चाल / रवीन्द्र कालिया / पृष्ठ 4

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शुरू में पाल के पास 'मीत' फिल्म का एक रिकार्ड था, और ग्रामोफोन। गाना सुनते ही उस पर ऐसा पागलपन सवार हो जाता, वह कमरे में तेज तेज चलने लगता और कई बार अपने कपडे फाडने लगता। आखिर जब पाल ने महसूस किया कि इस गीत के चक्कर में उसके बहुत से कपडे तार-तार हो चुक हैं, वह चुपके से 'मीत' का एक मात्र रिकार्ड नाले में फेंक आया और देर तक गुमसुम बैठा रहा। ज्यों ही पाल की पत्नी कपडे बदलकर कमरे में आती, पाल बुडबुडाने लगता। धीरे-धीरे उसकी आवाज तेज होने लगती। बच्चे कमरा छोडकर भाग जाते और दालान में गर्ग के घर की रोशनी में 'लूडे' खेलने लगते या माँ और बाप के साथ-साथ रोने-लगते। झगडे के दौरान पाल को अपना कमरा छोटा लगता। अक्सर वह कमरे से बाहर निकल आता और तमतमाता हुआ इधर-उधर से घूमने लगता। बच्चों पर नजर पड जाती, तो एक ही ठोकर से 'लूडो' पलट देता। कुछ लोगों का खयाल था, कि पाल की बीवी बारह नम्बर के संतोष से फँसी है।

संतोष चाल का एक मात्र कुँआरा था। वह स्वास्तिक में फोरमैन था। हमेशा चुस्त दुरुस्त दिखाई देता। चाल में बारह-चौदह वर्ष के बच्चो से उसकी खूब दोस्ती थी। उसे दफ्तर में देर हो जाती तो बच्चे बेचैन होने लगते। जब तक सन्तोष चाल में रहता, कोई-न-कोई बच्चा उसके कमरे में जरूर रहता। कोई स्कूल के लिए रद्दी ले जाने का बहाना करके आता, कोई दीदी के लिए उपन्यास ले जाने का। कोई रेखागणित का सवाल हल कराने। आखिर तंग आ कर मोटू के बाप ने मोटू को ट्यूशन रख दी ताकि सवाल समझने के लिए उसे बार-बार संतोष के पास न जाना पडे। कुछ लोगों ने यह भी उडा दिया था, कि संतोष बच्चों को खराब करता है, मगर अभी तक इस बात की पुष्टि नहीं हुई थी। संतोष दिखने में इतना सरल, भोला और शर्माऊ लगता था, कि उसके बारे में कुछ-न-कुछ उडती रहती। लोगों को पूरा विश्वास था, कि पाल का परिवारिक जीवन इसी संतोष ने नष्ट किया है। सारे गडबड-घोटाले की वही जड़ है। वे तो यहाँ तक माने थीं, कि एक दिन संतोष पाल की बीवी के साथ गायब हो जाएगा। वह अपना सूटकेस होल्डाल लेकर कभी दफ्तर के काम से बाहर गाँव जाता, तो वे सोचतीं आज पाल की बीवी भी नहीं लौटगी। मगर ऐसा कभी नहीं हुआ। पाल की बीवी भी लौट आई और दो-एक दिन बाद संतोष भी।

किसी न किसी बात को लेकर बीवी से उलझ जाना पाल की आदत हो गई थी। झगडे के बाद पाल आत्महत्या की धमकी देकर सो जाता। जब पाल की पत्नी को विश्वास हो गया, कि पाल कभी आत्महत्या नहीं करेगा और जसतस बच्चों को पाल लेगा, वह निश्चिन्त होकर एक दिन गायब हो गई। पाल हताश होकर घर में पडा रहा। उसने पुलिस तक को भी खबर नही की कि उसकी बीवी गायब हो गई है। कुछ लोगों ने सूचना दी उसकी बीवी माला सिन्हा के ड्राइवार के साथ भाग गई है, मगर पाल ने कहा, 'रामसिंह ऐसा नहीं कर सकता। मैं उसे आठ वर्षों से जानता हूँ। उसकी पत्नी इस चुडैल से कहीं सुन्दर है।'

किसी ने पाल को बताया कि वह खार स्टेशन पर एक बूढे सिक्ख के साथ चाय पी रही थी। पाल ने कहा, 'वह बूढा सिक्ख मेरी बीवी का बाप है, और खार में ही रहता है।

इस समय चाल में सन्नाटा था। एक व्यक्ति कब से अपने कमरे का दरवाजा पीट रहा था। प्रकाश ने देखा, गर्ग पडोस की खटिया पर बैठा धीरे-धीरे दरवाजा खटखटार रहा था। प्रकाश को देखकर, वह झेंप गया और उसकी तरफ चला आया।

'मैं बहुत दिनों से आप से एक सवाल करना चाहता हूँ।' गर्ग ने झेंपते हुए कहा।

'कीजिए।'

'सवाल जरूर आपको मूर्खतापूर्ण लगेगा, मगर मेरी इच्छा है, आप इसका जवाब जरूर दें।'

'कहिए!'

