सुनंदा की डायरी / जाति / राजकिशोर

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कल मुझसे बहुत बड़ी बेवकूफी हो गई। अभी तक समझ में नहीं आया कि अचानक मैं ऐसा कैसे कर बैठी।

जात-वात में मेरा कोई विश्वास नहीं है। स्कूल और कॉलेज के रजिस्टर में मेरा नाम सुनंदा मिश्र के रूप में दर्ज है। यह तो बचपन में ही पता चल गया था कि हम ब्राह्मण हैं। इस बात को लेकिन मैंने कभी महत्व नहीं दिया। दूसरे लड़के-लड़कियां भी मेरी ही तरह थे। उनमें और मुझमें फर्क क्या है? मुझे तो कोई फर्क नजर नहीं आता था। जाति का महत्व तब मेरी समझ में आया जब कक्षा आठ में एक लड़का फर्स्ट आ गया। इस पर मेरी कक्षा में तूफान आ गया। मालूम हुआ कि वह एससी है। तब तक मुझे पता नहीं था कि यह एससी क्या होता है। मैंने अपने भोलेपन में सोचा कि यह कोई ऊंची जाति होती होगी। सहपाठियों की कानाफूसी से पता चला कि वह चमार है। यह भी कि चमार एससी कहलाते हैं। यह मुझे मालूम था कि चमार कोई नीची जाति है।

सहपाठियों को यह बात अखर रही थी कि एक एससी ने वार्षिक परीक्षा में सबको पछाड़ दिया। मुझे कोई मलाल नहीं था, क्योंकि मेरे नंबर अच्छे आते थे, पर मैं कभी फर्स्ट, सेकंड या थर्ड नहीं आती थी। उस साल भी मेरे नंबर उम्मीद के अनुरूप ही थे। पर दूसरे लड़के-लड़कियां उसके फर्स्ट आने से चिढ़े हुए थे। उन्हें बहुत गुस्सा आ रहा था कि एक नीची जाति का लड़का कैसे उन्हें फलांगते हुए आगे बढ़ गया। इससे भी बुरी बात यह हुई कि अखबारों में उस लड़के का मुसकराते हुए फोटो छपा। उससे एक छोटा-सा इंटरव्यू भी लिया गया था, जिसमें उसने बताया था कि इम्तहान से तीन महीने पहले से ही उसने खेल, सिनेमा, टीवी आदि सब कुछ छोड़ दिया था और एकाग्रचित्त हो कर पढ़ाई करने में जुट गया था। यह इसलिए भी जरूरी था क्योंकि उसके माता-पिता बहुत गरीब हैं और ट्यूशन का पैसा नहीं दे सकते थे। जहां-जहां उसकी समझ में नहीं आता था, वह स्कूल में किसी शिक्षक से पूछ लेता था या उस हिस्से को तब तक दुहराता-तिहराता रहता था जब तक अच्छी तरह समझ में न आ जाए।

स्कूल के लिए यह गौरव की बात थी कि उसके एक छात्र की सफलता का जिक्र नगर के प्रतिष्ठित अखबार में हुआ है। इसलिए अखबार का वह पन्ना स्कूल के नोटिस बोर्ड पर टांग दिया गया। टिफिन के वक्त जब मैं उधर से गुजरी, तो देखा, वह फटा-नुचा हुआ था - इतना कि उसे पढ़ा नहीं जा सकता था। मैंने सोचा, जरूर यह किसी ब्राह्मण स्टूडेंट की करामात होगी। उसी क्षण मैंने तय कर लिया कि मुझे ब्राह्मण नहीं कहलाना। स्कूल के रेकॉर्ड में तो मेरा नाम बदल नहीं सकता था, पर मैंने सिर्फ सुनंदा लिखना शुरू कर दिया। तब से आज तक सुनंदा हूं। लेकिन लोग हैं कि मानते नहीं। जिससे भी अपना नाम बताती हूं, वह पूछ बैठता है - आगे? मैं चकित हो कर पूछती हूं - आगे क्या? वह अपनी बात स्पष्ट करता है - मतलब आपका सरनेम क्या है? मेरा जवाब होता है - मेरा कोई सरनेम नहीं है। क्या सिर्फ नाम से काम नहीं चलेगा? वह झेंप तो जाता है, पर मेरी तरफ इस तरह देखता है जैसे मैं किसी अन्य ग्रह से आया हुआ प्राणी होऊं।

