पुनर्भव / भाग-8 / कमलेश पुण्यार्क

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‘अच्छा बाबा, मेहमान ना, इनसान तो सही। बतलाओ न, कौन सी बात बतला रही थी? ’-पूछा विमल ने।

‘वापू कह रहे थे, पदारथ काका से....। ’-कहती हुयी मीना पीछे की ओर देखने लगी, जहाँ कुछ आहट का आभास हुआ।

‘क्या कह रहे थे वापू, कहो न। चुप क्यों हो गयी? ’

‘नहीं कहूँगी तब। ’

‘मत कहो। मैं सुनता भी नहीं तुम्हारी बात। ’-फिर इधर-उधर देख कर विमल ने कहा- ‘वैसे मैं जानता हूँ, क्या कह रहे होंगे तुम्हारे वापू। ’

‘जानते हो, तो बतलाओ। ’

‘नहीं बतलाउँगा, तब? ’

‘इसका मतलब, जानते ही नहीं। झूठी डींग हांक रहे हो। अच्छा, छोड़ो, मैं ही बतला देती हूँ। मगर तुम पहले ये बतलाओ कि कब आए बाहर से? ’

‘कल शाम। ’

‘और आज ही यहाँ चले आए? आगये, सो अच्छा किये। रूकोगे न आज यहीं पर? ’-मीना पूछ ही रही थी कि पीछे की ओर धड़ाक की आवाज सुन, दौड़ कर कमरे में होते हुए पिछवाड़े की ओर भागी, यह कहते हुए कि लगता है, वापू आ गए।

कंधे पर से लकड़ी-बांस का गट्ठर एक ओर पटक कर तिवारी जी इस ओर आए, जिधर विमल बैठा था। उधर पहुँचकर मीना उन्हें पहले ही बतला चुकी- उसके बारे में।

‘अरे विमल बेटे! इधर क्यों बैठे हो? भीतर आ जाओ। धूप भी लग रही है। ’-फिर मीना की ओर मुखातिब होते हुए बोले- ‘कुछ खिलायी-पिलायी भी या यूँ हीं धूप में सुखाये जा रही हो? ’

‘अभी अभी तो आया ही है। कई बार कही उसे, अन्दर आकर बैठने को। परन्तु कहने लगा कि बाहर ठण्ढी हवा लग रही है। ’- मीना की धवल मिथ्या पर विमल मुस्कुराते हुए उठकर अन्दर आ गया।

अन्दर क्या? मात्र डेढ़ कमरा यानी एक ही कमरे को बीच से पार्टीशन देकर दो कमरे का रूप बनाया हुआ। पीछे की ओर छोटा सा आंगननुमा खुला भाग- बस यही थी उनकी गृह-परिसीमा। वहीं खाट पर बैठते हुए तिवारी जी ने कहा- ‘जगह छोटी है। बड़ी परेशानी होती है। सोचता हूँ-इसी दीवार को थोड़ा ऊँचा कर दो-चार ‘मिट्टी’ देकर। फिर लकड़ी-बांस से पाट दूँगा ताकि ऊपर कुछ जगह

निकल आए, सामान रखने के लिए। ’

‘इस ‘फूस-फास’ को हटाकर, खपरैल क्यों नहीं डाल देते? ’-मीना और विमल ने एक साथ, एक ही सवाल किया।

लम्बी सांस लेकर तिवारी जी ने कहा- ‘क्या खपरैल और क्या ‘लिंटर’कुछ दिन की की तो बात है, मीना अब सयानी हो गयी है। साल दो साल के भीतर छोड़ कर चली जायेगी मुझे। फिर अकेली जान, जहाँ सांझ वहाँ विहान। घर बना कर क्या करना है? ’

वापू की बातों पर शरमाती हुयी मीना आंगन की ओर चली गयी। कमरे में विमल और तिवारी जी रह गये।

विमल ने कहा- ‘आते वक्त पापा ने कहा था, मीना को लेते आने के लिए। भाभी भी कह रही थी। यदि आपकी अनुमति हो तो कल गाड़ी लेकर आ जाता। ’