'औरतों के बारे में आपकी क्या राय है?' गर्ग ने पत्थर की तरह प्रकाश के ऊपर सवाल लुढका दिया।

'जो मर्द के बारे में है।' प्रकाश ने कहा।

'मर्द के बारे मे आपकी क्या राय है? मेरी बात को गम्भीरता से लीजिए।' गर्ग बोला।

'औरत के बारे में मेरी राय बहुत अच्छी है। मगर मर्द के बारे उतनी अच्छी नहीं।' प्रकाश ने कहा।

प्रकाश गर्ग की समस्या से परिचित था। जो आदमी पिछले डेढ घंटे से अपने ही घर का दरवाजा खटखटा रहा हो, उसके लिए यह उत्तर बहुत निराशाजनक हो सकता था। गर्ग परेशान-सा वहाँ बैठा रहा। गर्ग का खयाल था कि प्रकाश अवश्य कोई ऐसी बात कहेगा, जिससे उसकी संतप्त आत्मा को कुछ शान्ती मिलेगी।

'आप जानते ही होंगे।' प्रकाश ने गर्ग की ओर देखते हुए कहना शुरू किया-'किरण नौकरी पर जाती है और मैं घर में गुलछर्रें उडाया करता हूँ। दाल-रोटी की चिन्ता मुझे नहीं है। कपूर को देखिए, मेढेकर को देखिए, जिन्दगी से कितने संतुष्ट हैं। शाम को जब मेढेकर दम्पती एक-एक बच्चा कंधे से लगाकर घूमने निकलते हैं, तो कितना अच्छा लगता है। संतोष की शादी नहीं हुई, कितना गमगीन रहता है। दरअसल औरत के बिना आदमी अधूरा है। आप ही सोचिए, शादी से पहले आपकी क्या हालत थी। मैं तो आपसे तब परिचित नहीं था, आप खुद ही बताइए, आपको ऐसा नहीं लगता था, कि आप शून्य में जी रहे हैं। अब निचिश्त रूप से आपका दिल सिर्फ अपने लिए नहीं धडकता होगा। पहले कौन आप के लिए इतनी लगन से मछली बनाता होगा। क्यो मैं ठीक कह रहा हूँ या गलत?

'आप जैसे लोगों से मुझे बीच-बीच मे मिलते रहना चाहिए।' गर्ग ने कहा और टाँग हिलाने लगा। गर्ग एक सिगरेट प्रकाश को दी और एक खुद सुलगा ली।

'आप कभी कोलाबा की तरफ नहीं आते?'

'वह क्षेत्र मेरे लिए वर्जित है। बेकार आदमी कोलाबा की सडकों पर घूमेगा, तो उसका दिमाग खराब हो जाएगा।' प्रकाश ने कहा, 'मैंने बहुत जगह अर्जियाँ दे रखी है। मगर इधर मंदी है। नई नौकरियाँ बहुत कम निकल रही हैं।'

'मदी तो सब जगह है। हौजरी लाइन भी चौपट हो रही है। कुछ वर्ष पूर्व हमारा चार-छह लाख का धंधा था, अब प्रतिष्ठान का खर्च मुश्किल से निकलता है।'

प्रकाश को हँसी आ गई, प्रतिष्ठान का मुनीम इस तरह दोपहर में उठ-उठ कर आता रहा, तो रहा-सहा धंधा भी चौपट हो जाएगा। सिगरेट पीकर और प्रकाश से बतिया कर, गर्ग का तनाव स्खलित हो गया था वह उठा और प्रकाश से हाथ मिलाकर, चला गया। जाकर वह दोबारा दरवाजा पीटने लगा। प्रकाश ने कुर्सी खिसका ली और इस दृश्य का मजा लेने लगा।

