बीनू भगत / भाग 3 / अज्ञेय

Gadya Kosh से
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“मेरा नाम बैनसन है-जॉन बैनसन विदेश मन्त्रालय से”, कहते हुए उसने मेरी ओर हाथ बढ़ाया।

मैंने तपाक से हाथ मिलाते हुए पूछा, “आप ही स्वागताधिकारी हैं जिनका सन्देशा कल आया था? मुझे आपसे मिलकर खुशी हुई।”

“नहीं, स्वागताधिकारी मैं नहीं हूँ,” बैनसन बोले, “मैं एक-दूसरे विभाग में काम करता हूँ, लेकिन कल मुझे कहा गया कि मेरी साहित्य में रुचि है इसलिए मेरा ही आप से मिलने जाना ठीक रहेगा, इसलिए यह सौभाग्य मुझे मिला है।”

“तब तो सौभाग्य मेरा है”, मैंने कहा, “स्वागताधिकारी तो सभी के लिए एक-सी मुस्कान बिछाते-बिछाते ऊब जाते होंगे। आप को मैं साधारण इनसान लगूँगा, ऐसी आशा करता हूँ।” मैं एक शरारत-भरी हँसी हँस दिया। मेरे मूड में साझा बँटाते हुए उसने भी कहा, “लेकिन मेहमान तो मेहमान ही होता है! हाँ, मैं जरूर आशा करूँगा कि आपका प्रवास समाप्त होने पर मेरी कोई याद आपके पास बनी रही तो वह जॉन बैनसन की होगी, एक नामहीन स्वागताधिकारी की नहीं।”

हम लोगों ने बैठकर चाय की चुस्कियों के साथ कार्यक्रम बनाया। मैं क्योंकि सूचित कर चुका था कि मेरी रुचि नाटक और रंगमंच में भी है, बैनसन ने पूछा, “दूसरी शाम के लिए अभी कोई पक्का प्रस्ताव नहीं है, मेरी राय है कि उस शाम आप एक नाटक देखने चलें। अच्छा नाटक है और हमारे देश में पहली बार खेला जा रहा है। जिस उपन्यास पर आधारित है वह शायद आपने पढ़ा भी हो।” उसने एक प्रसिद्ध अमेरिकी उपन्यासकार का नाम लिया।

“आप भी चलना पसन्द करेंगे-यानी अपनी रुचि से या कि केवल आतिथ्य के नाते मेरे साथ रहेंगे?”

“मैं तो प्रस्ताव ही कर रहा हूँ, यह विदेश मन्त्रालय का सुझाव नहीं है बल्कि मेरा है। विदेश मन्त्रालय की ओर से तो मैं कहता कि आप हमारे किसी नाटककार का नाटक देखिए!” वह थोड़ा हँस दिया। मैंने कहा, “ठीक है, तो नाटक ज़रूर देखा जाए। आप टिकट मँगा लीजिए।”

कार्यक्रम तय हो जाने पर बैनसन ने कहा, “तो मैं अभी थोड़ी देर में इसकी टंकित प्रति आपके पास भिजवा दूँगा। कोई परितर्वन करना चाहें तो नि:संकोच मुझे सूचना दे दीजिएगा। नीचे डेस्क पर मैंने अपने टेलीफोन नम्बर छोड़ दिये हैं दफ्तर का भी और घर का भी।” उपन्यास मैंने कई वर्ष पहले पढ़ा था। उसकी धुँधली-सी स्मृति थी, लेकिन नाटक का प्रस्तुतीकरण बहुत अच्छा था और मुझे सन्तोष हुआ कि बैनसन ने सही प्रस्ताव किया था। लेकिन नाटक देखकर हम लोग बाहर निकले तो गलियारे में भीड़ के साथ-साथ चलते-चलते मेरे मन में विचार उठा कि बैनसन की साहित्य में रुचि है, यहाँ तक तो ठीक; लेकिन इस नाटक में उसकी दिलचस्पी क्यों हुई होगी, उसने मुझे वह क्यों दिखाना चाहा होगा?