क्या सुमित के साथ भी कुछ ऐसा ही हुआ था? उसका भी कोई सरनेम नहीं है। वह जिस जाति का भी हो, उससे मुझे क्या लेना-देना? लेकिन जिज्ञासा तो जिज्ञासा ही होती है। जब तक पूरी न हो जाए, डंक मारती रहती है। अब तक हमारे बीच इतनी अंतरंगता हो गई थी कि छोटी-मोटी बातें कुछ मायने नहीं रखती थीं। इसलिए मैंने एक दिन पूछ लिया, सुमित, बुरा न मानो, तो एक बात पूछना चाहती हूं।

उसने हंस कर कहा, तुम मुझसे कुछ भी पूछ सकती हो।

फिर भी मेरी हिचक दूर नहीं हुई। मैंने कहा, सचमुच बुरा नहीं मानोगे न?

उसने मेरा हाथ अपने हाथ में लेते हुए जवाब दिया, तुम्हारी किसी भी बात का बुरा मानने का सवाल ही नहीं उठता।

मैंने धड़कते हुए दिल से पूछा, सुमित, तुम्हारी जाति क्या है?

अगले ही क्षण एक झन्नाटेदार तमाचा मेरे गाल पर लगा। मेरा सिर झनझना गया। आंखों में आंसू आ गए।

सुमित गुस्से में कांप रहा था। उसने विकृत हो आई आवाज में जोर से कहा, गेट आउट, यू इडियट। मैं तुम्हारा मुंह नहीं देखना चाहता।

मैं बैठी रही। आंसू और घने हो गए। मुझे यकीन नहीं हो रहा था कि यह वाक्य मुझे ही कहा गया है। मेरी आंखों के आगे अंधेरा छाने लगा।

फिर भी यह समझने लायक होश मुझमें बचा हुआ था कि मुझे क्या करना चाहिए। मैं रूमाल से अपना चेहरा पोंछते हुए दरवाजे से बाहर निकल गई। सीधे अपने कमरे में पहुंची और बिस्तर पर लेट कर धार-धार रोने लगी। जिस गाल पर थप्पड़ लगा था, वहां बहुत दर्द हो रहा था। जिंदगी में पहली बार मैंने पहली बार थप्पड़ खाई थी और वह भी इतने जोर से। उठ कर शीशे में देखा, तो गाल में सूजन आ गई थी। मन हुआ कि कुछ लगा लूं। फिर सोचा कि यह सुमित की अवमानना होगी। मैंने रूमाल भिगोया और आहत गाल पर धीरे-धीरे उसे फेरने लगी।

कुछ मिनटों के बाद दर्द से तो थोड़ी राहत मिल गई, पर मन अब भी धधक रहा था। सुमित ने मुझे थप्पड़ मारा । सुमित ने? जिसकी मैं पूजा करती हूं, उसी सुमित ने? मैंने उसकी जाति ही तो पूछी थी। क्या यह इतना बड़ा गुनाह था? वह मेरी जाति जानना चाहता, तो बताने में मुझे क्या हिचक होती? आखिर वह इतना तो समझ ही गया होगा कि जात-पांत में मेरा विश्वास नहीं है। सुमित के बारे में भी मेरी धारणा यही थी कि वह इन टुच्ची चीजों से उपर उठ चुका है। इसलिए मैंने उसकी जाति पूछ ही ली, तो उसका ऐसा क्या अपमान हो गया? आखिर उसकी कोई न कोई जाति तो होगी ही। उसे बता देने से उसका क्या आता-जाता था? उसकी जाति जान लेने से उसके प्रति मेरी भावना में कोई फर्क तो पड़ने वाला नहीं था।

इस बारे में जितना सोचती जाती, मेरी विकलता उतनी ही बढ़ती जाती थी।

करीब आधे घंटे बाद कॉल बेल बजी। मैंने सोचा, बेयरा होगा। मैं नहीं उठी। इस वक्त किसी से मिलना नहीं चाहती थी

घंटी दुबारा बजी। मैंने उसकी भी उपेक्षा की। कष्ट की उस अवस्था में भी मैंने सोचा कि एक और घंटी यह जानने के लिए होनी चाहिए कि बुलाने की घंटी बजाई जा सकती है क्या।

घंटी तीसरी बार बजी। उठ कर दरवाजे तक गई। दरवाजे को थोड़ा-सा खोल कर देखा, अरे, यह तो सुमित है। उसे देख कर जितना बुरा लगा, उतना ही अच्छा भी।