‘गाड़ी-छकड़ा की क्या बात है, जब जी हो जा-आ सकती है। तुम्हारा घर, अपना घर- कोई दो थोड़े जो है। विमल बेटे! मीना पर जितना अधिकार निर्मलजी को है, उतना तो मैं अपना भी नहीं समझता। आज यदि उनकी कृपा न होती तो मीना जो आज है वह न होती। ’-तकिये का ढासना लिए तिवारी जी कहते रहे- ‘अब तो नवीं समाप्त करने जा रही है। इसी बीच कहीं योग्य वर देख कर इसे बैठा देना है, हाथ पीले करके। सोचता हूँ, एक दो दिन में इस मिट्टी-पानी के काम से निपट लूँ, फिर पदारथ भाई को साथ लेकर प्यारेपुर जाऊँ। वहाँ एक लड़का है। सुना है- बड़ा ही अच्छा है। ईश्वर कृपा यदि सस्ते में पट जाए तो चट-पट शादी कर डालूँ। मेरी नौकरी भी अब तो कुछ ही शेष रह गयी है। पेंसन का जो पैसा मिलता, उसे लगा देता मीना में ही.......। ’- तिवारीजी कहते रहे, विमल सुनता रहा। बीच-बीच में हाँ-हूँ भी कर दिया करता। किन्तु उसे कुछ अजीब सा लग रहा था। मीना सयानी हो गयी...अब उसकी शादी हो जायेगी...क्या सच में सयानी हो गयी? क्या सच में शादी हो जायेगी? ’-विमल सोचने लगा, और भाभी का कथन याद हो आया- ‘विमल बाबू, बहुत पटती है न आपको मीना से? हरदम उसकी ही याद में डूबते-उतराते रहते हैं। कहीं कुछ ऐसा-वैसा चक्कर तो नहीं? ’- आँखें मटकाती हुयी भाभी हँसने लगी थी। आज जब घर से चला उस वक्त भी भाभी हँस रही थी, यह कहते हुए- ‘मीना दुल्हन से मिलने जा रहे हो न विमल बाबू? मुझे नहीं मिलवाओगे? ’

विमल सोचने लगा- भाभी ऐसा क्यों सोचा करती है? क्या मीना विमल की दुल्हन है....? जो भी हो दुल्हन हो, ना हो, देखने में तो बहुत ही सुन्दर लगती है- विमल की दोनों भाभियों से सुन्दर। वे दोनों समृद्ध घराने से आयी हैं। अच्छे-अच्छे कीमती कपड़े पहना करती है®। आधुनिक श्रृंगार-प्रसाधनों से सुसज्जित रहती हैं; फिर भी मीना उनसे ज्यादा अच्छी दीखती है- साधारण कपड़ों में भी, विना किसी साज-श्रृंगार के। सुन्दरता कपड़ों से थोड़े जो आती है। कपड़ा तो सुन्दरता के परिष्कार के लिए है....।

फिर सोचने लगता है- आज की ही बात- मीना उस समय कैसी लग रही थी! मछलियों सी चंचल-कजरारी आँखें, आम की फांक सी बड़ी-बड़ी आँखें, आह कैसी मोहक हैं- उसकी आँखें। गुलाब सा मुखड़ा, मैली साड़ी में भी लग रहा था, मानों बदली को चीर कर पूनम का चाँद निकला हो। --विमल सोचे जा रहा था, सोचे जा रहा था।

मीना नास्ता बना कर ले आयी। हाथ में पकड़े तस्तरी को झुक कर खाट पर रखने लगी। झुकने के क्रम में दोनों का चेहरा थोड़ा समीप हुआ। मिट्टी की सोंधी सुगन्ध उसके नथुनों में घुस गयी, जो शेम्पू-शिकाकाई से भी कहीं अधिक मोहक और मादक प्रतीत हुयी। शायद वह काली मिट्टी से बाल धोती है। इस गरीब की बेटी के पास आधुनिक प्रसाधन कहाँ?

