अगन-हिंडोला / भाग - 13 / उषा किरण खान

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"आप का बहुत वक्त लिया शहंशाह, खुदा हाफिज हमारा भी दोपहर का नमाज का वक्त हो चला है।"-सलाम कर शेर खाँ बाहर निकल आया। हुमायूँ खुश था कि उसने शेर खाँ को नाचीज समझा। शेर खाँ ने अंदाजा लगाया कि यह हिंदोस्तान पर बादशाहत कायम न रख सकेगा। उसने बाहर खड़े अमीर से कहा कि हो सके तो अपने बादशाह से कहना कि सूबए बिहार की हुकूमत का ख्याल ख्वाब में भी न लाएँ। मैं उनके लिए गौड़ बंगाल छोड़ता हूँ। उन्हें समझा देना कि शेर खाँ को चूहा न समझें और न जैसा कि वे कहते चलते हैं वैसा लोमड़ी भी न समझें। " अमीर कुतुल की रगों में शेर खाँ का बयान सुरसुरी पैदा कर रहा था उसने हुमायूँ बादशाह से मशविरा के अंदाज में कहा कि हुजूर को सचमुच गौड़ चलना चाहिए. शेर खाँ से अभी टकराना ठीक नहीं।

शेर शाह ने अपने भरोसेमंद साथियों से कहा कि हुमायूँ बादशाह को बंगाल में उलझाकर रखो। उसे खूबसूरत माहौल पसंद है। मुर्शिदाबाद के बड़े बागीचे में ठहरने का इंतजाम करो खुशबूदार फूलों की लतरें, गुलाब की क्यारियाँ, हरी घास जहाँ हो वहीं उनका ऊँचा महल बनाओ. उनकी सेवा के लिए खूबसूरत रक्कासाएँ भेजना। बेगमातों के लिए सोने चाँदी और हीरे जवाहरात के महीन और जहीन कारीगर भेजो। मेरी मंशा है कि उन्हें इतना मसरूफ कर दो कि वे भूल जाएँ बंगाल के अलावा हिंदोस्तान में और भी कोई सूबा है। हुमायूँ के लश्कर आगे बढ़े कि किसी ने उन्हें खबर दी कि शेर खाँ के पठान सिपाही गाँवों में देखे गए हैं। उसका बाज भी देखा गया है। शेर खाँ के बाज की चंगुल चाँदी सोने से मढ़ी थीं। हुमायूँ ने जाँच की पर कहीं कोई निशानी नहीं दिखी वह इत्मीनान से मुर्शिदाबाद पहुँच गया। मुर्शिदाबाद की खातिरदारी से वह बेहद खुश था, इतना कि बरसात आ गई तब याद आया कि बरसात में बंगाल से निकलना मुश्किल होता है। शेर खाँ को समय मिल गया था वह पूरी तैयारी से लैस होकर हुमायूँ का मुकाबला करने आगे बढ़ गया।

जिस वक्त हुमायूँ बादशाह मुंगेर में ठहरा हुआ था उस समय वहाँ के बहुत सारे ज्ञानी लोग उससे मिलने आए. हुमायूँ का मन ज्ञान की बातों में बड़ा रमता। उन्हीं में मियाँ बदन मुंगेरी थे जो चुपचाप सर झुकाकर बैठे थे। बादशाह को पता चला कि बदन मियाँ का कोई सानी नहीं है तो उन्होंने उनसे बातचीत की। मियाँ बदन मुंगेरी ने जो तर्क छोड़े उसका जवाब किसी को न सूझा। हुमायूँ को भी नहीं। मियाँ मुंगेरी ने ही जवाब समझाया। हुमायूँ बादशाह ने उन्हें बड़ी इज्जत बख्शी और पूछा कि-"मियाँ मुंगेरी शेर खाँ गौड़ की तरफ गया है, मैं भी उसके पीछे-पीछे चल रहा हूँ। आप मुझे बताएँ कैसे करना चाहिए उसका पीछा कि फतह हो।"