और बाहर आते ही मानो मेरा मन पढ़ कर बैनसन ने कहा, “आप सोचते होंगे, मैं आपको यह नाटक देखने क्यों लाया। वास्तव में मेरी अपनी रुचि भी इसमें थी, लेकिन आशा है कि आपको भी नाटक अच्छा लगा होगा-नहीं तो मेरे लिए बड़ी शर्मिन्दगी की बात होगी।”

“यह नाटक सचमुच बहुत अच्छा लगा, “मैंने तपाक से कहा, “एक बार यह विचार जरूर मन में आया कि यह शायद विदेशी मेहमानों को दिखाने का नाटक नहीं है, लेकिन वह तो स्वागताधिकारी का दृष्टिकोण होगा। कथा सचमुच बहुत मार्मिक है।”

बैनसन कुछ नहीं बोला। हम लोग विदेश मन्त्रालय की गाड़ी पर सवार हो गये और गाड़ी तेजी से चल दी। भोजन हम दोनों को साथ ही करना था-उस दिन कोई औपचारिक भोज नहीं था और शायद यह भी सोचा गया था कि मेहमान को अकेला नहीं छोड़ देना चाहिए।

लेकिन हमारी बातचीत सचमुच वैसी नहीं थी जैसी एक बेगारी स्वागताधिकारी और अतिथि के बीच होती है। बैनसन पढ़ा-लिखा व्यक्ति था; साहित्य में उसकी गहरी रुचि थी और मानवीय समस्याओं की उसकी पकड़ भी अच्छी थी। भारत में भी वह चार वर्ष रह चुका था और कई साहित्यकारों से भी उसकी जान-पहचान रही थी। हम लोगों की बातचीत जल्दी ही औपचारिकता के स्तर से हट कर साहित्य के उन पहलुओं पर जा टिकी जिन में कड़ी पक्षधरता और गरमागरम बहस की गुंजाइश हो सकती है, यहाँ तक कि बीच-बीच में हम दोनों को एक-दूसरे को याद दिलाने की आवश्यकता आ जाती कि सामने रखा भोजन ठंडा हो रहा है।

घूम-फिर कर बात फिर नाटक के विषय पर लौट आयी। नाटक में प्रस्तुत की गयी समस्या सीधी, लेकिन मार्मिक थी। एक नि:सन्तान दम्पती: पति की तीव्र इच्छा है कि उसकी सन्तान हो और उसकी इस उत्कट कामना को जानते हुए उसकी स्त्री उसके एक सहकारी से नियेाग द्वारा गर्भ धारण करती है क्योंकि पति को स्वयं यह ज्ञात नहीं है कि पत्नी के नि:सन्तान होने के कारण पत्नी में नहीं बल्कि स्वयं उसमें हैं। पत्नी उसके मोह को तोडऩा भी नहीं चाहती, उसे डर है कि उसके बाद वह जी न सकेगा। सहकारी, जो कुछ ही दिन के लिए था और फिर निकाल दिया गया था, वर्षों बाद लौटता है और वास्तविक स्थिति का भंडाफोड़ करने की धमकी देता है। स्त्री अपनी गृहस्थी की और उससे भी अधिक अपने पति की रक्षा के लिए बाघिन हो जाती है और अन्तत: उसका पति-प्रेम आसन्न संकट पर विजय पाता है। कथानक मार्मिक था और प्रस्तुतीकरण उसके अनुरूप; यों नाटकीयता और सच्चाई को लेकर कई तरह के प्रश्न उठाए जा ही सकते थे। बल्कि ऐसे प्रश्नों का तनाव न हो तो नाटक ही कैसे बनता है। मैंने कहा, “उपन्यास या नाटक में हम बहुधा ऐसी बातें स्वीकार कर लेते हैं जो वास्तविक जीवन में हमें स्वीकार न होतीं। अब इसी नाटक में अगर स्त्री की समस्या को हम नैतिक बनाम मानवीय के रूप में देखें तो सभी का फैसला मानवीय पक्ष में होगा और नैतिक दृष्टि से अपराध पर विचार करने की बात ही सामने न आएगी। लेकिन वास्तव में कहीं ऐसी घटना हुई होती तो-” थोड़ा रुक कर मैंने कहा, “कम से कम हमारे देश में तो समाज उस स्त्री को कभी क्षमा न करता। बल्कि नाटक जहाँ तक जाता है वहाँ तक घटना के बढऩे को कभी नौबत ही न आती-इससे कहीं पहले स्त्री को मार-पीटकर घर से निकाल दिया गया होता। पति के घर में पति के एक नौकर के साथ व्यभिचार-बस, इस निरूपण के आगे कोई सोचने को भी तैयार न होता।”