‘तुम जलपान करो बेटे। मैं अभी आया। जरा नहा लूँ। सबेरे से नहाने का भी वक्त नहीं मिला। ’-कंधे पर धोती-गमछा और हाथ में लोटा-बाल्टी लिए तिवारीजी कमरे से बाहर निकल गए।

उनके बाहर जाते ही मौका पा विमल पूछ बैठा- ‘क्यों मीना, चलोगी न? पापा ने बुलाया है। भाभी भी कह रही थी। ’

‘बुलाया है तो जरूर चलूंगी, मगर एक-दो दिन बाद। अभी जरा काम-धाम में लगी हूँ। तुम आज यहीं रूक जाओ न। ’-खुल आए, अस्त-व्यस्त कुन्तल-गुच्छों को सम्हालती हुयी मीना ने कहा।

‘नहीं मीनू! ठहरना ठीक नहीं। कल ही बाहर से आया हूँ, इतने दिनों बाद, और आज ही इधर चला आया। ’- मीना के लिए ‘मीनू’ सम्बोधन स्वयं को शरमा गया। ‘यह तो मीना थी, मीनू कैसे हो गयी अचानक? ’- विमल सोचने लगा-‘नाम का कर्तन तो प्यार की कैंची से होता है। तो क्या मीना को प्यार करता हूँ? क्यों? कैसे? यह कैसे सम्भव है? गलत बात है यह। ’- तभी उसे याद आयी. पिछले साल की एक घटना- क्लास के एक लड़के ने एक पुर्जा लिखकर डाल दिया था, एक लड़की की कॉपी में- “ I love you.” ओफ! ओफ!! कितना भयंकर परिणाम हुआ था, उन दोटूक शब्दों का कितना बड़ा अर्थ लगाया था उसके बाप ने- मानों पाणिनी सूत्र का महाभाष्य कर दिया हो।

‘नहीं..नहीं..., मेरा सोचना गलत है। ’- विमल सोचता है, और क्षण भर में ही चिन्तन की मुद्रा बदल जाती है- ‘मान लें, मेरा सोचना सही है। फिर भी क्या सिर्फ मेरे सोचने से ही हो जायेगा? वह भी क्या मुझे प्यार करेगी? ’-प्रश्न किया स्वयं से, और, जवाब भी मिला- ‘करेगी। अवश्य करेगी। आखिर हसरत भरी नजरों से क्यों देखा करती है? ’- यह सोचते हुए दृढ़ किया मन को, और निश्चय किया कि मौका पाकर जरूर पूछेगा उससे कि क्या वह प्यार करती है विमल को?

सिर झुकाये जलपान सम्पन्न किया। बिना कुछ बोल-चाल किये, मीना भी चुप देखती रही- खड़ी-खड़ी। विमल हाथ धोकर उठ खड़ा हुआ।

‘अब चलता हूँ मीना। ’

‘क्यों रूकोगे नहीं? ’- तृषित नेत्रों से देखती हुयी मीना बोली।

‘आज नहीं। फिर कल आ जाऊँगा मीना। क्या रखा है, सायकिल से आने-जाने में लगता ही क्या है? ’- कहता हुआ विमल सायकिल लेने, मकान के पिछवाड़े चल दिया।

‘वापू को तो आ जाने देते। ’-मीना कह ही रही थी कि उधर से तिवारी जी आ पहुँचे।

क्यों बेटे! जाने को तैयार हो गये? खाना भी नहीं खाये? ’-धोती पसारते हुए तिवारीजी ने पूछा।

‘नहीं बापू, देर हो जायेगी। आज जरा बाजार होते हुए जाना है। मीना बोली है, एक दो दिन बाद चलने को। अतः फिर आ जाऊँगा। ’

विमल चल दिया, सायकिल पर सवार होकर। आँखों से जब तक ओझल न हुआ, मीना उसे अपलक निरखती रही- दरवाजे पर खड़ी। आज लम्बे समय के बाद विमल आया। कहने पर ठहरा भी नहीं। थोड़ा बुरा भी लगा, उसका न ठहरना। फिर

सोचने लगी- ‘बुरा मानने की क्या बात है। कौन कहें कि यह उसका घर है। मैं क्या उसकी कोई हूँ? बस एक साथ स्कूल में पढ़ने भर का ही तो सम्पर्क है।

और क्या है उसका मुझसे वास्ता? ’-

कहने को तो मीना कह दी। खुद को समझा गयी। पर मन भी ऐसा ही समझ ले तब न! बार-बार चाह कर भी उसकी याद को भुला न पायी। उसकी बातचित का, बैठने का, खड़ा होने का, चलने का, उसका हर अन्दाज ही निराला लगा मीना को। मात्र आठ महीनों का अन्तराल ही काफी बदलाव ला दिया है विमल में।

फिर वह खड़ी, सोचने लगती है- वापू की बातें- ‘मीना अब सयानी हो गयी है। अच्छा सा घर-वर देख कर बिठा देना है, हाथ पीले करके। ’