गर्ग के दरवाजे पर चाक से लिखा हुआ था-एक से चार के बीच दरवाजा न खटखटाना।

इस बीच बंगालिन पोस्टमैन को भी दरवाजा नही खोलती थी। मगर आज गर्ग का सितारा बुलन्द था, इससे पूर्व कि वह दरवाजा पीटते हुए थक जाता और खटिया पर बैठकर दरवाजा पीटने लगता, बंगालिन ने दरवाजा खोल दिया और गर्ग के घुमते ही बन्द भी कर दिया। अन्दर पहुँचकर गर्ग को बहुत अफसोस हुआ। उसने पाया, बंगालिन घर में अकेली थी। डॉ. बापट का घर में कहीं नाम-निशान भी नहीं था। वह सरदर्द का बहाना करके लेट गया। उसने शिकायत भी नहीं की वह इतनी देर से दरवाजा पीट रहा था। उसे अपने सपने पर क्रोध आ रहा था। उसकी इच्छा हो रही थी, उठकर कपाट पर बंगालिन की ही शैली में चाक से लिख दे-सपने पर विश्वास न करना।

बच्चों के स्कूल से लौटते ही चाल में नया जीवन आ गया। कृष्णा छोटे बच्चों को कन्धों पर उठाकर घर पहुँचाने लगा। पार्क के पास खोमचे वालों की भीड लग गई। अब किरण भी लौट ही रही होगी, प्रकाश ने सोचा। वह बहुत बेताबी से उसकी प्रतीक्षा कर रहा था। उसने आवश्य आज गुणवन्तराय की रिपोर्ट कर दी होगी। किरण चुपचाप यंत्रणा भोगने की आदी नहीं है। बहुत सम्भावना है, मामला रजिस्ट्रार अथवा कुलपति तक पहुँच गया हो, वह अपने अधिकारों के लिए लडना जानती है अच्छा होता, वह सुबह मुझे अपने साथ ले जाती। गले में रूमाल बाँधकर उसके कालिज के दो-एक चक्कर तो लगा ही सकता था। गुणवन्तराय कालिज में घुसने लगता तो ऐसी पटकी देता कि मुँह के बल गिर पडता। गुणवन्तराय को पागलखाने, हवालात अथवा अस्पताल में से किसी-न-किसी स्थान का चुनाव करना ही होगा।

चाल के पास आकर एक कार रुकी तो, प्रकाश को पहचानने में देर न लगी। यह शिवेन्द्र की छोटी मौरिस थी। यह कम्बख्त आज कहाँ से टपक पडा। गुणवन्तराय की सिफारिश लेकर आया होगा। इसका मतलब हुआ, गुणवन्तराय रात भर सोया नहीं, हमारे दोस्तों का पता लगाता रहा। बहुत सोच-विचार कर उसने शिवेन्द्र को इस काम के लिए चुना होगा। मैं शिवेन्द्र से साफ-साफ शब्दों में कह दूँगा, भैया, यह मामला दोस्ती की परिधि में नहीं आता।

शिवेन्द्र कार से अकेला नही निकला। संजाना और सुनन्दा भी साथ थीं। प्रकाश को लगा, मामला कुछ दूसरा है। गुणवन्तराय की बात न हुई तो उसके लिए पाँच मिनट भी शिवेन्द्र को सह पाना मुश्किल हो जाएगा। वह एक दूसरी दुनिया का वाशिंदा है। शराब, लडकियाँ और चन्द बोसीदा शेर उसकी जिन्दगी हैं। ऐसे में कहीं किरण आ गई, तो सब चौपट हो जाएगा। यह दूसरी बात है कि शिवेन्द्र ने प्रकाश को हमेंशा आकर्षित किया है। मगर किरण को उसने चिढ है! प्रकाश को अच्छा लगता है शिक्षा और पूँजी के अभाव में भी वह मजे से दिन काटता है। दो चीजें तो उसके पास थी हीं, एक मौरिस और एक नन्हीं सी एडवर्टाइजिंग एजेंसी-पार्क डेविस एण्ड ली।

'पार्क डेविस एण्ड ली' कौन थे, शिवेन्द्र नहीं जानता। नाम उसे अच्छा लगा, उसने रख लिया। संयोग से उसे दो-एक बहुत अच्छी माडल मिल गईं, जिनके बल पर वह एक-न-एक अच्छे एकाउण्ट का जुगाड़ कर लेता।

प्रकाश से शिवेन्द्र का परिचय एक मारवाडी सहपाठी के यहाँ हुआ था। तबसे वह दो-तीन बार शिवेन्द्र की पार्टियों में हो आया था। नगर के कॉटन मैगनेट सेठ मनुभाई के यहाँ लडकी पैदा हुई, शिवेन्द्र ने ताजमहल में पार्टी फेंक दी। निरंजन बिडला की सगाई पर उसने अपने घर में पार्टी दी और एक ही शाम में हजारों रुपए फूँक दिए। शराब और लडकियाँ उसकी पार्टी में प्रचुर मात्र में होतीं। यह एयर होस्टेस मिस फर्नाडीज है, वह बहुचर्चित मॉडल पर्सिस खम्बाता, यह भारतसुन्दरी पाटनवाला। यह शर्मिला टैगोर, प्रसिद्ध सिने अभिनेत्री। प्रकाश ने इतनी सुन्दर लडकियाँ एक साथ इतने निकट से नहीं देखी थीं। वह घण्टों लडकियों से बतियाता रहता। पार्टी खत्म होने से पहले शिवेन्द्र नशे में धुत्त सो जाता। श्रीमती शिवेन्द्र मेहमानों को बिदा करतीं।