कमरे में दाखिल हो कर वह कुर्सी पर बैठ गया। मेरी कुर्सी उसके सामने थी।

सुमित कुछ देर तक एकटक मुझे देखता रहा। फिर वह उठा और मेरे उस गाल को सहलाने लगा जिस पर तमाचा पड़ा था। फुसफुसा कर बोला, 'आइ एम सॉरी।'

कुछ देर तक चुप रही। मौन आहत व्यक्ति का सबसे अच्छा मित्र होता है।

सुमित ने मेरा हाथ अपने हाथ में ले कर कहा, 'माफ करना, मैं एकदम उत्तेजित हो गया था। दरअसल, जाति का सवाल मेरे लिए बहुत संवेदनशील है।'

फिर भी मैं चुप रही।

सुमित बोला, 'जाति हिंदुस्तान का सबसे सड़ा हुआ मामला है। किसी भी दूसरे मामले से ज्यादा सड़ा हुआ।'

मुझे लगा, अब और चुप रहना मेहमान का निरादर होगा। मैंने कहा, 'लेकिन आप तो जानते ही हैं, जात-वात में मेरा विश्वास नहीं है।'

सुमित - 'तो ऐसा बेहूदा सवाल करने की जरूरत क्या थी?'

अभी भी मेरा हाथ उसके हाथ में था।

मैंने जवाब दिया, 'आपस में हम क्या एक-दूसरे से इतनी मामूली-सी बात नहीं पूछ सकते?'

सुमित - 'तुम्हारे लिए मामूली बात होगी। मेरे लिए तो यह बिजली के करंट की तरह है। किसी को किसी की जाति जानने की उत्सुकता ही क्यों हो?'

कॉल बेल फिर बजी। बेयरा था। शायद सुमित ने उसे चाय ले कर आने के लिए पहले ही कह दिया था।

चाय पीने के बाद मन थोड़ा व्यवस्थित हुआ।

लेकिन सुमित, जाति व्यवस्था तो अब कमजोर पड़ रही है।


कैसे? जरा मुझे भी मालूम हो।

दो-तीन पहले ही मैंने अखबार में पढ़ा था कि भारत में अंतरजातीय विवाहों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। पांच साल में वह दुगुनी हो गई है।

हो गई होगी। कुछ साल बाद चार गुनी भी हो जाए, तो क्या हुआ? तब भी वह देश में होने वाले कुल विवाहों का पांच प्रतिशत भी नहीं होगी।


फिर भी कुछ प्रगति तो हो ही रही है।

तो तुम भी यही समझती हो कि ये लड़के-लड़कियां जाति तोड़ने के लिए शादी कर रहे हैं? यह एक बहुत बड़ा भ्रम है। ज्यादातर तो अपनी जाति में ही शादी करना चाहते हैं। यहां तक कि प्रेम विवाह में भी जाति को प्राथमिकता दी जाती है। कितने सवर्ण लड़के दलित लड़कियों से प्रेम या शादी करते हैं?


तो फिर?

फिर क्या? अंतरजातीय विवाह करने का मकसद जाति तोड़ना नहीं, अपने मनचाहे लड़के या लड़की से विवाह करना है। विवाह व्यक्तिगत मामला है, यह समाज सुधार के लिए नहीं किया जाता।


यह तो ठीक है। पर इससे जाति तो कुछ हद तक टूटती ही है।

हां, लेकिन यह नियम नहीं, अपवाद है। इसी फार्मूले के भरोसे हम बैठे रहें, तो जाति व्यवस्था खत्म होने में सौ साल लग जाएंगे। तब भी पता नहीं यह हो पाएगा या नहीं, क्योंकि जाति तभी टूटेगी जब सभी जातियों की आर्थिक-सामाजिक हैसियत बराबर हो जाएगी। वह समय कभी आएगा भी या नहीं, कौन कह सकता है?