‘‘अच्छा सा घर, क्या अच्छा सा घर? वह फिर सोचने लगती है- ‘क्या इतनी भाग्यवान हूँ जो अच्छा सा घर मिलेगा मुझे? कहाँ से लायेंगे इतना पैसा मेरे गरीब वापू जो बेटी को अच्छे से घर में डाल सकें? ’

सेाचते-सोचते, मीना की आँखें अचानक झपकने लगी। मिट्टी का छोटा सा अपना घर कुछ अजीब सा लगने लगा। लगा- मानों यह उसका घर नहीं है। और इसके साथ ही एक दो मंजिले खूबसूरत से मकान की धुंधली छवि आँखों के सामने नाच गयी। एक बहुत बड़ा मैदान नजर आया, जिसके बीचोबीच एक सुन्दर बंगला दीखा- चारों ओर फूल-पत्तियों से सजा हुआ सा। लॉन में खड़ी एक गाड़ी नजर आयी। तसवीरें तो धूमिल थी, किन्तु लगा उसे कि ‘फियट’ है।

फिर एकाएक उसे प्रतीत हुआ, मानों वह स्वयं बैठी हो उस गाड़ी में, स्टेयरिंग सम्हाले; और बगल में ही एक नवयुवक को भी बैठे पायी- सपनों के राजकुमार की तरह। गाड़ी अचानक चल पड़ती है; और साथ ही मीना सहसा चीख पड़ी।

चीख सुन भीतर बैठे तिवारी जी बाहर आए। देखे- मीना सिर झुकाए दीवार का सहारा लिए खड़ी है, परन्तु उसकी आँखों की झपकी खोयी है कहीं। उन्हें आश्चर्य हुआ, साथ ही घबराहट भी- मीना की इस स्थिति पर। झपट कर उसे गोद में उठा लिए, छोटी-सी बच्ची की तरह।

‘क्या हुआ बेटे? क्या हो गया तुम्हें? ’- कहते हुए तिवारीजी भीतर लाकर खाट पर चित्त लिटा दिये। पास ही पड़े लोटे से पानी लेकर, दो-चार चुल्लु उसके मुंह पर छींटे। छींटें पड़ते ही वह चैतन्य हो गयी। उठ कर बैठ गयी।

‘क्या बात है मीनू बेटे! क्या तकलीफ है? ’- कन्धा सहलाते हुए तिवारी जी ने पूछा।

‘कुछ नहीं वापू! कहाँ कुछ हुआ है मुझे। ? ’- कहती हुयी मीना इधर-उधर देखती हुयी बोली- ‘विमल चला गया न? नहीं ही माना। कितना कही ठहर जाने को आज भर। ’- फिर मन ही मन बुदबुदायी, जिसे तिवारी जी सुन न सके- ‘ बड़ा आदमी है। अमीर है। मुझ छोटों के घर क्यों ठहरे? क्यों बात करे? क्यों बात माने मेरी? ’

तिवारीजी ने कुछ कहा नहीं। कहना उचित भी नहीं लगा। मीना यूँही कुछ गुमसुम पड़ी रही। फिर सामान्य हो अपने दिनचर्या में लग गयी। पर वैसे ही गुमसुम सी।

इधर तिवारी जी दो-तीन दिन काफी व्यस्त रहे, अपने गृह कार्यों में। ‘भाल-

-चुम्बी’ दीवार को चार-पांच हाथ ऊँचा किया गया। वांस-लकड़ी का उपयोग हुआ। सामान रखने हेतु ‘चंचरी’ बनायी गयी। डेढ़ कमरे के ऊपर आधा और बना, फिर भी इसे दो कैसे कहा जाए?

इन कार्यों से निवृत्त हो जाने पर ध्यान आया प्यारेपुर चलने का। अतः विचार किया आज ही भोजनोपरान्त वहाँ चलने का। उधर से रास्ते में ही पदारथ ओझा को साथ ले लेने का विचार किये, कारण ‘बतुहारी’ में निपुण हैं ओझाजी। सब कुछ तो ठीक है, पर समस्या आयी कि रात में मीना घर में अकेली कैसे रहेगी। सयानी लड़की, सूना घर, आसपड़ोस भी कोई नहीं। कहते हैं- मानव तो मानव है ही, देवता भी कभी-कभी मौका पाकर दानव बन जाते हैं। इन्द्र-चन्द्र तो इसमें माहिर हैं ही....।