बैनसन ने कुतूहल से पूछा, “आप सोचते हैं आपके देश में यह नाटक न दिखाया जा सकता? या कि उपन्यास न पढ़ा जाता?”

मैंने कुछ सोचते हुए कहा, “नहीं, ऐसी बात तो नहीं है। यों, नाटक कभी खेला तो नहीं गया और उपन्यास-लेखक के और सभी उपन्यास मेरे देश में खूब प्रसिद्ध हैं और बराबर चर्चित होते हैं, इसी उपन्यास का नाम मैंने वहाँ कभी नहीं सुना। मैंने भी पढ़ा तो इसलिए कि विदेश में कहीं देखा था और खरीद लिया था।”

“ऐसा!” बैनसन थोड़ी देर चुप रहा। फिर उसने कहा, “लेकिन आधुनिक सभ्यता की परिस्थितियाँ हमारी नैतिक धारणाओं की भीतरी वस्तु को, उनके असल मूल्य को कितना बदल दे रही हैं, क्या आपके इंटेलेक्चुअल इस पर विचार नहीं करते?”

मैंने कहा, “इंटेलेक्चुअल तो विचार करते हैं, लेकिन जनसाधारण की मान्यताएँ इंटेलेक्चुअल के विचार के साथ-साथ थोड़े ही बदल जाती हैं और फिर इंटेलेक्चुअल भी जो विचार करता है और जीवन में करता है उसमें बड़ा फ़र्क़ होता है। कभी-कभी तो लगता है कि इंटेलेक्चुअल का मतलब ही पाखंडी नहीं है, नहीं तो कम-से-कम पलातक तो है ही। जीवन की यथार्थता से भाग कर वह सोच की धुन्ध में छिपना चाहता है।” बैनसन के चेहरे पर हल्की-सी शरारत खेल गयी, बोला “यह कहते हुए निश्चय ही आप अपने को इंटेलेक्चुअल नहीं मान रहे हैं। और मैं आशा करता हूँ कि मुझे भी आपने उस दरबे में नहीं डाल दिया है।”

मैंने हँस कर कहा, “यह दाँव आपका रहा, लेकिन सीरियसली क्या यह बात सच नहीं है कि चिन्तन के स्तर पर हम सब मानते हैं कि दाम्पत्य ही क्यों, स्त्री-पुरुष सम्बन्धों पर बिलकुल नए सिरे से विचार होना चाहिए। लेकिन जब व्यवहार की बात आती है तो प्रचलित रीतियों से जरा भी इधर-उधर जाने को तैयार नहीं होते। या अगर होते भी हैं तो उन्हीं रिवाजों को बदलने के लिए जिन्हें हम खुद कोई महत्त्व नहीं देते-यानी इस तरह हमें मॉडर्न और प्रोग्रेसिव होने का श्रेय भी मिल जाता है और सचमुच कुछ भी बदलने की जहमत भी नहीं उठानी पड़ती।” बैनसन फिर थोड़ी देर चुप रहा। फिर उसने कहा, “आपके देश के बारे में मेरी जानकारी बहुत कम है। हमारा समाज तो-शायद इसलिए कि हमारा देश ही नया देश है-”