"शहंशाह, आप जैसे जा रहे हैं वैसे ही जाएँ पर एक बड़ी फौज झारखंड की ओर से गौड़ की तरफ भेजें। शेरखान अपनी फौज सहित नदी में डूब मरेगा।"-पूछने को पूछ लिया हुमायूँ ने पर उनकी बात को तवज्जो नहीं दिया। सोचा कि यह किताबी इनसान क्या जाने जंग की हकीकत उसने वैसा ही किया जैसा उसका दिल चाहता था।

शेर खाँ ने सुहिया नदी के किनारे हुमायूँ की सेना को करारी शिकस्त दी। शेर खाँ ने सुना कि मियाँ बदन मुंगेरी ने हुमायूँ को जंग जीतने के लिए सलाह दी थी। सुनते ही उसके तन बदन में आग लग गई. उसने कहा-"इस जहीन बदन मुंगेरी को क्या सूझी थी कि वह एक मुगल को सलाह दे रहा था, मुझे मिलेगा तो मैं उसकी खाल खिंचवाकर मिश्ती को दे दूँगा।"-सुहिया नदी के किनारे जीत का जश्न हो रहा था कि मियाँ बदन मुंगेरी शेर खाँ के हुजूर में पहुँचे। "ऐ शेर खाँ, मैंने तुम्हारी शिकस्त का इंतजाम कर दिया था पर जन्नत के फरिश्ते ऐसा नहीं चाहते थे। हुमायूँ बादशाह ने मेरी बात सुनी नहीं। लेकिन मेरी कोई जाती दुश्मनी तो तुमसे है नहीं, हो भी नहीं सकती मैं किसी तख्तोताज का तलबगार नहीं हूँ। फिर भी सुना है कि तुम मुझसे खफा हो तो मैं हाजिर हूँ मुझे जो चाहो सजा दो।" शेर खाँ भौंचक्का-सा उसे देखता रह गया।

"मैं नाराज तो था लेकिन अब सोचता हूँ कि आपको सूली पर टाँग के क्या होगा? आपसे मेरा एक घोड़ा भी छीना नहीं जा सकता। एक और बात अब किसी अम्माँ के पेट से आपके जैसा जहीन पैदा हो न हो। जाइए मैं आपको मुंगेर की बारह हजार बीघा उपजाऊ जमीन अता फरमाता हूँ। आप अपने दिल से मेरे खिलाफ काँटा निकाल दीजिए."

शेर खाँ से बेफिक्र हो कर बादशाह हुमायूँ मुर्शिदाबाद में रंगरलियाँ मनाकर लौट रहे थे। उन्हें रास्ते में पता चला कि उनके भाई मिर्जा हिंदाल ने बगावत कर दी है। वे तेजी से आगे बढ़ते गए कि चौसा के पास शेर खाँ से टकरा गए. शेर खाँ ने जंग की कायदे से तैयारी कर रखी थी। मिट्टी का पुख्ता और अभेध किला बना रखा था। लाव तश्कर रुक गए. शाम ढल जाने के कारण वहीं तंबू गाड़े गए. सुबह जब तक हुमायूँ जगे बुजू वगैरह किया तभी पठानों ने हमला कर दिया। अफरा तफरी मच गई. अमीर अतका ने उन्हें तुरत निकल भागने को कहा-"हुजूर आप घिर गए हैं, आपका निकल भागना ज़रूरी है। अपनी फौज पठानी फौज से उलझी है।"-हुमायूँ तुरत घोड़े पर चढ़कर निकल भागे। गाँगी नदी में बाढ़ आई हुई थी। इन्होंने अपने घोड़ों को पानी में छोड़ दिया। वहीं एक भिश्ती अपने मश्क से पानी भर रहा था। अतका के कहने पर उसने उसमें हवा भर दिया। हुमायूँ ने मशक के सहारे नदी पार की और जान बचाकर पंजाब की ओर भाग निकले। सेनाओं में मार काट मची थी। बेगमातों के खेमे के सिपाही मारा गए. शेर खाँ को मालूम हो गया कि हुमायूँ बादशाह जान बचाकर भाग गए. उसने तुरंत जंग रोकने का एलान किया और बेगमातों के खेमे में आए. "आप सब मेरी सगी बहन के समान हैं। आपके साथ कोई नाइंसाफी नहीं होगी। आप सबों को हम फौज की निगहबानी में जहाँ कहेंगी वहाँ पहुँचा देंगे।"-शेर खाँ ने बड़े अदब से कहा और अपने खास सिपहसालार तथा बेगमों के ख्वाजा सराओं के साथ उनहें रोहतास के किले में इज्जत के साथ रखा। उन्हें उनके ओहदे के बराबर वजीफे दिए और यह जानकर कि हुमायूँ बादशाह पंजाब की ओर चले गए हैं उधर को सुरक्षित भेज दिया।