भोजन समाप्त कर, चिन्तन से मन को, और तिनके से दांतों को बाहर दरवाजे पर बैठे कुरेद रहे थे तिवारी जी कि कानों में गाड़ी का हॉर्न सुनायी पड़ा। चिन्तन और ‘खरिका’ दोनों से हठात् मुक्ति मिली। चट उठ खड़े हुये। जिराफ सी गर्दन उठा सामने देखने लगे- चौड़ी पगडंडी की ओर, जिधर से गाड़ी आने की सम्भावना थी। पीछे मुड़ कर हांक भी लगाये-

‘मीनू बेटे! लगता है विमल आ रहा है। कहा था न उस दिन, तुम्हें ले जाने को। अच्छा ही हुआ, मौके पर आ रहा है। ’-कहते हुए तिवारी जी किसी कल्पना लोक में पल भर को हो लिए- ‘काश! एक दिन ऐसी ही गाड़ी दरवाजे पर आती। विमल जैसा ही कोई होनहार उसमें सवार होता, और सजी-धजी मीना दुल्हन बनी लाल चुनरी में लिपटी उसके साथ बगल में बैठा दी जाती; और गाड़ी चल पड़ती...। ’

विचार-वादियों में तिवारीजी इस कदर भटक गए कि कब गाड़ी आकर सामने खड़ी हो गयी, उन्हें पता भी न चला। उनका ध्यान तो तब भी भंग नहीं हुआ जब विमल ने चरण-स्पर्श किया-‘प्रणाम वापू...प्रणाम करता हूँ वापू। ’

फिर उसने मीना को आवाज लगायी- ‘तैयार हो मीनू? मैं आ गया तुम्हें लेने। ’

तब उनकी तन्द्रा टूटी- ‘आ गए बेटे? कहो ठीक-ठाक हो न? ’

‘हाँ वापू, आपके आशीर्वाद से बिलकुल ठीक हूँ। मैंने दो दफा आवाज लगायी, पर आप न जाने कहाँ खोये हुए थे कि मेरी बात का जवाब भी न दिए। ’- कहता हुआ विमल भीतर कमरे की ओर चला गया। आवाज सुन मीना भी आंगन में से आ पहुँची, बाहर ही दरवाजे पर।

‘क्यों, आज खुद ही गाड़ी ड्राईव करना पड़ा? ड्राईवर? ’

‘पापा के ड्राईवर को छुट्टी दे दी आज मैंने। ’-मीना के प्रश्न का उत्तर दिया विमल ने- ‘तुम्हारा ड्राईवर हाजिर है। ’-धीरे से भुनभुनाया, ताकि वापू न सुन सकें।

विमल की बात पर मीना मुस्कुराती हुयी फिर अन्दर चली गयी, यह कहती हुयी-‘बाहर ही बैठिये ड्राईवर साहब। मैं तब तक तैयार होती हूँ। ’

विमल सच में बाहर आ गया, वापू के पास। उनसे इजाजत लेने।

‘मीना को ले जाना चाहता हूँ। दो-चार दिनों बाद पहुँचा जाऊँगा। तब तक आप इत्मीनान से बाहर का काम निपटा आइये। ’


‘मैं तो आज ही जाने को सोच रहा था। तुम अच्छे मौके पर आ गये। ’- कहते हुये तिवारीजी कमरे में आ गये। पीछे-पीछे विमल भी कमरे में आगया। ‘मीना बेटी! तुम दोनों खाना खा लो। तब तक मैं तैयार होता हूँ। ’

विमल के लिए खाना पहले ही परोस चुकी थी मीना। उसके ना-ना करते रहने पर भी खाना सामने रख, तख्त पर बैठा दी हाथ पकड़कर।

‘आओ बैठो। खाना तो खाना ही पड़ेगा। उस दिन भी भाग गए थे, खाए वगैर। वापू मुझे डांट रहे थे, कि बिना खाये-पिये मैंने तुम्हें जाने क्यों दिया। ’

‘तुम नहीं खाओगी? अपनी थाली तुम लायी नहीं? ’- कहता हुआ विमल हाथ खींचकर, बैठा लिया- ‘आओ एक साथ ही खायें हमदोनों। ’