मैंने उसकी बात काटते हुए कहा, “देश तो आपका भी उतना ही पुराना है जितना और कोई देश-” “आप ठीक कहते हैं। मेरा मतलब उसकी औपनिवेशिक बसाई से ही था। उस दृष्टि से देश नया है और यह समाज भी नया ही है-बल्कि अभी तो कह सकते हैं, बन ही रहा है। यहाँ रूढिय़ों का वह महत्त्व नहीं है जो-” वह थोड़ा सकुचाया, “इसे आप अभद्रता न समझें-जो आपके देश में होता है।”

मैंने उसे आश्वस्त करते हुए कहा, “इतने अधिक शिष्टाचार की जरूरत नहीं है। आपका कहना ठीक है कि हमारे देश में रूढिय़ों को यहाँ की अपेक्षा कहीं अधिक महत्त्व दिया जाता है। लेकिन आप क्या सोचते हैं-नाटक वाली स्थिति आपके समाज में सहज ही हो सकती है?” बैनसन उत्तर देने को हुआ और रुक गया। एक बार उसने चारों ओर नजर दौड़ायी और फिर मेरी प्लेट की ओर देखते हुए बोला, “मीठे में आप क्या लेना पसन्द करेंगे? आपकी इजाजत हो तो यहाँ की दो-एक खास चीज़ों की मैं सिफारिश करूँ?”

मैंने जाना कि उसने विषय बदल दिया है। मैंने भी फिर उसी पर लौटने की कोई जरूरत नहीं समझी और कहा, “हाँ, आप ही चुन लीजिए।” गाड़ी में होटल की ओर लौटते हुए उसने पूछा, “कल मेरी आधी छुट्टी है और मैं दोपहर के बाद अपने फार्म पर जाऊँगा रात उधर ही रहूँगा, आप फार्म तक की सैर करना पसन्द करेंगे? ड्र्राइव भी बहुत सुन्दर है और मेरी पत्नी को आपसे मिलकर बड़ी प्रसन्नता होगी।”

मैंने कहा, “मुझे तो बहुत अच्छा लगेगा, लेकिन आपको और मिसेज बैनसन को कोई कष्ट न हो।” “मेरी पत्नी को तो बहुत अच्छा लगेगा। फार्म वही सँभालती है और वहाँ शायद ही कभी कोई आता-जाता होगा। आपसे मिलकर उसे सचमुच बहुत अच्छा लगेगा।”

“तो ठीक है।” मैंने कहा, “कल के कार्यक्रम' में तो सिर्फ किताबों की दुकानों की सैर ही थी-वह फिर किसी दिन हो जाएगी।' यह तय हुआ कि अगले दिन लंच के बाद बैनसन मुझे लेने आएँगे, और हमने एक दूसरे से विदा ली।

मेरे लिए गाड़ी का दरवाज़ा खोलते हुए बैनसन ने कहा, “आज की यात्रा के लिए इस छोटी गाड़ी की व्यवस्था के लिए मैं क्षमा चाहता हूँ।” मैं कुछ कहूँ, इससे पहले ही वह दूसरी तरफ़ से आकर स्टियरिंग पर बैठते हुए बोला, “आज मैं छुट्टी मना रहा हूँ, इसलिए अपनी गाड़ी लाया हूँ। आशा है आपको अधिक कष्ट नहीं होगा।” “मुझे तो अच्छा ही लगेगा। वर्दीधारी शोफरों का मैं अभ्यस्त नहीं हूँ और न होना चाहता हूँ, और बातचीत के लिए भी यही स्थिति ठीक है।”

जल्दी ही हम लोग बस्ती से निकल गये और गाड़ी खुले जंगली या देहाती इला$के में दौडऩे लगी। बैनसन ने कहा, “मेरी पत्नी अँग्रेज है। तीन वर्ष हुए, मैं इंग्लैंड गया था और वहाँ से विवाह करके लौटा।” थोड़ा रुककर उसने पूछा, “आपके देश में तो विवाह माता-पिता ही तय करते हैं न?” मैंने कहा, “अधिकतर। लेकिन पढ़े लिखे लोगों में प्रेम-विवाह का चलन बढ़ता जा रहा है। यों तो जिन्हें प्रेम-विवाह कहते हैं उनमें भी माता-पिता का कितना योग होता है, यह सवाल पूछा जा सकता है। और दूसरी तरफ़ यह भी पूछा जा सकता है कि जहाँ माता-पिता ही बात तय करते हैं वहाँ लडक़े-लडक़ी का कितना योग होता है?” बैनसन थोड़ा-सा हँसा। “पश्चिम के देशों में भी तथाकथित प्रेम की परिस्थितियाँ पैदा करने में माँ-बाप का योग कुछ कम नहीं होता, यह तो आप जानते ही होंगे।”