शेर खाँ ने आगरा जाकर तख्तनशीन होने की कोई हड़बड़ी नहीं दिखाई. एक बार फिर से फौज को समेटने में लग गए. सुल्तान इब्राहिम लोदी की भानजी फतेह मलका जो काला पहाड़ फारमुली की बेटी थी के शौहर का जौनपुर की लड़ाई में इंतकाल हो चुका था। उनके पास मनो सोना इकट्ठा था जिस ओर अमीरों की नजर थी। फतेह मल्का के मन में एक ही आस थी कि दिल्ली की गद्दी फिर किसी अफगान के कब्जे में आ जाए. जो शख्श मुगल बादशाह हुमायूँ से टक्कर ले सकता हो ऐसे को छोड़कर किसे दिया जा सकता है ये खजाना? इसी जद्दोजहद में पड़ी थी कि एक दिन उसने सपना देखा-फारमुली उससे कह रहे हैं-"तू आगे पीछे न सोच शेर खाँ को अपना सब कुछ सौंप दे वह तेरी रहनुमाई करेगा।"-बीवी फतेह मल्का ने शेर खाँ को अपना खजाना सौंप दिया और कहा कि "आप मुझसे निकाह पढ़वा लें। मुझे आप पर और आपको मुझ पर भरोसा हो जायगा।"

"खजाने की ज़रूरत जंग लड़ने के लिए है पर शादी की क्या ज़रूरत है बेगम? इनसान को ऐतबार रहना चाहिए. मैं शादी पर यकीन नहीं रखता एक जंगजू को कहाँ फुरसत है कि वह अपने आपको किसी नेक औरत के खाविंद बनने लायक बनाए. आप चाहें तो एक सच्चे पठान की तरह हम पर ऐतबार करें, हमारे ईमान का इम्तिहान लें।"

"शेर खाँ साहेब, हमें आपके ईमान पर ऐतबार है। आप सच्चे मुसलमान हैं। पाँच बार नमाज पढ़ते हैं, रोजा रखते हैं बिला वजह किसी खातून की इज्जत के साथ खिलवाड़ नहीं करते। आपकी जंगी फितरत से हम वाकिफ हैं आप हमारे लिए एक अजूबा हैं।"

"हम समझे नहीं बीवी फतेह मल्का?"-शेर खाँ ने हैरत से पूछा सुन रख है कि आप जब तक तख्त नहीं पा जाते किसी छोटे या बड़े जानवर का मांस नहीं खाएँगे। इबादत नमाज और रोजे तो समझ में आते हैं पर आपकी यह कसम क्या है? आप शराब भी नहीं पीते। जंग की थकान कैसे दूर होती है शेर खाँ? "

"ओह बीवी फतेह मल्का, इतनी-सी बात? मैं तो डर ही गया था कि कहीं आप कुछ और न पूछ बैठें। कि आप कहीं यह न पूछ बैठें कि रोह के घोड़े की तिजारत करने वाले, यहाँ वहाँ मारा-मारा फिरने वाले एक फटेहाल अफगान के दिलोदिमाग में अमीरी का शौक ही पायजामे से बाहर था यह तख्ते हिंदोस्तान का ख्वाब कैसे देख बैठा?"-शेर खाँ ने दिल उड़ेल दिया।