धोती चुनते हुए तिवारी जी खड़े मुस्कुराते रहे- ‘खालो मीनू। दिक्कत ही क्या है? ’


भोजनादि से निवृत्त हो मीना चल पड़ी विमल के साथ गाड़ी में बैठ कर। मधुसूदन तिवारी पैदल ही चल पड़े उधमपुर पदारथ ओझा के पास। उन्हें साथ लेकर जाना है, प्यारेपुर निर्मल ओझा के पास। हालाकि विमल ने कहा भी-‘वापू!आप भी हमलोग के साथ ही चल चलते। उधर आपको पहुँचाकर ही हमलोग जाते प्रीतमपुर। ’

‘नहीं..नहीं...तुमलोग जाओ। मुझे रास्ते में कुछ और काम भी है, जिन्हें निपटाते हुए जाऊँगा। तुम कहाँ-कहाँ गाड़ी दौड़ाते फिरोगे। ’-कहते हुए तिवारीजी ने अपनी पद-यात्रा प्रारम्भ कर दी।

विमल और मीना गाड़ी से चले। गाड़ी की दौड़ के साथ ही मीना विचार-

वीथियों में मड़राने लगी। आज विमल अकेला आया है उसे लेने- गाड़ी लेकर, अपने घर ले जाने। उसे लग रहा था, मानों विमल दूल्हा है, और वह उसकी प्यारी दुल्हन।

विचारों की इसी श्रृंखला में उसे एक छवि नजर आयी- धूल- धूसरित कच्ची कंकरीली सड़क, उसे किसी महानगर की प्रसस्त पक्की सड़क सी जान पड़ी। फिर महसूस हुआ कि ड्राईविंग-सीट पर कोई अनजान-अपरिचित युवक बैठा है। अतः वह गौर करने लगी। पहचानने का प्रयास करने लगी- उस परिचित मुखड़े को। किन्तु पल भर में ही विस्मृति की परत हट गयी या कहें घनीभूत हो आयी; और, हाथ बढ़ाकर वर्तुलाकार वाहुपाश बगल में बैठे युवक के गले में डाल दी।

स्टेरिंग घुमाता विमल आवाक रह गया- वाहुबन्धन में बन्धकर। उसने कल्पना भी न की थी कि मीना एकाएक इतना आगे बढ़ सकती है। क्या इसके दिल में उठता प्यार का बयार, प्रबल तूफान का रूप ले बैठा है? काश! ऐसा ही होता। मन की मुराद मिल जाती। छिपे प्यार का प्रत्यक्ष इजहार हो जाता। ’-सोचता हुआ विमल मौके से लाभ उठाना चाहा। दायां हाथ तो स्टीयरिंग पर था। बायां हाथ पीछे करते हुए मीना के कमर में डाल दिया। और फिर.....

......प्यार की मझधार में दो अपरिपक्व तैराक डूबने-उतराने लगे।

मीना पूरी तरह लिपट पड़ी विमल से। उसके कंधे पर सिर टिकाये, आंखें बन्द किये पड़ी रही। इस अप्रत्याशित सुखद स्पर्श से विमल के रोम-रोम में गुदगुदी होने लगी। ग्रीष्म की तपती दोपहरी में भी शीत का अनुभव होने लगा। सारा वदन थर-थर कांपने लगा, मानों अभी- अभी ठंढे़ जल में गोता लगाकर निकला हो। गाड़ी पर कंट्रोल ढीला पड़ता सा लगा। फलतः एक ओर किनारे कर सघन न्यग्रोध तले गाड़ी खड़ी कर दी। रास्ता सुनसान था विलकुल। दोनों हाथों से कस कर मीना को आगोश में भर लिया। उसके होठों पर प्यार का एक मोहक मुहर भी लगा दिया।

मीना किसी आरोही लता की तरह लिपटी रही, विमल के सीने से। परन्तु थी विलकुल मौन। प्रेम के गहरे क्षण में नारी प्रायः मौन ही रहती है। आंखें भी मुंदी ही रहती हैं- विमल ने शायद यही समझा। और खुद भी मौन ही बना रहा। क्या जरूरत है बोलने की? जो परितृप्ति मौन में प्राप्त हो रही है, मुखर होकर उसके खोने की भी भी आशंका है। अतः अर्द्ध निमीलित पलकों में सहेजता रहा प्यार की मधुर सरिता को।

काफी देर तक यही स्थिति बनी रही। यही क्रम चलता रहा। दोनों आलिंगन-बद्ध रहे दुनियां जहा़न को विसार कर।

न विमल को ही खबर है, और न मीना को ही कि वह कुंआरी है, एक गरीब बाप की बेटी है, जो गया है-उसके लिए किसी योग्य वर की तलाश में।

किन्तु क्या वह किसी गैर से लिपटी है? गैरपन का भाव रंच मात्र भी होता यदि उसके मानस में तो क्या अब तक उन घातक हाथों को झटक कर विलग न कर दी होती?

