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मैं शायद कुछ अच्छी कविताएं न लिख पाता अगर यकायक मेरी साढ़े तेरह साल की बेटी मृदुला सिंह ने यह सवाल न पूछा होता कि पापा यह उपन्यास क्या होता है, और इसके दो महीने बाद उसने न बताया होता कि इस बीच उसने अंग्रेजी में कुछ कविताएं और हिन्दी में एक हारर स्टोरी लिखी है. उसके पहले सवाल और बाद में एकाएक लिखने का सिलसिला नहीं मिलाता. इस अंतराल की वजह यह है कि हमारी मुलाकातों के बीच मेरी नौकरी है. जिसे करना मेरी आंतरिक आवश्यकता और छोड़ने की आकांक्षा मेरी मजबूरियां.

मैंने पिछले तीन सालों में मृदुला और अपनी पत्नी प्रतिभा को जितना खोया है उसके अनुपात में उन्हें पाया है अपने मन की दुनिया में. अपनी अनुभूतियों में. उनसे दूरी मुझे लगातार इनके आस-पास रखने में कामयाब रही. इनकी करीबी में मैंने कभी इनके होने पर बहुत गौर कभी नहीं किया.

मुझे यह पता नहीं कि कब मृदु ने बड़ा होना शुरू कर दिया. और कब उसका कद उसकी मां से कुछ ही छोटा रह गया है. वह मेरी मन की दुनिया में आज भी वही शिशु है जो तीन-चार बरस की बमुश्किल होगी. कई बार तो छुट्टियों में घर लौटता हूं तो मुझे लगता है वह अब भी वैसे ही दौड़कर आएगी जब उसने पहले पहल चलना सीखा था और उसे एकाएक एक खाली बड़ा कमरा थोड़ी देर के लिए मिल गया था.

हर बार वह एक नई अदा, मुद्रा और हाव-भाव के साथ मिली है. बच्चों के बढ़ने में यह दो तीन माह का अंतराल भी कम नहीं होता. प्रतिभा में भी बदलाव आता रहा, मगर बहुत कम. मगर मृदु में न सिर्फ शारीरिक बल्कि मानसिक अवस्थाओं रूचियों, रूझान का फर्क या फिर उसमें परिष्कार मेरे लिए गहरे कौतूहल का विषय रहा है.

तीन साल की उम्र में जब उसने आड़ी-तिरछी रेखाएं खींचने का जुनून पाला तो हमें अच्छा लगा था. अखबार से मिलने वाला पैड और रंगीन पेस्टल कलर पेंसिल उसके लिए देने में हमें सुविधा इसलिए भी महसूस हूई थी, क्योंकि उस समय तक प्रतिभा स्टेज पर संगीत के कार्यक्रम प्रस्तुत करने लगी थीं. वह कई बार स्टेज के सामने और स्टेज पर ही रंगों व रेखाओं की दुनिया में डूबी रहती और प्रतिभा अपने गायन में. उसे व्यस्त रखने में उसकी चित्रकला के रुझान को हमने व्यसन की तरह इस्तेमाल किया था. कई बार प्रतिभा को दूसरे शहरों में जाना होता और कई बार रात भर के कार्यक्रम होते तो मैं उसे अपने साथ अखबार के कार्यालय ले जाता जहां वह चित्रों में व्यस्त रहती और मैं टेलीफोन से रिपोर्ट लेने और उसे लिपिबध्द करने में. जनसत्ता के कार्यालय में कई रात देर तक काम करना पड़ता और वह उसी टेबल पर सो जाती जिस पर मैं लिख रहा होता.

कई बार ऐसा हुआ है कि मैं प्रेस में पहले से होता तो प्रतिभा कार्यक्रम में जाने से पहले मृदु को मेरे हवाले कर जाती. पत्रकारिता का काम निपटाने के बाद उसी नींद की हालत में गोद में उठाकर जनसत्ता के कलकत्ता, बीके पाल कार्यालय से आटो रिक्शा से विधाननगर रेलवे स्टेशन और फिर वहां से सियालदह से रात 1148 पर छूटने वाली लोकल ट्रेन से टीटागढ़ पहुंचा हूं और स्टेशन से देर रात की वजह से पैदल उसे नींद की हालत में ही गोद लेकर पातुलिया घर पहुंचा हूं. उसे हमारे संघर्ष का कोई स्मरण नहीं है और न ही जानकारी.