पार्टी से लौटते हुए प्रकाश पाता कि वह अपनी मनहूसियत वहीं फेंक आया है मगर किरण को यह सब शोर-शरााबा सख्त नापसन्द था। वह अक्सर कहती, शिवेन्द्र को ज्यादा मुँह मत लगाया करो। मुझे वह आदमी ठीक नहीं लगता।

शिवेन्द्र से चिढने का किरण के पास एक और कारण भी था। शिवेन्द्र ने पिछले वर्ष तय कर लिया कि 'न्यूइयर ईव' किरण की ओर से मनाई जाएगी। उसने बॉम्बोली में अपने बहुत से मित्रों को आमंत्रित कर रखा था। वहाँ किरण और प्रकाश का कई लोगों से परिचय हुआ। किरण का नाम बार-बार आ रहा था। वह इतना प्रसन्न हो गई कि हँस-हँस कर बिल चुकाती रही। दूसरे दिन उसने पाया, घर में अनाज के लिए भी पैसा नहीं है। तभी से वह शिवेन्द्र 'फ्रॉड' कहने लगी। शिवेन्द्र और किरण दोनों एक दूसरे को फ्रॉड कहने लगे।

शिवेन्द्र ने आते ही विस्की की बोतल मेज पर रख दी और लडकियों से कहा जहाँ कहीं जगह मिले, बैठ जाएँ। 'मेज की चारों टाँगे हिल रही हैं। ऐसा न हो, तुम्हारी बोतल लुढक जाए' प्रकाश ने कहा, 'आज बोतलों की कमी नहीं।' शिवेन्द्र ने कहा।

प्रकाश ने सुबह से बिस्तर भी साफ नहीं किया था। संजाना खाट पर बैठ गई और सुनन्दा किताबों के रैक से जा लगी। प्रकाश दोनों लडकियों से परिचित था। उसने कभी नहीं सोचा था, यह शिवेन्द्र का बच्चा किसी दिन इन लडकियों को भी उसका घर दिखा देगा। घर में तीसरे आदमी के लिए बैठने की भी जगह न थी। उसने सोचा कि गर्ग के यहाँ से दो-एक कुर्सिया उठा लाए। कुर्सियाँ आ गईं, तो हो सकता है, ये लोग यहीं जम जाएँ। वह चाहता था, किसी तरह किरण के आने से पहले इन्हें विदा कर दे। घर में जगह नहीं है, तो मैं कहाँ से लाऊँ? मैं कौन-सा इन लडकियों से शादी करने की सोच रहा हूँ, जो इन्हें देखकर परेशान होऊँ। मैं इन्हें बुलाने तो नहीं गया था। शिवेन्द्र को सोचना चाहिए था कि मेरे घर में बैठने की भी व्यवस्था नहीं है। अब क्या इन्हें सर पर बैठा लूँ? शिवेन्द्र उठा और रसोई से तीन गिलास और एक कप उठा लाया। तीनों गिलास अलग-अलग मेल के थे। उसने संजाना को चाबी दी कि जा कर डिकी से बर्फ निकलवा लाये। संजाना घर में ऐसे चल रह थी, जैसे कीचड़ में चल रही हो। दरवाजे पर चाल के बच्चों की भीड लग रही थी। प्रकाश ने उठकर पर्दा गिरा दिया।

'हम लोग आज मड आइलैण्ड पर मिडनाइट पिकनिक मनाएँगे। तुम लोग भी जल्दी से तैयार हो जाओ। किरण से कहा, कुछ पराठे सेंक ले औ साथ में नीबू का अचार ले ले, जो उसकी माँ भेजा करती है। वैसे हमारे पास बहुत से कबाब हैं। किरण को रशियन सैलड बहुत पसन्द है, वह लेते आए हैं।' शिवेन्द्र बोला, 'बाकी लोग तो अब तक वहाँ पहुँच चुके होंगे। मैंने तय कर रखा था, जिन्दगी में कभी अंधेरी से गुजरा तो तुम से अवश्य मिलूँगा।'