और जब तक जाति है, तब तक सब की आर्थिक-सामाजिक हैसियत बराबर होने से रही।

एकदम सही। यही तो दुश्चक्र है जो जाति को टूटने नहीं दे रहा है। बल्कि उसे और मजबूत कर रहा है।

तो तुम्हारा कहना यह है कि जाति व्यवस्था सामाजिक विषमता को बनाए रखने के लिए शुरू की गई थी और यही काम वह अब भी कर रही है।


इसके पीछे और क्या मकसद हो सकता था? शायद यह भी सोचा गया होगा कि समाज की एक व्यवस्था बना दो, जो चिर काल तक चलती रहे। हिन्दू दिमाग उथल-पुथल से बहुत घबराता है। बहस वह चाहे जितनी कर ले, पर समाज में कोई मौलिक परिवर्तन हो, यह वह बर्दाश्त नहीं कर सकता। शंकर इसका बहुत बड़ा उदाहरण हैं। उनके लिए सच पारमार्थिक सत्य था और झूठ सांसारिक सत्य। उन्हें इन दोनों में कोई विरोध नहीं दिखाई पड़ता था।


लेकिन जाति व्यवस्था की शुरुआत कब हुई?

मुझे पता नहीं कि जाति व्यवस्था की शुरुआत कब हुई थी और किसने की थी। बड़े-बड़े विद्वान भी इस बारे में किसी ठोस नतीजे पर नहीं पहुंच पाए हैं। यह जरूर साबित है कि लगभग तीन हजार सालों से जाति व्यवस्था हिन्दू समाज को ग्रसित किए हुए है। कहा जा सकता है कि हमने विश्व को जो चार मौलिक चीजें दी हैं, उनमें से एक जाति प्रथा भी है। शेष दुनिया में कहीं भी जाति जैसी कोई चीज नहीं है।


बाकी तीन मौलिक चीजें क्या हैं?

गणित के क्षेत्र में शून्य की अवधारणा, दर्शन के क्षेत्र में वेदांत और तर्कशास्त्र के क्षेत्र में स्याद्वाद। अचरज की बात यह है कि इतनी बड़ी-बड़ी चीजों का आविष्कार करने वाले समाज ने जाति व्यवस्था जैसी गंदी चीज की सृष्टि कैसे कर डाली।

इसका रहस्य कहीं यह तो नहीं है कि हिन्दू समाज सिद्धांत में तो बहुत उदार, पर व्यवहार में बहुत अनुदार रहा है। आज भी हम भारतीय संस्कृति की महानता का बखान करते हैं और व्यावहारिक जीवन में तरह-तरह की हिंसा और क्षुद्रता में लिप्त रहते हैं। इतने संघर्ष के बाद भी दलितों को हिन्दू समाज ने बराबरी के स्तर पर स्वीकार नहीं किया है।

दलितों का मामला तो और भी गजब है। इन्हें तो जाति व्यवस्था के भीतर भी नहीं रखा गया। शास्त्रों में इन्हें पंचम वर्ण कहा गया है। पंचम वर्ण माने जो चारों में से किसी भी जाति का नहीं है। हिन्दू है, फिर भी समाज से बहिष्कृत है। उसे छूने से या जिनकी छाया पड़ जाने से भी आदमी अपवित्र हो जाता है। इतना नीचा स्थान तो किसी जानवर का भी नहीं है।

अच्छा, अस्पृश्यता की शुरुआत कैसे हुई होगी?


इस पर भी रहस्य का परदा पड़ा हुआ है। इतना तो तय है कि कोई भी समुदाय अपनी खुशी से अछूत नहीं हुआ होगा। अछूत का काम क्या था? मल-मूत्र उठाना, मरे हुए जानवरों की खाल उतारना, जूते बनाना, कूड़ा साफ करना ...। डॉ. अंबेडकर का कहना है, किसी पराजित समूह के सदस्यों पर ये सभी काम, जो गंदे माने जाते थे, थोप दिए गए होंगे। हारे हुए समुदाय के साथ आप कुछ भी कर सकते हैं। इसीलिए इन्हें संपत्ति तो क्या, किसी भी मानवीय अधिकार से वंचित कर दिया गया। इन्हें अन्य जातियों के जूठन और उतरन पर निर्भर रहना पड़ता था। इनकी बस्ती गांव के बाहर होती थी। इन्हें नीचा दिखाने के लिए इन्हें चांडाल तक कहा गया है।


यह तो जाति प्रथा की निकृष्टतम परिणति है।

है ही। जाति प्रथा बनाई ही इसलिए गई थी कि समाज में हैसियत की विषमता बनी रहे। इस व्यवस्था में ब्राह्मण ने खुद को सबसे ऊपर और शूद्र को सबसे नीचे रखा। बीच में क्षत्रिय और वैश्य थे। ब्राह्मण ने अपने लिए कोई काम निर्धारित नहीं किया। शास्त्र-पुराण बांच कर, पूजा-पाठ करके और पंचांग देख कर वह अपनी जीविका उपार्जित करता था और सतत परजीवी बना रहता था। वही यह भी तय करता था कि किसका क्या कर्तव्य है। यहां तक कि उसने समाज से यह भी मनवा लिया कि ब्राह्मण अवध्य है।

