शहरी बस्तियों से

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गद्य कोश में यह पन्ना अंकुर सोसायटी फ़ॉर ऑल्टरनेटिव्ज़ इन एजुकेशन के लिए बनाया गया है। अंकुर पिछले चौंतीस सालों से शिक्षा के क्षेत्र में संवाद और रियाज़ के ज़रिए लगातार सक्रिय है। हमारे प्रयोग के ये ठिकाने दिल्ली के पाँच कामगार इलाक़ों में चलते हैं। यहाँ बच्चे- बच्चियाँ और किशोर-किशोरियाँ सुनने-बोलने-लिखने और पढ़ने का आनंद उठाते हैं। साथ ही मीडिया के तमाम रूपों के ज़रिए अपने अनुभवों को ज़ुबान देते हैं। हर जगह अपनी सुनने की संस्कृति और ज़िन्दगी को समझने के साधनों को लेकर जीती है और उनमें समय के साथ अनुभवों की चढ़ती परतों के साथ ख़ुद को बदलाव में लाती है। अंकुर की कोशिश है कि शहर के विभिन्न श्रमिक बसेरों में पनपते ‌अनेक तरह के अनुभवों और सोच के साथ संवाद बना सके। हमारे पहुँच वाले मोहल्ले - सुंदरनगरी, खिचड़ीपुर, दक्षिणपुरी, सावदा घेवरा और एलएनजेपी कॉलोनी।

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प्रकाशन

अकार (पुनर्वास बस्तियों में लिखी जाती साहित्य की नई इबारत)

यह रचनाएँ अकार पत्रिका के 37वें अंक (दिसम्बर 2013 - मार्च 2014) में प्रकाशित हुई थीं।

  • दिशा की शादी और हमारी दोस्ती / दीपा
  • जब मैंने पहली बार मुंबई में समंदर देखा / नंदिनी
  • सिलेंडर के बोझ से दबी साइकिल और उम्मीदों से भरी ज़िन्दगी / अदनान मिर्ज़ा
  • अल्लाह मियां का शुक्रिया कि मेरे शौहर का काम ढीला हुआ / सुमेरा
  • सामूहिक विवाह / नंदनी
  • गांव इज्ज़त और शहर मज़दूरी / इस्फ़ाक
  • जुगाड़ु पंखा-बत्ती / रवि
  • साप्ताहिक बाज़ार / पूजा
  • कोलकाता में सब्जी बेचता था दिल्ली में दिहाड़ी मज़दूर बन गया हूं / पारुल
  • मिलिए दिल्ली की दीवारों को रंगने वाले पटना के इस मज़दूर से / सुनयना
  • 11वीं तक की पढ़ाई और अब दिहाड़ी मज़दूर / दीपक कुमार
  • टीचर की डांट से बचने का तरीका / पूजा
  • हमारी रसोई / सुनयना
  • स्कूल की सीढ़ियों पर सजी महफिल / कोमल यादव
  • न उनकी महफ़िल सजी, न ताला खुला… / आरती अग्रवाल
  • दो साल हो चुके हैं, कोई भी उसे लेने नहीं आया… / नंदनी
  • पानी का टैंकर / काजल महतो
  • जब घर पर हों महमान और खिलाने के लिए कुछ न हो! / महेश हलधर
  • जैसा भी था, जो भी था, हमारे लिए तो बी.आर.टी. मेट्रो से कम नहीं था / लख्मी चंद कोहली
  • माया को पुराने कपड़ों के बदले में क्या मिला? / आरती अग्रवाल
  • नीलम के अंग्रेज जूते / पूजा
  • भाई की सिलाई मशीन / प्रीति