थोड़ी देर हम दोनों चुप रहे। फिर मानो आत्म-स्वीकार के स्वर में बैनसन ने कहा, “आपको अचरज होगा, हमारा विवाह भी कुछ हिन्दुस्तानी ढंग से हुआ-विज्ञापन के सहारे।” मैंने कहा, “सच?”

“हाँ”, कहकर बैनसन थोड़ा रुका। “यों तो पश्चिम में विज्ञापन की प्रवृत्ति बढऩे लगी है-यह दूसरी बात है कि विज्ञापन दूसरे ढंग के होते हों या अख़बारों का सहारा न लेकर एजेंसियों और उनके कम्प्यूटरों का सहारा लिया जाए। लेकिन जहाँ एक तरफ़ लडक़े-लड़कियों का मिलना बिलकुल निर्बन्ध है वहाँ दूसरा पक्ष यह भी है कि ऐसे लडक़े-लड़कियों का परिचय कठिनतर हो गया है जो विवाह के लिए एक-दूसरे के उपयुक्त हों। मिलना-जुलना बहुत होता है, लेकिन विवाह को ध्यान में रखकर नहीं। उसके लिए तो...” थोड़ा रुककर उसने वाक्य पूरा किया, “उसके लिए तो अब भी बाहर से स्त्री की जरूरत पड़ती है।” मैं चुप ही रहा। थोड़ी देर बाद उसने अपनी बात जारी रखी, “हमारे देश में तो विशेष समस्या है। पढ़े-लिखे नौजवानों को लड़कियाँ नहीं मिलतीं-यहाँ लड़कियों की कमी है। इसलिए प्राय: बहुएँ विलायत से आती हैं और यह तो आप सोच सकते हैं कि हज़ारों मील दूर से प्रेमालाप नहीं हो सकता।” मैंने कहा, “हाँ, टेलीफोन तो है। वह तो कभी-कभार की बात है और उसके लिए भी तो प्रेम पहले होना चाहिए।”

“इसीलिए यहाँ चिट्ठी-पत्री से दोस्ती का भी काफ़ी प्रचार है। पत्राचार से दोस्ती कराने वाली एजेंसियाँ हैं, क्लब हैं। लेकिन मैं आपको बोर तो नहीं कर रहा?” “नहीं-नहीं”, मैंने कहा और अपनी बात को पुष्ट करने के लिए सवाल जोड़ दिया, “लेकिन इंग्लैंड से आकर आपकी पत्नी को देहात में रहते हुए ऊब नहीं होती होगी?” क्षण भर रुक कर मैंने सोचा, बाल-बच्चों के बारे में सवाल पूछने का रिवाज यहाँ नहीं है, लेकिन इस सन्दर्भ में क्या वह पूछना अनुचित होगा? फिर मैंने कहा, “ऊब नहीं भी हो सकती अगर कोई शिशु हो-” इस रूप में सवाल निश्चय ही अशिष्ट नहीं हो सकता।