हां, अब याद आ रहा है। एक लेखक ने बताया है कि चूंकि युद्ध लड़ने का काम सिर्फ क्षत्रियों के जिम्मे था, इसलिए हम विदेशी हमलों का सामना नहीं कर सके। संकट के समय पूरे देश या क्षेत्र को मिल कर युद्ध करना चाहिए था, पर हमारे देश में यह संभव नहीं था। ब्राह्मण तो लड़ने से रहा, वैश्य का काम सिर्फ व्यापार करना था और शूद्र पर खेती तथा कारीगरी के विभिन्न काम करने का जिम्मा था। दलितों को तो छूना भी वर्जित था। ऐसी अवस्था में मुट्ठी भर क्षत्रिय कौन-सा कमाल करके दिखा सकते थे? लेखक के अनुसार, भारत को गुलाम बनाने में इसकी बहुत बड़ी भूमिका रही। जब कि हमलावरों में कोई जाति प्रथा नहीं थी। वे एक साथ बैठ कर खा-पी सकते थे। इससे उनमें एकता की भावना मजबूत रहती थी। इस तरह देखा जाए, तो हिन्दू धर्म ही अपना सबसे बड़ा दुश्मन साबित हुआ।

जिस देश में कई हजार साल तक यह बर्बर व्यवस्था बनी रही, वह प्रगति कैसे कर सकता था? एक दौर ऐसा भी आया जब ब्राह्मणों ने समुद्र यात्रा पर पाबंदी लगा दी। यह पाबंदी उन्नीसवीं शताब्दी तक जारी रही। गांधी जी जब इंग्लैंड से पढ़ कर लौटे, तो अपने को शुद्ध करने के लिए उन्हें गोमूत्र पीना पड़ा।

ऐसा क्यों किया गया होगा भला?

मेरा खयाल तो यही है कि ब्राह्मण वर्ग नहीं चाहता था कि भारत के लोग विदेश का सफर करें। बाहर जाने पर उनके सामने यह भेद खुल जाता कि जाति व्यवस्था भारत में ही है, कहीं और नहीं। वे लौट कर विद्रोह कर सकते थे।

शायद इसीलिए कहा जाता है कि हिन्दू होने के लिए किसी भी चीज की जरूरत नहीं है - न आस्तिकता, न पूजा-पाठ, न चंदन-तिलक - बस आपकी कोई जाति होनी चाहिए। अगर आप जाति व्यवस्था के भीतर नहीं हैं, तो आप हिन्दू होने का दावा नहीं कर सकते। उड़ीसा के शंकराचार्य ने तो एक बार ऐसा कह भी दिया था - जो जात-पांत को नहीं मानता, वह हिन्दू नहीं है। इस पर बहुत हो-हल्ला मचा था, पर शंकराचार्य ने गलत नहीं कहा था। हिन्दू होने की बुनियादी शर्त यही है।


ऊपर से यह दावा किया जाता है कि भारत की जमीन लोकतंत्र के लिए बहुत उर्वर रही है। कि यूरोप की तरह हमने तानाशाही और राजकीय क्रूरता के दौर नहीं देखे। कि अहिंसा को हमारे यहां सबसे ऊपर का दर्जा दिया गया है। थू है इस पाखंड पर।

मुझे तो लगता है, पाखंड हमारे अस्तित्व में ही बुना हुआ है। एक तरफ यह दावा कि सभी जीवों में एक ही आत्मा है, दूसरी ओर इतनी जातियां, उपजातियां और अछूत। एक ओर यह स्थापना कि मनुष्य ज्ञान से ही मुक्त हो सकता है, दूसरी ओर स्त्रियों और शूद्रों को ज्ञान की दुनिया से बाहर रखना। और तो और, परिवार के भीतर भी कितनी हिंसा होती है। दुनिया भर में हमारे जैसा पाखंडी देश शायद ही कोई और हो।


इसी का तो नतीजा है कि हमारे यहां लोकतंत्र भी एक बहुत बड़ा पाखंड हो कर रह गया है। हमारा पढ़ा-लिखा मध्य वर्ग सबसे ज्यादा पाखंडी है। बोली कुछ, काम कुछ और।


अच्छा सुमित, यह बताओ कि जब संविधान के द्वारा अस्पृश्यता को अवैध घोषित कर दिया गया, तो इसके साथ ही जाति प्रथा को भी गैरकानूनी घोषित नहीं कर सकते थे?

