जाने क्या हो जाता है।’

तुम भी एकदम झल्ला जाती हो। , मैं कोशिश करूँगा आगे से, ’आवाज़ में भीगापन उतर आया है, ’अब मैं दखल नहीं दूँगा तुम्हारे काम में।’

'कोशिश करूँगी मैं भी।’