"यह सब अब सोचने का वक्त नहीं है। तख्त पर न इब्राहिम लोदी है न अफगान पठान की हैसियत रही। आपने बिना अल्लाह की मर्जी के तो कुछ न किया होगा? मुझे आपसे सच मुहब्बत हो गई है। एक जंगी से मुहब्बत इसे ठंडे दिलो दिमाग से सोचें और मुझ पर अपनी बेइंतहा इनायत बरपा करें।"

"बीवी फतेह मल्का, आपको मालूम होगा कि जलाल खाँ जो बिहार का अमीर है मेरा बेटा कहलाता है, वह मेरा शागिर्द भी है। उसे मैंने जंग के बीच में काफिया पढ़ाई सुल्तान महमूद मेरे सबसे बड़े सरपरस्त थे। उनके इंतकाल के बाद बेगम दूदा ने हुकूमत सँभाली। मैं उनकी मदद को तैयार रहता था। लेकिन ज़्यादा दिन जिंदा न रह सकीं। उनके इंतकाल के बाद से हम नाबालिग जलाल की अमीरी देखते रहे ज़रूर लेकिन बेगम दूदा से मेरा कोई जाती रिश्ता नहीं बना। बेगम को यूँ ही लोग मेरी बीवी कहने लगे। पर वह सच नहीं था।"-शेर खाँ उलझा-सा लगा।

"आप खातिर जमा रखिए शेर खाँ, मैं ऐसा न होने दूँगी। आप एक नेक इनसान हैं, मुझे मालूम है एक नेक सैयद हैं। सुना है हुमायूँ बादशाह ने भी आपसे खानदानी रिश्ता करना चाहा था। वह जानता है कि आप पाक खानदान के हैं। घोड़े का व्यौपारी होना कौन-सा गुनाह है?" फतेह मलका ने कहा।

"बीवी फतेह मल्का, हमारी आधी से अधिक उम्र गुजर गई. ज़िन्दगी की शाम होने को आई अब बादशाहत का वक्त आया है।"

"आया तो सही।"

फतेह मलका से रुखसत होकर शेर खाँ रोहतास के किले पर अपनी बेगम कमानी बीवी से मिलने पहुँचा। तीन जवान बेटों की अम्माँ कमानी बेगम हमेशा अपने शौहर की खिदमत के लिए सजधज कर तैयार रहतीं। शेर खाँ को सुकून मिलता। उसने अपनी अम्माँ सबा बेगम को उदास, तकलीफजदा बीमार देखा था कमानी बीवी को खुश देखकर उसे जान पड़ता अम्माँ को भी खुशी मिल रही होगी वह जहाँ भी होगी।

"आपको मालूम है मेरे सरताज कि क्या होने वाला है?"-बिना किसी लाग लपेट के कमानी बीवी ने कहा।

"क्या होने वाला है बेगम, इस उम्र में मैं किसी खुशखबरी की आस लेकर नहीं आया हूँ आपकी ओर से?"-शेर खाँ को हँसी आ गई.

"आप भी मजाक करते हैं मुझसे। मैं तो राजा महारथ सिंह के बारे में बताने वाली थी।"

"उसे क्या हुआ?"

"चतरा के जंगल में उसने बड़ा ऊँचा पत्थरों का किला बना रखा है यह तो आपको मालूम है न?"

"हाँ और खरवार-चेटो की फौज भी खड़ी कर रखी है। उनकी फौज से डरने की ज़रूरत नहीं है वे अपने जंगल भर की रखवाली कर लें यही काफी है।"

"वो तो है। बात है कि राजा महारथ सिंह ने अपने बेटे की शादी खरवार जिनन की बेटी झानो से तय किया है। कल ही शादी है।"

"आपको किसने कहा? क्या राजा साहेब के यहाँ से संदेसा आया है?"