“हमारे कोई सन्तान नहीं है। हो भी नहीं सकती।” बैनसन ने यह बात सहज भाव से ही कही, लेकिन मैं कुछ असमंजस में पड़ गया। उसकी बात का क्या अर्थ लगाऊँ और कुछ भी अर्थ लगाऊँ, इस अन्तरंग सूचना को कैसे ग्रहण किया जाए। गाड़ी तेज रफ्तार से दौड़ रही थी। अपनी नजर सडक़ पर टिकाये हुए ही बैनसन ने कहा, “मुझे आपके सामने कनफेशन करना है-और मुझे क्षमा भी माँगनी चाहिए। मैं आपका नाटक देखने के लिये गया था। उसमें मेरी दिलचस्पी अधिक थी-मेरे लिए उसका खास मतलब था। नाटक के नायक जैसी स्थिति मेरी भी है।” मेरा असमंजस और बढ़ गया। लेकिन कोई, और वह भी कोई विदेशी, इस स्तर की आत्म-स्वीकारोक्ति कर बैठे तो उसे उदासीन भाव से लेना उसका अपमान होगा। उसे आत्मीय भाव से ग्रहण करना ही होगा। मैंने पूछा, “लेकिन- लेकिन यह निश्चयपूर्वक जाना कैसे जा सकता है और आप क्या विवाह से पहले...”

बैनसन ने कहा, “हाँ, मुझे विवाह से पहले यह बात मालूूम थी। मैंने ऐन-मेरी पत्नी का नाम ऐन है-को यह बता भी दिया था, हमारे पत्र-व्यवहार के शुरू में ही। बल्कि सच बात यह है कि यह जानते हुए ही मैंने विवाह की बात सोची थी। मेरी माँ तो नहीं हैं, लेकिन मेरे पिता फार्म पर ही रहते हैं। अभी तो शरीर से समर्थ हैं, लेकिन बूढ़े तो हो ही जाएँगे। फार्म उनसे नहीं सँभलेगा-और मैं भी नौकरी छोड़े बिना उसे नहीं सँभाल सकता।” मैंने कहा, “लेकिन फार्म की देखभाल तो विशेष अनुभव माँगती है। आपकी पत्नी...”

“वह फार्म वाले ही एक परिवार की है-बचपन से ही फार्म की देखभाल से परिचित है। उसे मैंने शुरू में ही अपनी पूरी स्थिति समझा दी थी।”

थोड़ी देर फिर चुप्पी रही। फिर बैनसन ने कहा, “मुझे बचपन में मम्प्स हुए थे, बड़ा जबरदस्त अटैक था। उससे कभी-कभी तो दिमाग भी ख़राब हो जाता है। और पुंसत्व नाश तो अक्सर होता है शरीर की शुक्र-कीट बनने की क्षमता नष्ट हो जाती है।” इस बात की कोई जानकारी मुझे नहीं थी; लेकिन बैनसन उसे एक प्रामाणिक वैज्ञानिक सत्य के रूप में ही बता रहा था। मैंने कहा, “मुझे यह बात मालूम नहीं थी, लेकिन इसका क्या कोई इलाज नहीं है?”

“नहीं। कम-से-कम अभी तक तो विज्ञान नहीं जानता। फाइनल इज फाइनल। लेकिन मैं नहीं समझता कि इसके बाद विवाहेतर जीवन सुखी नहीं हो सकता। असम्भव होता है, यह तो मैं मान ही नहीं सकता।” बात अनुक्षण अधिक काँटेदार होती जा रही थी। मैं चुप रहा। बैनसन ही फिर बोला, “पुरुष बड़े स्वार्थी होते हैं, लेकिन असल में तो क्या पुरुष क्या स्त्री सभी बड़े स्वार्थी होते हैं और शायद गहरे स्तर पर इन स्वार्थों के मामले में समझौता नहीं करते- करना चाहें भी तो कर नहीं पाते- बुद्धि जिसे ठीक मानती है, अवचेतन मन या कि कह लीजिए, शरीर उसे स्वीकार नहीं कर पाता। बात स्वार्थ छोडऩे या त्याग करने से नहीं बनती। सुख की शर्त शायद यही है कि दोनों के स्वार्थ मिट जाएँ।” एकाएक उसने मेरी ओर मुड़ कर पूछा, “आप विवाहित हैं?”