दूसरी ओर यही हाल विमल का भी था। उसे कहाँ पता था कि वह क्या है? एक बड़े बाप का, प्रतिष्ठित बाप का होनहार बेटा है। लोग यदि जान जायेंगे उसकी यह हरकत तो क्या दुष्परिणाम हो सकता है? पिता ने उसे भेजा है- लिवा लाने को, एक परायी पुत्री को...एक निर्बल की आह को...एक गरीब को, जो हर प्रकार से विश्वास करता है- उस परिवार पर...उस पर। पर क्या यह उचित है- जो वह अभी कर रहा है? किए जा रहा है?

विमल सोचने लगता है- बचकानी तर्क से खुद को तुष्ट करने लगता है-यदि यह गलत है तो भी पहल उसकी ओर से नहीं हुआ है। वह तो इतने दिनों से अपने दिल में उठते तूफान को जबरन दबा रखा था। आज वह स्वयं ही मौका दे दी। कदम आगे बढ़ा दी। फिर क्यों चूके? वह लड़की हो कर इतना खुल सकती है, तो यह तो लड़का है...।

परन्तु अभागे विमल को क्या पता कि जो कुछ भी हो रहा है, वह होशोहवाश में नहीं...मदहोशी में। मीना की बाहों में विमल खुद को जरूर समझ रहा है। पर वास्तव में मीना इतनी वेशर्म और गिरी हुयी नहीं, जो एकाएक जवानी के ज्वार में बह चले। मीना की बाहों में वास्तव में विमल नहीं बल्कि कोई और है, जो शायद उसका कोई अपना है...बिलकुल अपना, जिस पर वह न्योछावर हो जाना चाहती है बल्कि इससे भी बड़ा सच तो यह है कि मीना खुद अभी अपने आप में नहीं है शायद।

एकाएक ज्वार थम जाता है। भाटा शुरू हो जाता है। मीना के मानस पटल की छवि बदल जाती है। वह देखती है- वह बैठी पाती है स्वयं को, सघन वटवृक्ष के नीचे खड़ी गाड़ी में विमल के साथ। दोनों दृढ़ आलिंगन बद्ध हैं। अचानक उसे स्वयं का ज्ञान होता है। और ग्लानि से भर उठती है। रेंगते सर्प पर पड़ गये हों मानों पांव उसके। झटक देती है विमल की बाहों को, और परे हट जाती है। काफी देर तक मौन, प्रस्तर प्रतिमा सी बनी निहारती रहती है- निर्निमेष दृष्टि से विमल को। फिर रोने लगती है। क्यों कि उसका स्वप्निल महल वास्तविकता के वज्रपात से धराशायी हो चुका है। पर उसे समझ नहीं आ रहा है कि यह सब क्या तमाशा है- अभी-अभी जो हो रहा था, या जो कुछ हुआ- उसकी धूमिल छवि अभी भी सद्यः स्वप्न दर्शन की भांति बनी हुयी है उसके मस्तिष्क में। ...तो सच वह था या कि सच यह है....? सोच न पा रही थी। समझ न पा रही थी। वस जार-जार रोये जा रही थी। विमल को काठ मार गया। मीना की रुलायी का कोई कारण उसे समझ न आ रहा था। बाहें अब भी फड़क रही थी, मीना को लिपटाने के लिए। ओफ! नारी भी अजीब है। जब तक दूर होती है, अलग रहती है, तब तक इच्छा होती है- आंखों के सामने रखकर निहारते रहने की। समीप आ जाने पर निहारने भर से संतुष्टि नहीं मिलती। तब प्रतीति होती है- स्पर्श और आलिंगन की; और यदि आलिंगन में आकर विलग हो जाए किंचित कारण से तो फिर तत्काल विरह-वेदना भी सताने लगती है।