बिलकुल नहीं कर सकते थे। संविधान बनाने में भले ही दलित चिंतक डॉ. अंबेडकर की केंद्रीय भूमिका रही हो, पर बहुतायत तो ऊंची जाति के हिंदुओं की ही थी। इनमें से करीब-करीब सभी जाति व्यवस्था के समर्थक थे। एक और बात है। अगर संविधान में जाति प्रथा को अवैध करार कर दिया जाता, तो उस संविधान के खिलाफ देश भर में विद्रोह खड़ा हो जाता। संविधान निर्माताओं को अपना प्रस्ताव वापस लेना पड़ता। आखिर कानून मंत्री डॉ. अंबेडकर को हिन्दू कोड बिल के विवाद पर ही तो मंत्रिमंडल से इस्तीफा देना पड़ा था।


चलो, अनुसूचित जातियों को संसद और विधान सभाओं में आरक्षण दे कर एक अच्छा काम हुआ।

मुझे इसमें शक है। इस आरक्षण से एक भी सशक्त दलित नेता नहीं उभर सका। हां, सरकारी नौकरियों में आरक्षण से अनुसूचित जातियों और जनजातियों को जरूर फायदा हुआ है। इसी तरह, पिछड़ी जातियों को भी आरक्षण से लाभ हुआ है। मेरा निश्चित मत है कि निजी नौकरियों को भी आरक्षण के दायरे में लाना चाहिए। इसके पीछे एक तर्क यह भी है कि अब सरकारी नौकरियां कम हो रही हैं और निजी क्षेत्र में नौकरियां बढ़ रही हैं। एक ही समय में दो तरह की व्यवस्थाएं एक साथ नहीं चल सकतीं।

लेकिन आरक्षण की कोई अवधि तो तय होनी चाहिए। मेरा खयाल है, अंतहीन आरक्षण से किसी का भला होने वाला नहीं है।

सुनंदा, तुम्हारी राय से काफी हद तक सहमत हूं। विशेष अवसर का सिद्धांत विशेष परिस्थिति के लिए है। क्या हम चाहते हैं कि आज विभिन्न जातियों के बीच अवसर की जो असमानता है, वह चिर काल तक बना रहे? इससे तो विषमता की वर्तमान व्यवस्था ही मजबूत होगी।


तो विकल्प क्या है?

विकल्प यह है कि नौकरियों में आरक्षण की अवधि तय की जाए - दस साल, पंद्रह साल, बीस साल, जो भी ठीक लगे। सरकार यह संकल्प करे कि इस अवधि में वह अवसर की असमानता को खत्म कर देगी।

यह होने से रहा। अभी तक तो किसी भी सरकार ने यह लक्ष्य घोषित नहीं किया है। यह भी तो सोचो कि अगर ऐसा हो गया, तो देश में समाजवाद नहीं आ जाएगा!

यही तो मैं भी कहता हूं। भारत के सभी साधन-संपन्न लोग समाजवाद से डरते हैं। हर कोई विशिष्ट बनना चाहता है। इसकी जड़ें जाति व्यवस्था में हैं। जो समाज व्यवस्था में समानता नहीं चाहता, वह अर्थव्यवस्था में समानता कैसे बरदाश्त करेगा? धीरे-धीरे असमानता का दर्शन और मजबूत होता जाएगा। क्योंकि विषमता ही पूंजीवाद का इंजन है। देख नहीं रही हो, जब से पूंजीवाद को ऑफिशियल मान्यता मिली है, हर साल कुछ नए करोड़पति और अरबपति पैदा हो जाते हैं। अब यह तो हो नहीं सकता कि एक दिन पूरा देश ही करोड़पति या खरबपति हो जाए। जब दुनिया के सबसे बड़े पूंजीवादी अमेरिका में यह नहीं हो पाया न कभी हो पाएगा, तो हमारा भारत भला किस खेत की मूली है? जो नीतियां हमने अपनाई हैं, उनके रहते अगले बीस-तीस वर्षों में भी सबको ठीक-ठाक रोजगार देना तक मुमकिन नहीं है।