उसे यह नहीं पता है कि मैं उसकी चाहत के बावजूद उसे खेलने के लिए और भाई-बहन नहीं दे सकता. वह खौफनाक रात मुझे याद रहती है जब उसकी मां को लगभग आठ महीने की गर्भावस्था में घर में रात को अकेला छोड़कर मैं एक आदिवासी के बलात्कार की खबरों में उलझा रह गया था. और भोर की पहली ट्रेन से जब घर पहुंचा तो पता चला कि पड़ोसियों ने प्रतिभा को रक्त/ाव की हालत में नर्सिंग होम में भर्ती कराया है, जहां वह रात साढ़े ग्यारह से मेरे पहुंचने तक पेट में मरी हुई बच्ची की वजह से असह्य यंत्रणा झेलती रही थी और मौत से जूझती हालत में डॉक्टर बगैर किसी सगे संबंधी की मौजूदगी या स्वीकृति के अभाव में उपचार करने का जोखिम नहीं उठा सके थे. मृत शिशु को पेट में घंटों रखने की वह पीड़ा न जाने कितने प्रसवों की पीड़ा रही होगी, जो प्रतिभा ने झेला है. प्रतिभा प्रसव के जोखिम को फिर उठाने को बेचैन है, मगर मेरा प्रायश्चित यही है कि मैं अपनी पहली ही औलाद को वह दुलार नहीं दे सका हूं, जिसकी वह हकदार है तो फिर अब दूसरे की बात बेमानी है. और यह दूसरी बेटी जिसने जन्म से पहले ही मृत्यु का वरण कर लिया था यह भी सायास नहीं थी. वह उन भाव-विह्वल संवेनशील क्षणों की देन थी जब मैं खुद जीवन और मृत्यु के बीच झूल रहा था.

बालक ब्रह्मचारी उस शख्सियत का नाम है, जिसके कारण मैं पुलिस की 27 लाठियां खाने की स्थिति में पहुंचा, जिसे लोगों ने देवता बना दिया. विभाजन के बाद बांग्लादेश में उसने जन्म लिया था और जिसने अपने जीवन काल में कई लाख शिष्य बनाए थे. वह निर्विकल्प समाधि की बात करता था. जब उसकी मौत कलकत्ता के कोठारी हॉस्पिटल में हुई तो उसके शिष्यों ने यह मानने से इनकार कर दिया कि वह मर भी सकता है. बालक ब्रह्मचारी निर्विकल्प समाधि पर हैं, यह उनके शिष्यों और उनके शिष्य समूह संतान दल' ने प्रचारित किया. लाखों की संख्या में रोज उनके शव के दर्शन करने लेग उनके सोदपुर स्थित सुखचर धाम में आने लगे थे. मृत्यु के दिन से ही जनसत्ता की ओर से मेरी डयूटी लगी थी और यह कर्मकाण्ड 54 दिन तक चला था. जिसमें 50 दिन मैंने लगभग अपने दिन-रात की कवरेज की थी. रोज 4-5 रिपोर्ट अखबार में छपती. मेरे साथ बांग्ला दैनिक आजकल का रिपोर्टर और मेरा प्रिय दोस्त उदय बसु भी हर समय साये की तरह बना रहा. कई जगह तो हम आईबी क़ा आदमी बनकर गोपनीय जानकारियां हासिल करने में भी सफल रहे. हमने जल्द ही वे रूई के फाहे खोज निकाले थे जिससे बालक ब्रह्मचारी का शव पोछा जाता था और जिस पर वे केमिकल पाए गए थे जिससे लाश को सड़ने से बचाया जा सकता है.