मैंने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया, “हाँ।” मैं नहीं चाहता था कि मेरा उत्तर अशिष्ट हो, मैं यह भी नहीं चाहता था कि बातचीत मेरे दाम्पत्य जीवन की ओर मुड़ जाए। बैनसन ने कहा, “जहाँ तक मैं जानता हूँ-ईमानदारी से पड़ताल करके समझ पाया हूँ-ऐन सुखी है और मैं तो बहुत सुखी हूँ। मेरे पिता भी ऐन से बहुत प्रसन्न हैं और जबसे वह आयी हैं, ऐसा लगने लगा है कि उनकी आयु कुछ बढ़ जाएगी।”

मैंने बात को कुछ हल्के स्तर पर लाने के लिए कहा, “तो मानना होगा कि पत्राचार के द्वारा भी सफल सगाइयाँ हो सकती हैं। हमारे देश में इसका चलन अभी बढ़ा नहीं है-एजेंसियाँ तो चलने लगी हैं।” “कोई भी तरीका कम या ज्यादा सफल क्यों होना चाहिए?” “आप का दाम्पत्य सुख जिन अनगिनत घटनाक्रम पर निर्भर करता है उनमें से थोड़ी-सी बातें किसी भी एक पद्धति से जान सकते हैं। जिसे प्रेम-विवाह कहते हैं जिसमें युवक और युवती थोड़ी-सी बातें जान लेते हैं लेकिन भविष्य को सफल कौन-सी चीज़ें बनाती हैं उनका उनको कुछ पता ही लगता-उनकी ओर उनका ध्यान भी नहीं जाता। और जब माता-पिता या बिचौलिए या ज्योतिषी रिश्ते करते हैं तब वे कुछ दूसरे महत्त्व की बातें जान लते हैं; लेकिन उतनी ही महत्त्व की और कई बातों को अनेदखा कर जाते हैं। आजकल कम्प्यूटरों का चलन इसीलिए बढऩे लगा है कि ज्यादा लम्बे और जटिल समीकरणों का हल उनसे पाया जा सके। लेकिन मशीन आख़िर मशीन है-जो उसे खिलाया जाता है उसी के आधार पर वह भविष्य बताती है।”

मैंने कहा, “यह तो है।”

हरियाली की ओर बढ़ते हुए गाड़ी ने मोड़ लिया और बैनसन ने कहा, “अब थोड़ी ही दूर और है। आप थक तो नहीं गये हैं?” मुझे तसल्ली हुई कि मैं अब पूरे उत्साह से कह सकता हूँ, “बिलकुल नहीं-मुझे तो इस सैर में बहुत मजा आया और आपकी ड्राइविंग भी बहुत सधी हुई है। आपको इतनी ड्राइविंग का अवसर कैसे मिलता है?”

“थैंक्स” कहते हुए बैनसन थोड़ा हँसा, “आपकी बात तो बिलकुल ठीक है। तजुरबा तो मुझे फार्म के छकड़े या ट्रक हाँकने का ही होना चाहिए।”

मानो बैनसन की बात का स्मरण करते हुए कुछ दूर पर ट्रैक्टर की आवाज सुनाई दी। बैनसन बोला, “वह ऐन होगी, ट्रैक्टर बहुत अच्छा चलाती है, बल्कि बोवाई, कटाई सबमें बहुत कुशल है।” थोड़ा रुक कर उसने जोड़ा, “इतनी बड़ी मशीन के शिखर पर बैठ कर नारी को शायद विशेष सुख मिलता है- सत्ता शायद नारी का सहज लक्ष्य है।” मैंने आँख बचाकर ध्यान से बैनसन की ओर देखा। लेकिन नहीं, उसके स्वर में कटुता का लेश भी नहीं था। यह ऐन पर या अपने दाम्पत्य जीवन पर टिप्पणी नहीं थी, सहज दार्शनिकता की उक्ति ही थी।

बात को उसी मजाक के स्तर पर लौटाते हुए मैंने कहा, “तो इस देहाती दार्शनिकता से मान लिया जाए कि हम लोग ठिकाने पहुँच गये।” बैनसन भी हँसा, “हाँ, दफ्तर से देहात-फॉरेन हाउस से फार्म फिलोसोफी!” हम लोग एक बड़े फाटक में घुसे।

समाप्त