"नहीं, कुछ उनके खैरख्वाह हैं न यहाँ वे ही कह रहे थे। कह रहे थे कि यहाँ शादी होती तो खूब ही रौनक होती अभी तो राजा साहेब के पास कुछ है भी नहीं।"-कमानी बीवी उदास थी।

"बेगम, हम न्यौता लेकर चुपचाप चलें, राजा साहब ने एक वक्त पर हमारी मदद की थी। बाद में हमने उनके साथ अच्छा सुलूक नहीं किया। अब जब जश्न का माहौल है तो हमें जाना चाहिए." सौगात लेकर दोनों थोड़े से सिपाही लेकर सादे कपड़ों में राजा महारथ सिंह के किले में बेखर के पहुँच गए. राजा साहब ने जब पहचाना तब वे भौंचक्के रह गए. "हम आपको डराने नहीं आए हैं राजा साहब दोस्ती का हाथ बढ़ाने आए हैं। यह जंगल, यह पहाड़ी आपकी है।"

"हमें मालूम है शेर खाँ आप दिल्ली की गद्दी पा गए हैं। जल्दी ही शेर शाह हो जाएँगे। हमें बुला लेना भइया, कोर्निश बजाएँगे।"-राजा महारथ सिंह ने कहा।

" हमें भी बुलाना हजूर, हम सिंगा बजाएँगे, नाच करेंगे। जशन होगा जितन खरवार ने कहा।

इस शादी में शरीक होकर शेर खाँ खुशी-खुशी रोहतासगढ़ के किले पर पहुँचे। एक छोटे से राजा और जंगल के सरदारों की खैरख्वाही ने इनके सारे शिकवे दूर कर दिए. जंगल की ओर से कभी किसी तरह के बगावत के खतरे से शेर खाँ की हुकूमत महफूज हो गई. कई जंग तीर कमान के भरोसे पर भी जीते जा सकते हैं। हाथियों की फौज खड़ी की जा सकती है। रसद होने वाले छोटे घोड़े-टटूटू जंगल से ही मिलते हैं। उराँव, चेरो खरवार, कोल भील सौताल बेहद जाँबाज सिपाही की शक्ल में तैयार हो सकते हैं। पथरीली डगर पर इन्हीं की ज़्यादा ज़रूरत है। शेर खाँ ने दिल्ली जाने के पहले पूरब को पूरी तरह अपने कब्जे में ले लिया था। पूरब ने इन्हें अपना शहंशाह कबूल कर लिया था। शेर खाँ ने अपने आपको पश्चिमी चुनौती के लिए तैयार कर लिया। "ऐ सुल्तान, आप आए थे चुपचाप पर हम चाहते हैं हम आपको लाव-लश्कर के साथ रुखसत करें। का कहते हैं?"-राजा महारथ ने कहा। शेर खाँ तैयार नहीं हुआ। वह जैसे आया था वैसे ही जाना चाहता था। रात उसकी फल्गू नदी के किनारे बीती। तंबू गाड़ा गया, पालकी रख छोड़ा गया घोड़ों की जीन खोल दी गई.

"साईस, नदी के बालू को हाथ से हटाओ, छोटे-छोटे गड्ढे खोद डालो। साफ पानी निकल आएगा घोड़ों को पिलाकर प्यास बुझाओ हमारे लिए भी मशक में भर लाओ."-शेर खाँ ने कहा। साईस जानता था पर कमानी बीवी की आँखें हैरत जदा थीं। "ऐ मेरी नेकदिल बीवी, देखो यह खुरदुरी सूखी-सी नदी बिल्कुल आपकी मानिंद है उपर से ऐसी है, इसने अपने कलेजे में पानी के चश्मे दबा रखे हैं।"-आँखें फाड़कर नदी की ओर देखती बीवी से कहा। "या खुदा"-कमानी बीवी सिर्फ़ देख रही थी। डटकर खाया पीया था चलने से पहले, यहाँ पानी पीकर सोना ज़रूरी जान पड़ा।