ठीक जाति प्रथा की तरह, जिसमें शूद्र और अति शूद्र दूसरे-तीसरे दर्जे का नागरिक बने रहने के लिए अभिशप्त रहे हैं। आज इस सूची में मुसलमानों और औरतों को भी शामिल करना होगा।


क्यों नहीं। स्त्री चाहे जिस जाति की हो, परिवार में उसकी हैसियत शूद्र जैसी होती है। मुसलमानों को अभी भी म्लेच्छ माना जाता है। जैसे-जैसे आर्थिक विकास हो रहा है, और भी नई-नई विषमताएं सामने आ रही हैं। एक विषमता तो अंग्रेजी जानने वालों और नहीं जानने वालों के बीच है। अंग्रेजी नहीं जानने वालों के साथ शूद्र जैसा व्यवहार होता है। दूसरी विषमता जो तेजी से बढ़ रही है, वह गांवों और शहरों के बीच है। बिहार या उड़ीसा या आंध्र प्रदेश के किसी पिछड़े गांव में जाओ और वहां के हालात देखो, तो तुम्हें अपनी दिल्ली, मुंबई और बंगलुरू पर शर्म आने लगेगी। इसीलिए अब कोई भी आदमी गांव में रहना नहीं चाहता। पर जो गरीब लोग गांव छोड़ कर आते हैं, उन्हें शहर में क्या मिलता है? हर शहर में कई छोटे-छोटे पिछड़े गांव बन गए हैं। एक वर्ग के लिए कोठियां और फ्लैट तथा दूसरे वर्ग के लिए झुग्गी-झोपड़ियां। यह एक नई जाति प्रथा है।

तुम्हारा क्या खयाल है, जाति प्रथा को कैसे तोड़ा जा सकता है?

भाषणों और लेखों से तो नहीं ही। संतों ने जातिगत भेदभाव के खिलाफ कितने प्रवचन दिए, दोहे और पद लिखे, पर मूल व्यवस्था पर उसका कोई असर नहीं पड़ा।


तो उपाय क्या है?

उपाय यही है कि समाज में आर्थिक समानता लाई जाए। न किसी के पास बहुत ज्यादा हो, न किसी के पास बहुत कम। जाति का वर्ग भेद से गहरा रिश्ता है। जाति वर्ग बनाती है, वर्ग जाति को तोड़ता है। जब वर्ग नहीं रह जाएंगे, तब जाति भी नहीं रहेगी। भारत में वर्ग संघर्ष सब की अमीरी के लिए नहीं हो सकता। परिस्थितियां इसकी इजाजत नहीं देतीं। यह उचित भी नहीं है। गरीबी पाप है, तो अमीरी भी पाप है। इसलिए हमें सभी के लिए सादगी से रहने का विधान करना होगा।

तब इक्कीसवीं सदी के भारत का जो स्वप्न प्रचारित-प्रसारित किया जा रहा है, उसका क्या होगा?

यह स्वप्न मृग मरीचिका है, जिसके पीछे हमारा शासक वर्ग दौड़ रहा है। दरअसल, यह उसका अपना स्वप्न है। भारत के चरित्रहीन मध्य वर्ग का स्वप्न है। इस स्वप्न में साधारण जन के लिए कोई जगह नहीं है। ऐसी इक्कीसवीं हमारे किस काम की, जो अपने स्वर्ग में हमारी पूरी आबादी के दस से पंद्रह प्रतिशत लोगों के लिए ही जगह बना सके और बाकी लोगों को नरक में धकेल दे। हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य यही हो सकता है कि हमें न तो स्वर्ग में जाना है और न नरक में रहना है। इन दोनों के बीच बहुत विशाल भूखंड है, जहां हम बड़े आराम से रह सकते हैं।

इस बातचीत के बाद मेरा सारा दर्द घुल गया। अब मैं समझ पा रही थी कि सुमित की जाति पूछने से वह बिफर क्यों पड़ा था। कमरे में आने के बाद उसने सॉरी कहा था। अब मेरे सॉरी कहने की बारी थी। मैंने सुमित से हाथ जोड़ कर माफी मांगी। बदले में उसने उस गाल पर एक गहरा चुंबन अंकित कर दिया, जिस पर उसने जोर से चांटा मारा था।

उनका चांटा अब मुझे प्यारा लगने लगा था