मैंने जनसत्ता में इसकी फोटो भर दी थी पर उदय बसु ने बाजी मार ली थी उसके अखबार ने वे रूई के फाहे फरेंसिक विभाग को सौंपे थे जिससे पश्चिम बंगाल सरकार को यह यकीन हो सका था कि जो लाश सड़ नहीं रही है उसका कारण केमिकल है. उसके बाद उदय बसु संतान दल के लोगों का दुश्मन बन गया था, लेकिन संतान दल से मेरा संबंध इसलिए प्रगाढ़ रहा क्योंकि मैं रोज एक खबर वह लिखता था जो उनके उन बयानों पर आधारित होती थी जो उनके पक्ष को स्पष्ट करती थी. उस खबर की कतरन उन्हें देता था और उन्हें पढ़ कर भी सुनाता था. वे हिन्दी नहीं पढ़ पाते थे, लेकिन उनके विरोध में जाने वाली तमाम खबरें भी रोज होती थीं. संतान दल ने प्रचारित करना शुरू किया था कि हमारा दुश्मन आजकल', हमारा दोस्त जनसत्ता'. बालक ब्रह्मचारी की कवरेज का जनसत्ता' पर सकारात्मक प्रभाव इसलिए दिखाई देने लगा था, क्योंकि उसमें कई रोचक मोड़ होते थे, लेकिन यह कवरेज मेरे लिए कई मोर्चों पर क्षतिकारक रहा. उन दिनों मेरा कारोबार घाटे में चल रहा था, मेरी गैरमौजूदगी में वह घाटा और बढ़ गया. केदारनाथ सिंह की कविताओं पर पी-एचडी का शोध जमा करने की तिथि लगातार करीब आती जा रही थी. शोध निर्देशिका डॉ ऌला रानी सिंह के फोन आने पर भी मैं उनके यहां अपना शोध कार्य दिखाने नहीं पहुंच सका, जबकि कॉलेज में उनकी छुट्टियां चल रहीं थीं. खफा होकर वे अपने भाई के यहां बंगलोर चली गईं. जब शोध जमा करने में दस दिन बचे तो मैं जनसत्ता से छुट्टी लेकर उनके यहां यह कहने पहुंचा कि अब समय निकल चुका है सो मैं सीधे टाइप की हुई प्रति आपको देने जा रहा हूं जिस पर आपको केवल हस्ताक्षर भर करना है. मेरे प्रस्ताव पर वे ऐसा बिफरीं कि वह मेरी उनसे अंतिम मुलाकात ही साबित हुई. और मेरी पांच साल की मेहनत जाती रही. मैं कभी अपना शोधकार्य किसी भी विश्वविदयालय में जमा नहीं कर सका. मैं वापस जनसत्ता की ट्रिंगरीय डयूटी पर लौट आया, जहां बालक ब्रह्मचारी की कवरेज मेरा इंतजार कर रही थी. जिस रात रात सवा दो बजे पश्चिम बंगाल सरकार ने ऑपरेशन सत्कार' को अंजाम देते हुए बालक ब्रह्मचारी के शव को अपने कब्जे में लेकर उसका अंतिम संस्कार कर अंधविश्वासों पर रोक लगाने का कार्य किया उसका पता सभी को था. शाम साढ़े छह बजे रोज की तरह संतान दल की ओर से सुखचर आम में प्रेस कॉन्फ्रेंस हुई तो उसके प्रवक्ता ने बयान दिया कि चाहे हजारों लोगों को अपनी जान देनी पड़े हम लाश को छूने नहीं देंगे. आदि शंकराचार्य की तरह बालक ब्रह्मचारी भी निर्विकल्प समाधि से लौटेंगे तो अपना शरीर खोजेंगे, इसलिए उनके शरीर की रक्षा जरूरी है.

मैं इस बेहद जोखिम भरे और रोमांचकारी कारनामे को देखने के अनुभव से अपने को वंचित करने को तैयार न था. मैंने संतान दल के प्रमुख लोगों से बात की और उन्हें इस बात पर राजी कर लिया कि मैं ऑपरेशन सत्कार के दौरान भी रात को उन्हीं लोगों के साथ रहूंगा. मैं उन्हीं के साथ अपनी जान गंवाने को तैयार था. उन्हें अपने देवता के प्रति अपनेर् कत्तव्य का निर्वाह करना था और मुझे अपने पेशे के प्रति. मैंने जनसत्ता' के स्थानीय संपादक श्यामसुंदर आचार्य को मेरे साथ ही प्रेस कांफ्रेंस में पहुंचे कृष्णदास पार्थ की मार्फत फोन पर यह खबर दे दी कि मैं ऑपरेशन के दौरान आम में रहूंगा और हंसते हुए कहा था कि यदि मैं बाद में न मिला तो लाशों में से खोज लिया जाए. जनसत्ता की ओर से दो रिपोर्टर और एक फोटोग्राफर इस कवरेज के लिए रात बारह बजे से आम के बाहर लगा दिए गए थे जहां अन्य सभी मीडिया वालों के लिए पुलिस ने अपने हिसाब से सुरक्षित जगह मुहैया कराई थी तथा उस दायरे से बाहर जाने पर मनाही थी. रात नौ बजे सुखचर धाम का भव्य लौह गेट भीतर से बंद कर ताला लगा दिया गया. अब धाम के भीतर लगभग पांच हजार भक्त थे, जिनमें युवतियां भी थीं और सत्तर साल के बुजुर्ग भी. रात एक बजे टीवी चैनल की पत्रकार मणिदीपा बनर्जी ने गेट के बाहर से पुर्जी भिजवाई कि वे भीतर आना चाहती हैं. संतान दल के लोग उन्हें उसी तरह मना करने जा रहे थे जैसे उन्होंने आनंद बाजार को किया था, मगर मैंने मणिदीपा के लिए गुजारिश की तो वे मान गए. अब हमारे साथ मणिदीपा और उनका कैमरामैन भी था.

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