"हुजूर, हमने मछलियों का शिकार किया है भून रहे हैं, बेगम साहेब के लिए लाया हूँ।"-साथ चलते मुकद्यम ने कहा। बेगम को भूनी हुए मछलियों का बड़ा चाव था।

"मेरे आका, आपको बादशाहत मिल गई. अब तो मछलियाँ खा सकते हैं।" बेगम ने पेशकश की।

"अब ख्वाब में भी जी नहीं चाहता, बहरहाल हिंदुस्तान सिर्फ़ गौड़ से आगरे तक नहीं है।"

"आपने रायसीन तक जीत लिया है सुल्तान।"

"जीत तो लिया है मेरी हमसाया, पर वही मेरे सीने में तीरे-नीमकश होकर अटका पड़ा है।"

"क्यों? वहाँ अमन तो है।"

"अमन से पहले की बात है।"

"क्या वाक्या है मेरे आका, कोई सियासी मामला न हो तो आप मुझसे कह सकते हैं।"

"सारे मामले सियासी हैं। जब भी सियासतदाँ का मामला होगा तभी वह सियासी हो जायगा। आप न समझेंगी।"

"समझाइए तो।"

"बेगम आपको याद होगा कि रायसेन के राजा पूरनमल पर मुझे कितना गुस्सा था। उस अहमक ने काम ही ऐसा किया था ऐसा काम ही मुझे भड़का देता है।"

"कैसा काम?"

" अफगानों की हार के बाद उसने दर्जनों सय्यदानियों को पकड़ लिया था। उन्हें अपने किले के अंदर ले जाकर बदसलूकी की।

"क्या किया?"

"उन्हें रक्कासा बना दिया। अपने दरबार में नाचने को मजबूर किया। यह सुन कर मेरा गुस्सा सातवें आसमान पर पहुँच गया। मैंने मुगल बादशाह को जब खदेड़कर पंजाब पहुँचा दिया तभी यह मुआमला मेरे सामने पेश हुआ। मैंने अपनी फौज का मुँह रायसेन किले की ओर मोड़ा। रायसेन का किला अब तक के फतह किए गए सभी किलों से पुख्ता और बड़ा था। पूरनमल को शिकस्त देना उतना आसान न था। मुगल बादशाह हुमायूँ गौड़ को नहीं जानता था उतनी अच्छी तरह जितना मैं जानता था, वह जगह भी उसकी नहीं थी और खेल रहा था। मेरी बिछाई बिसात पर सो मुँह की खा गया लेकिन यह किला मेरे लिए अनजाना था। पूरनमल की अपनी जगह थी। जंगल का चप्पा-चप्पा उसका देखा भाला था। बिना अक्ल का इस्तमाल किए जीतना आसान न था।"

"आपने कैसे जीता उसे?"

"चालाकी से कुछ खत उसके मातहतों के लिखवाए अपने नाम से कि पूरनमल से वे तंग आ चुके हैं और हिंदोस्तान के सुल्तान के मातहत रहना चाहते हैं। वह खत किले के अंदर किसी रास्ते पर गिरवा दिया खत पूरनमल तक पहुँच गया। चूँकि उस पर किसी का नाम न था चुनाँचे सभी शक के घेरे में आ गए. ऐसे ही वक्त हमने उसे खबर भेजी कि वह किले के बाहर आकर हमसे बातें करे। सय्यद पठान अफगानी खातूनों को बाइज्जत हमें पहुँचा दे।"

"उसने वैसा किया क्या सुलतान?"

" नहीं उसने हमारे सुपुर्द करने से इनकार कर दिया। तब हमने उसे फिर खबर भिजवाई कि बड़ा बहादुर बनता है पूरनमल औरतों की ओट में छुपा है चूहे की तरह। अब उसे बुरा लगा। उसने फौरन सभी मुसलमान खातूनों को किले के बाहर हमारे पड़ाव पर भेज दिया।

"चलिए कुछ तो किया।"

"बीवी, उसकी आमदरफ्त से रास्तों का अंदाजा हो गया। हमने उसे खबर भेजी कि शेर खाँ को सुलतान कबूल कर सगे सम्बंधियों यानी कि अपने कुनबे के संग सामने आ जाय।"

"फिर क्या हुआ मेरे आका?"

"अब उसका माथा ठनका। अपने अमीरों भाई बंदों से मशविरा कर उसने कुछ तोहफे भेजे. एक हजार घुड़सवार, पाँच सौ हाथियों की फौज साथ भेजी. हमें मालूम था पूरनमल के पास कई हजार घोड़ों और हाथियों की फौज है। सबसे बड़ी बात थी कि वह हमसे डर नहीं रहा था। बिना खौफ के कहीं सुलतानी चलती है बेगम?"

"नहीं चलती हुजूर।"

"बहुत दिनों के जद्दोजहद के बाद पूरनमल अपने बिल से निकल गया। उसकी वजह थी, उसने अपने रनिवास की औरतों का जौहर अपनी आँखों के सामने करा दिया फिर सारे मर्द निकल आए, फिजूल में लड़कर जान दे दी। अंदर बड़ा खौफनाक मंजर था। हमारा फौज लूटमार में मुब्तिला थी कि एक नन्ही बच्ची पर मेरी नजर गई. वह बच्ची लाशों के बीच खड़ी रो रही थी। लाल रंग का घाघरा पहन रखा था, लिबास और सजावट से जान पड़ा ज़रूर शाही घराने से ताल्लुक रखती है। मैंने अपना फौजी लिबास उतार दिया था। उसकी ओर हाथ बढ़ाया कि वह मेरी टाँगों में चिपक गई."

"ओहे, बेचारी बेहद खौफ खा गई होगी।"-शेर खाँ थोड़ी देर चुप रहे फिर लंबी साँस लेकर कहने लगे। "मैंने उसे गोद में उठा लिया और नाम पूछा, उसने बताया गुलाब कुँअर उसने बताया कि महाराजा उसके ताऊ हैं। कमानी बीबी, वह बच्ची मेरे सीने से चिपकी हुई थी और मेरा सीना आग उगल रहा था। मैंने उसी वक्त उस बच्ची गुलाब कुँअर को एक बनजारे को दे दिया।" लो राजा-पूरनमल की इस बेटी को नचवाओ. उसने पठान अफगान सैय्यदानियों को नचवाया है। "

"ओह, आप जंगजूओं के तरीके अजब हैं। आप किसी को बख्शते नहीं। इस गुलाब कुँअर बच्ची को अपने ताऊ के किए का खामियाजा भुगतना पड़ा।"

"कभी कभी उसके लिए सीने में तकलीफ महसूस होती है बेगम। वह मेरे सीने से चिपक गई थी। छोटी-छोटी दोनों बाँहें मेरी गर्दन के गिर्द कस कर लपेट लिया था। उसे जबरन अपने सीने से हटाना पड़ा, दूर तलक मेरी जानिब देखती रही। हम जानते हैं हमारी वहशियाना फितरत शेर खाँ दरिया के पार कहीं दूर देख रहा था। कमानी बीबी समझ रही थी कि इसके दिल में बच्ची के लिए दीवानगी है। कमानी बीबी ने सिर्फ़ बेटे जने। बेटे जनना बेगमातों के लिए सबाब है पर एक रुन-झुन करती बिटिया घर की रौनक होती है। काश सुल्तान शेर खाँ गुलाब कुँअर को अपनी बना लेता। इनका गुबारे दिल कैसे निकाला जाए सोचने लगी।" आपकी जिद भी खूब है मेरे सरताज, कहाँ तो शमशीर-तलवार से माहीचा मुसल्लम काट कर खाते थे कहाँ मछलियाँ भी दुश्वार हैं। "

"अब हैं जिद्दी, आपको तो झेलना ही है।"-शेर खाँ आपे में लौट आए और कमानी बीबी को आगोश में लेकर लेट गए. फजिर की नमाज तक बेगम उनके आगोश में बेफिक्र होकर सो रही थीं और हिंदुस्तान का बादशाह आसमान के तारे गिन रहा था।